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4364

संत तुलसीदास और उनके संदेश

नेखक--

डा० राजपति दीत्षित एम्म० ए०, एल० एल० बो०, डी० छिट० हनदी विभाग

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

बनारस

श्रीमोविन्द मुद्ृशालय

मूल्य ३)

प्रथम संस्करण सें० २०१०

प्रकाशक एवं मुद्रक-- राममोदन शास्त्री

दो शब्द

यहाँ सर्वश्रथम अपने बडे भ्रंथ 'तुलसीदाग और उनका युग की किश्वित चर्चा करना अनिवाय समझ रहा हूं, क्यों कि उसकी प्रेरणा से ही बृहद्जन- समुदाय की सेवा में उपस्थित करने योग्य 'संत तुलसीदास ओर उनके सर्देश” सदृश एक छोटी रचना को स्प्रह्ा बछवती हुई | 'तुललसीदास और उनका युग" का प्रकाशन श्रभी एक डेढ़ वर्ष पुत्र हुआ; किन्तु इतने अढ्प काल में साहित्य मर्मझो के बीच साहित्य क्षेत्र में उसने जो स्थान प्राप्त किया वह मेरे ल्षिए विशेष उत्साह वर्क सिद्ध हुआ उत्तर प्रदेश की सरकार ने पुरस्कार देकर उसका मान बढ़ाया, साथ ही दर-दूर के विद्वजनों ओर तुलसीदास के अध्यवसायी सात्त्य सेवियों ने उक्त ग्रंथ के अनेकानेक विषयो को लेकर मुझसे जो पूछताँड की उससे अंथ को लोकप्रियता समझ कर मैंने उसमें लगाए हुए अनेकानेक वर्षों के आयास-प्रयात को सफल्त माना। अंथ का मुल्य कुछ अधिक होने पर भी उसकी यथेष्ट प्रतियों की खपत देखकर भी मुझे विश्वास हुआ कि सत्साहित्य के गुण-आराइकों ने मेरे साहित्यिक उपहार को सह स्‍्त्रीकार किया है। एतद्थ यह कैसे स्वीकार करूँ कि तुलसीदास और इनऊे युग' ने भी सुझे 'संत तुलसीदास और उनके संदेश” के निर्माण का प्रोत्साइन दिया

प्रस्तुत अ्रथ में तुलसीदास की प्रामाणिक कृतियों के संभाव्य ताने-बाने से निर्मित उनके जीवनबृत्त का सहज ओर यथाथे स्वरूप अनावृत किया गया है। इसमें उनके व्यक्तित्व और एकमात्र व्यक्तित्व की परख का मौछिक प्रयास है इसीलिए, सिर से पैर तक प्रायः ऐसे ही प्रकरणों का सन्निवेश किया गया हैं जो व्यक्तित्व के स्पष्टीकरण में सहायक हैं| इसके केवल अन्तिम प्रकरण

( ने?) की योजना में ने अपने बडे ग्रथ के तुलसी का साहित्यिक उपद्दारा परिच्छेद के आधार पर की है, पर इसमें भी लत तुलसीदास के व्यक्तित्व की पहचान की नवीनता विशेष रूप से है अर, इस ग्रथ के अध्येताओं को यदि तुलसीदास के महान व्यक्तित्व ओर उनके दिव्य संदेश को कुछ भी अजुभति हुईं तो में अपने को सफल प्रयास समझूंगा मेरे विशेष परिश्रम, उत्पाइ और उल्लास का यह छोटा सा मधुर फल विज्ञ सहदयों को सादर समपित है। वे इसका आस्वादन कर इसके सारासार का निर्णय करें मुझे इस सबंदसे कुछ सुंह पर लाने का अधिकार नहीं

मकर सक्रान्त हे ५."

8० २०१०. + राजपति दीजित १४ जनवरी १६५४

विषय सूची

तुलसी को कृतियाँ--

तरामाणिक कृतियाँ और उनका रचना-काल पू७ १०-०७ कृतियों की तारतमिक योग्यता का निरूपण और वर्गीकरण ७५--६

तुलसी परिचय-- जीवन चरित की विविधता पृ७-.... विविधता के कारण-- पु० छ७न्‍न्‍फ निर्विवाद जीवनी की स्थापना पूृ० ८६-४-२० बाह्मसाजयो से जीवनीके भाह्य अंश पू> २०००-२५ साहित्यिक तथा मनोवैज्ञानिक जीवनी की स्थापना. पघरु० ३०--३७ गोस्वामी” उपाधि का सम पु० ३७०३९

तुलसी की संत-भावना---

संतों को व्यक्तिगत देवोपासना पु० ४०--४४ संतो का ध्याग- चु० ४३४---७५० संतमत और लोकमत का विरोधाविरोध पू० ७५०- -पहे स्त्रियों के प्रति संतों की परंपरा से गृद्दीत विचार पू० ५३०००६० संत और तुलसीदास की तुलना पूृ० ६४--६ संत प्रकृति ओर' लवधा सक्ति पघृ० ६९--०६७ शयरी ओर सुतीदुण--- घु० ६५--६५९ तुलसी का प्रभाव--- मानस की ख्याति ओर उसका उदास स्वरूप घू० ७०००-७४

समकालीन समाज पर प्रभाव पृ० ७४०००७

सर, "िरयदकी

रामलीला को प्रोत्साहन

परवर्ती समान पर प्रभाव

कला क्षेत्र में प्रभाव

रामायण की टीकाएँ

व्यास-पद्धति का प्रचलन

तुलसी के नाम पर अनेकानेक रचनाएँ आधु'ननक विद्वज्नों की सम्मतियाँ-- अपनी भ्रद्धाजलि--

तुलसी के संदेश--- आदश की स्थापना भक्ति की सावभौमिकता मानवता का प्रस्थापन एवं दानवता का निर्वासन

तुलसी की साहित्यिक देन ओर साधुता-- सगवत्मेम और काव्य नवीन विस्तृत क्षेत्र को स्थापना कतृप्रधाव एवं कम प्रधान काव्य की अपूर्वता-- भाषा का झादशे--- शब्द-शक्तियो में अभिनिवेश--«- स्वरूपाध्यायकों की योजना--- उत्कृषधायकी का विधान--- अ्रपकर्षाधायकों का परिहार--- आलता का निर्वाहु---

अमषनन८ू+.. भी वमिक्रमाए.- अहीकगरमफए अनिकरांकः

एछू० ७७५०-०० पू८ ७६--- चूृ७ अघ्द०-जष्य पृू० ८६१०-८७ घू० ध्र७--०८२६ पू७ &6६५5-«-९ पू० ९१-७-९३ एू० ९३--९६

घू७ ९७००-०५ पूं० ९९--१० घूं० १०३ १०८

पू० १०६--११० पू० ६११००- ११६ पु० ११६--८२३ पू० १९३--१३१ घु० १३१--१ २५ पू० १२४-- १४३ पू० १४४००२५६ ४० १५६०-१५ ६४६ छु०७ ३१ ७८६०-०९ ६०

तुलसी की कृतियाँ

प्रामाणिक कृतियाँ ओर उनडा रचना कल

यद्यपि गोस्वामी जी की कृतियों के संबंध में सभी समीक्षकों की चारणाएँ एक सी नही हैं तथापि स्वर्गीय रामगुल्ञाम द्विवेदी के विचारों से अधिकांश लोग सहमत हैं द्विवेदी जी के मतानुसार जो कृतियाँ तुलसीदास कृत ठहराई गई है, उन्हे निम्नांकित इन्द में देखिए-- “रामलछछा नहछू , त्यो विराग संदौपिनिहु, बरबे बनाइ बिरमाई मति साईं की। पारवती, जानकी के मंगल ललित गाइ, रम्य आज्ञा जिन कामघेनु नाई की। दोहा ओर कवित्त गीत बंध कृष्ण कथा कही, रामायन विनय मॉद्दि बात सब ठाई' को। जग में सुद्दानी जगदोसहेूँ के मन मानी, संत सुखदानी वानी तुछली गासाई की॥” छुन्द्से बारह कृतियाँ स्पष्ट हैं इनमें रामायण”, 'कवितावली', “गीता- वल्धी , 'दोहावली', 'विनयपत्रिका', ओर रासाज्ञा-प्रश्न! ये छुष्ट बडे म्न्‍्थ हैं तथा 'रामछला नहछू”, 'वैराग्य-संदीपिनी”, 'पावंती-मंगल्न!', 'जानकी-मंगल, “कृष्णगीतावल्ली” एवं “बरबे रामायण” छुद्ट छोटे अन्य यही बारह कृतियाँ तुलसीदास की प्रामाणिक कृतियाँ मानी जाती है'। कुछ मदाजुभावो का आम्रह है कि तुलसी सतसई' भी प्रामाणिक कृतियों की कोटि मे रखी जानी चाहिए | स्वय में भी नही चाहता था कि ऐसा चमत्कार और बैद्ग्धपूर्ण अंथ तुललीदास के अतिरिक्त आर किसी का कट्टा जाय; पर खेद है, तुलसीदासके रग से रंग चुकने पर उनकी अन्यान्य सभी प्रामाणिक कृतियो का निरन्तर परिशीक्षन कर यह छुन्द शिवनदन सहाय ने श्रपने ''भ्री गोस्वामी तुलसीदास का जीवन चरित्र” १५६ पर उद्घृत किया है दे० “इन्साइक्कोपेडिया श्राव रेलिजन एएड एथिक्स” भाग १२, 2० ४७०

संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

घुकने पर उनका जो प्रभाव मुझ पर पढ़ा उसके आधार पर जब 'तुनसी सतस्तई' की जाँच करता हूँ तो स्वभावतः इसी निष्कर्ष पर आता हूँ. कि “तुज्षसी सतसई' गोस्वामी तुलसीदास की कृति नही है।

मेरे इस निष्कर्ष के कारण भी अत्यन्त संक्षेप में उल्लेखनीय है तुलसी- दास को इतर प्रामाणिक रचनाओं में काव्य की जिस सीधी ओर हृदय स्पर्शिनी शेल्ली का प्रत्यक्षीकरण होता है 'सतसई' में उसका अभाष है यदि अन्‍्यान्य रचनाओ में हृदय के भावोद्वेक की व्यंजना होती है तो सतसई' मे दिमागी कसरत की तुलसीदास जी दिमाग की हलाली करके कविता करनेवाले नहीं थे उनके मत से तो नसर्मिक सरिता-प्रवाह की भाँ ति कविता-प्रवाह सी स्यद्‌- मान्‌ होना चादेए

'घतसई' में 'दोदावल्ली' के जो पोने दो सो दोहे सन्निविष्ट हैं, यदि उन्हे अंथ से एथक कर दिया जाय तो शेष दोदो से स्पष्टतया परित्नक्तित होता है कि यह गोस्वामी जी की कृति नहीं है| यदि वह उनकी कृति होती तो क्‍या इसके रचनाकाल ( सं० १६४२ ) में वे ऐसी निबंश ओर निरोज भाषा लिखते यह हमारी अदूरदशिता नहीं तो क्या होगी कि मानस जैसे भद्दाकाब्य सें भाषा पर पूण अधिकार प्राप्त कर लेने के अनन्तर 'सतसई' की-सी लचर और झसमथ भाषा में रचना करने का भार उन पर ल्लादें। 'सतसई' में ऐसे दोहो की भरमार हे जिनकी व्याख्या के हेतु अध्याहार करते-करते टीकाकारों के नाको दुसम गया होगा ऐसी असमसथंता तो तुलसीदास के दोहों की पहचान नहीं है

नीचे दो-तीन ऐसे दोहे दिये जाते हैं जिन्हें देख कदाचित्‌ ही कोई महाशय स्वीकार करें कि गोस्वामी जी ऐसी ही लचर भाषा लिखते थे--

“सत्तिल सुकर सोनित समुकु, मल्ल अरु असथि समेत

बाल कुमार जुबा जरा है सो समुकू कर चेतः॥” ०५ >(

सरनागत तेहि राम के जिन्द दिय घी सिय रूप। जा पदनि घर उदय भये, नासे अ्रम तसम कूप॥”

मद ४५ २५

“तुलसी सतसई” द्वितीय सर्ग दो० २०४ र्‌ वह्दी १) )8 ५4४

तुलसों की कृतियाँ

५जहूं ते जो आयेड सो है, जाइ जहों दै सोइ।! तुलसी बिनु गुरु देव को किसमि जाने कहु कोइ! ॥”

'सघतसई' में कुछ ऐसे शब्द भी प्रयुक्त हुए हैँ जो गोस्वामी जी की किसी अन्य रचना में नही हैं यथा 'तोहदरों तुम्दार ), 'वाय! ( वाहि ); 'जगत्न' ( जगत्‌ ); कमान” ( सेना ) “मामिला!; बिजिन ( दुश्ख ) आदि इनके आधार पर भी इसी विचार का समर्थन होता है कि इसका रचयिता कोई ओर रहा होगा गोस्वामी जी नही “सतसई' में 'कना” शब्द मकरा के अथ में प्रयुक्त हुआ है। पं० सुधाकर द्विवेदी ने दिखाया है कि उक्त शब्द गाजीपुर का प्रातिक शब्द है और इसके आधार पर उन्होने 'सतसई' रचयिता को गाजीएुर-निवासी ठहराया है। यही नहीं पंडित जी ने फारसो के 'ऐन' “गेन' वर्णों पर उसकी करामाती कढ्पना' देखकर उसे कायस्थ-जाति' का घोषित किया है।

पतसई' में निरूपित सिद्धान्तों के आधार पर भी वह गोस्वामी जी की कृति नहीं कही जा सकती | उसमें जानकी उपासना को बहुत प्रश्नय मिल्रा है तुलसीदास ने अपने किसो ग्रंथ में सीता को राम से प्थक्‌ या प्रधान सान कर उनकी वंदना नहीं की है सतसईकार ने ज्ञान और भक्ति का परस्पर संबंध दिखाया है उससे अवगत होता है कि उसने ज्ञान को भक्ति से श्रेष्ठ स्वीकृत करके उसे चरम साध्य ठहराया है। इधर गोस्वामी जी के मत में भक्ति ही चरम साध्य है|

सतसई' से जानकी उपासना संबंधी तथा 'दौद्दावल्नी' के सभी दोहे निकाल देने पर जो दोहे बचते हैं यदि उन पर ध्यान देकर विचार किया जाय तो ऐसी प्रतीति होती है कि 'सतसईं” का निर्माता कोई निशु ण॒ मत का अचा- रक था तभी तो कबीर के आत्माराम और सत्गुरु माहात्म्य संबंधी उदक्तियों झौर तदह्िषयक सतसई” की उक्तियो में पूर्ण साइश्य है।

अन्त में, हम इतना ही कहना चाहते हैं कि 'सतसई” किसी पसे व्यक्ति की कृति है जो गोस्वामी जी के महत्व को भछी-भाँति समझे था; उसने बाबा

जी के दोहो को अहण कर उसी में स्वरचित दोहे जोड़ कर 'सतसई” तैयार की

वह्दी 99 35. ९८6

दे० 'तुलसी सतसई' तृतीय सगे दो० २४२

हे ;, ५...» चत॒र्थ सगे दो० ३६२, ३६३ ठुलसी झुधाकर' पृ० १४

छः संत तुलसीदास और उनके संदेश

और इस प्रकार गोस्वामी जी की ओट में अपने सिद्धान्त लोगों के पास सुग- मता से पहुँचाना चाहा गोस्वामी जी की प्रामाणिक कृतियों में से 'रामाज्ञा-प्रश्न', 'रामचरित मानस और 'पावती-संगल' ऐसी है जिनका रचना-काल उन्ही में इज्जत है देखिए 'सशमुन सत्य सस नयन गुन, अवधि अधिक नय बान | हाइ सुफन् सुभ जासु जसु, प्रीति प्रतीति प्रमान ॥” 'रामाज्ञा अश्न' सर्ग ७।४ “संबत सोरह सो इकतीसा। करउठ कथा हरिपद धरि सीसा ॥” सानस बा० ३३.४ “ज्ञय सबत फागुन सुदि पाँचे गुर दिलनु। अम्विन विरचेड मगल्, सुनि सुख छिनु छिनु ॥” 'पावती मंगल” छु० प्रथम उदरण में कवि परंपरा के अनुसार संख्या सूचक जिन सांकेतिक शब्दों का प्रयोग हुआ है वे हं--'शशि', नयन', गुण”, “नय? ( नीति ), याण दोहे के अर्थ पर दृष्टि रखते हुए यदि संख्याएं रखी जाये तो वे १, २, 5, होगींक इन्हे अंकानां वामतो गतिः? के अनुसार पढने पर १६२१ होगा इस प्रकार 'रामाज्ञा-प्रश्न का रचनाकाल सं० १६२१ हुआ

दूसरे अवतरण से स्पष्ट ही हे कि (मानस! का रचताकाल सं० १६३१ है

तोसरा अवतरण प्रकट करता हैं कि 'पावती-मंगल' की रचना के समय जयसंबत की फाह्युनी सुदी पंचमी बृहस्पतिवार और अश्विनी नक्षत्न वतमान थे | डा० अयसन ने पं० सुधाकर हिवेदी से गणना करा कर दिखाया है कि जयसंजत्‌ संबवत २६४ ह१' में पढा था | अतएवं 'पावती-संगल' का रचनाकाल सं० १६४३ है।

शेष नवों रृतियों के रचनाकाल का आनुमानिक निर्देश तुलसीदास के कई समभीत्षको ने किया है, उनमें डा० माता प्रसाद शुप्त का अनुमान अधिक समी-

' काव्यलक्षण ग्रथो से अवगत होंता है कि शशि १, नेत्र २, गुण ६, नीति श्रोर बाण के लिए प्रयुक्त होते हैं।

दे० केशवदास $ 'कविप्रिया' शीषक ११, छुद टीका तथा छुद ७, १६, १०, १८

दे० 'इडियन ऐंटीक्वेरी' सन्‌ १८६३ पु० १५-१६

तुलसी की ऋृतियाँ

चीन और तकयुक्त हैे। उनके तकाँनुसार 'रामललानहछू! क। रचनाकाल सं० १६११, “वैराग्य-संदीपिनी! का सं० १६१७, “जञानकी-मंगल' का सं० १६२७, 'गीतावली” और विनयपत्रिका' का सं० १६०४३, 'कृष्णगीतावली' का सं० १६५८ तथा “बरबे रामायण” 'दोहावली' एवं “कवितावली' (सबाहुक) का सं० १६६१ से १६८८० के बीच पडता है'। इन अनुमान सिद्ध रचनाकालों को भहण कर लेने में मुझे कोई आपत्ति नही

यद्यपि होनहार विरवा के चिकने पत्ते आरम्भ में दी उसकी श्रेष्ठता का आ्राभास देते है, पर वस्तुतः उसका महत्‌ रूप, उसकी उपयोगिता तो काला- न्तर में ही प्रकट होती है। प्रकृतितः वह नाना प्रकार के सम-विषम वाता- वरण में लालित-पालित होने के बाद हो बृक्ठ की सज्ञा प्रात करता और संसार को शीतल छाया प्रदान करता है | महाकवि के काव्य का विकास भी ऐसा ही समझना चाहिए | वह श्रपनी काब्य शक्ति जन्म से लेकर आता है, कितु इस बीज का विकास और परिपाक समयोपरान्त ही द्ोता है। इस बीज के विकास के साधन ह--अनेक शाखों का अध्ययन, जीवन क्वा व्यापक अनुभव एवं कविता करने का सतत अभ्यास | कवि की नेसर्गिक काव्य प्रतिभा उ्यो-ज्यों इन साधनों का योग पाती जाती है त्यो-त्यों वह निखरती चल्षती है। यही कारण दे कि कवि की प्रारम्भिक और प्रौढ कृतियों में आकाश- पृताल का अन्तर दिखाई पडता है। इस आधार पर भी अलुमान किया जा सकता हैं कि कौन कृति क्रिस अवरुथा की है। इस प्रकार भी रचनाओं का वर्गीकरण होता हे

कृतियों की तारतमिक योग्यता का निरुपण और वर्गीकरण

गोस्वामी जीकी सभी प्रामाणिक कृतियों का परस्पर मिल्लान करने पर उनमे काव्य-पहुता का उत्तरोत्तर क्रिक विकास भी इष्टिगत ड्ोता है। यही कारण है कि कुछ कृतियाँ अन्य की अपेक्षा अधिक काव्य-सोष्ठव और गास्मीय- युक्त दे प्रतिभा प्रगति के आधार पर उनकी कृतियों का वर्गीकरण यों होगा--प्रथम श्रेणी अर्थात्‌ उनके काष्य-जीवन के प्रभातकाल की वे कृतियाँ जिनमें एक साधारण नवयुवक की रसिकता, सामान्‍य काव्यरीति का परिचय, सामान्‍य सांसारिक अनुभव, सामान्य सहृदयता तंथा गम्भीर आध्यात्मिक विचारों का श्रभाव मिल्वता है। इनमें वस्य विषय के साथ अपना तादात्म्य करके स्वानुभूतिमय वर्णन करने की अबृत्ति अवश्य वर्तमान है, इसी से प्रार-

तुलसीदास” पृ० २५३-२५४

हू संत तुलसीदात ओर उनके संदेश

म्मिक रचनाएँ भी इनके मदहाकबि होने का आभास देती हैं। प्रथम श्रेणी मे 'नहछू', 'वैराग्य संदीपिनी,, 'राम्ाज्ञाअ्श्न' ओर “जानकी मंगल्न” परि- गणनीय हैं |

दूसरी श्रेणी में उन कृतियों को समझना चाहिये जिनमें कवि की विशद लोकब्यापिनी बुद्धि, उसकी सद्ग्राहिता, उसको काव्य के सूचम स्वरूप की पहचान, उसकी व्यापक सहृदयता, उसकी अनन्य भक्ति और उसके गूढ आध्यात्मिक विचार विद्यमान हैं। इस श्रेणी की कृतिथी को हम तुलसी के प्रौद और परिपक्व काब्य-काल की रचनाएँ मानते हैं। इसके अन्तगत 'मानस' 'पावंती-मद्ल?, “गीतावल्ली', 'कृष्ण गीतावत्बी/ आयेगी। इन्हे इस कवि की मध्यकाक्षीन रचनाएं भी कष्ट सकते दे

अन्तिम श्रेणी में उनकी उत्तरकाल्लीन रचनाएँ आती हैं | इनमें कवि की प्रौढ़ प्रतिभा ज्यो की त्यो त्रनी है और कुछ में वह आध्यात्मिक विचारों को प्राधात्य देता हुआ दिखाई पढ़ता है | साथ हा अपनी अन्तिम जरा अवस्था का सकेत भी करता है; अपने पतनोन्मुख युगको चेतावनी भी देता है | “व्रिनयपत्रिका', “बग्वे रामायण किवितावल्वीः! सबाहुक तथा “दोहावली' तीसरी श्रे शी में रखी जा सकती हैं

नह

तुलसी-पारिचय जीवन-चरितकी विविधता

काव्य, साधथुता और मानवता के क्षेत्रमें संसार की दैष्टि में अपना गौरव- पृण स्थान रखने वाले तुलसीदास के जीवन-चरित के विषय में लोगो की विविध धारणाएँ अपूब कुतूहल पेदा करती हैं। महान आप्माओं के विषय में प्रायः देखा जाता है कि उनका जीवन-चरित ही कुछ ऐसा गृढ होता है कि लोग बराबर उसकी छानबीन करते हुए अपने-अपने मतानुसार गान भी करते रहते दे यही गोस्वामी जी के साथ भी दो रद्दा है। जिसकी दृष्टि मे तुलसी विषयक जो नवीनता दिखाई पडती है वह उसी का मण्डन करता है। उनके जीवन-चरित के विषय में जो विविधता दिखाई देती है, उसे ये भ्रश्न ही सूचित करेंगे ।--गोस्वामी जी किस शुभ मुहूर्त मे अवती्ण हुए ! किस भव्य माता-पिता के नाम्न को उन्होने उज्ज्वल किया ! किस विशिष्ट स्थानकों इनकी अन्मभूमि कहलाने का सुयश आघ हुआ किन आखियों ने उन्हें अपना स्वजन कहने का सौभाग्य पाया ! किस गुरु ने ऐसे गुरु को अपना शिष्य बनाया कौन-कौन सी विशेष घटनाएं उनके जीवन में घटित होकर स्वयं कृताथ हुईं इन कतिपथ श्नों के एथछ-पएरथक्‌ उत्तर-दाता अनेक मिल्लेंगे। यही तो विविधता हुईं | अब इस विविधता के मूल कारण को जन्म देने वाली बात पर ध्यान देना चाहिये

विविधता के कारण

महत्त्याकांदाओं में कीति और सम्मान का विशेष स्थान है। साधारण मनुष्यो का कुछ कहना ही नही, उदात्त चरित व्यक्ति भी कीर्ति-पिपासा का शमन नही कर सकते मिल्टन का कहना हैं--“यशः सरुपहा उदास लोगो कौ अन्तिम दुबलता है? | ( 8770९ 78 076 |480 470#70770ए 0 707]0 प्रां705 ) इससे स्पष्ट है कि बे से बढ़ा सांसारिक पुरुष भी अपनी भतिष्ठा का भूखा होता है। इन महत्वाकांदाओं की और भी दिशाएँ हैं।

हट संत तुलसीदास और उनके सदेश

क्या विद्या, क्या ऐश्वय, क्या बल, क्या कला, किसी क्षेत्र में मनुष्य अम्नसर होना चाहता है। वह किसी विशिष्ट स्थान पर पहुँच कर ख्याति पाने के पूर्व ही संसार को अपना परिचयात्मक विज्ञापन देता रहता है कि मै अमुक महान्‌ कार्य की ओर प्रवृत्त हो रहा हूँ कुछ बडे-बड़े महत्वाकांसत्षी कवियों ही को लीजिए | वे प्राय, अपनी रचनाओ के पूर्व अपना वंश-परिचय आदि देकर तब आगे बढते हैं। ऐसा करने से उनकी ख्याति उनके पूवजों की ख्याति को विस्तृत करती हुईं स्वयं बढती है। परन्तु, इसके विपरीत कुछ अपवाद स्वरूप ऐसे प्राणी भी होते हे जिन्हे इसकी वनिक भी चिता नहीं रहती कि में श्रमुक बढ़ा काय करूँ जो मुझे: सम्मान के शिखर पर आरूढ करे; ऐसे लोगो के क्च्य महत्तम होते हैं ओर धिक से अधिक वे इतने ही के झभिलाषी होते हैं कि उनके कार्य से विश्वका परम कब्यांण हो वे कोन है ! उनका क्या पता है ! इन बातोको वे गुप्त द्दी रखते हैं। भल्ले ही संसार छान- यीन करके जान ले पर वे स्वयं नही जनाना चाहते। ऐसे विचार वाले सच्चे सन्त ही दो सकते है। क्‍यों कि-- लोक सान्‍यता झनल्न सम कर तप कानन दाद समझ कर वे सदेव अपने को तुच्छु मानते हैं। परम सन्‍्व तुलसीदास ने भी ऐसा ही किया है। उन्हे क्या पडी थी जो अपना परिचय देने जाते अपने उदात्त लक्ष्य जिससे समस्त संसार, समस्त मानव जाति का कल्याण हो सकता है उसका परिचय तो विविध विधि से करा ही दिया है। जिसका जी चाहे राम से परिचय पूण परिचय कर से यदि तुलसी से परिचय करना चाहे तो राम के सेवक के नाते सवन्न तुलसीदास भी पढ ले | इतना दी नही उनके जीवन की उन दिशाझ्रो की भी कूॉकी कर ले जिनके प्रभाव से सुलसी तुलसीदास हुए इससे अ्रधिक अपने विषय से कहने को आवश्यकता ही क्या थी एक पहुँचे हुए महात्मा को। अस्तु, अंतः साधुयो के आधार पर भले ही अपूर्ण किंतु निर्विवाद जीवनी प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है |

निर्विवाद जीवनी की स्थापना

गोस्वामी जीने किसी आाह्यण-कुलमें जन्म अ्टण किया था। यह बात “विनयपन्निका” और कवितावली की कुछ उक्तियों से प्रकट होती है। आह्षण-कुल साधारणतः यो दी वेसवशाल्री नहीं होता, पर जिस छुल् में

(१) दे० 'विनय० * पद्‌ १३५ [१] “दियो सुकुल जनम सरीर सुंदर ***मुरारिको ।”” (२) ,, कंविता० उ०७० ६३ “भल्रि भारत भूमि भलो कुल जन्म'* 'लहिके ।”

तुलसी परिचय

तुलसीदास जी अवतीण हुए वह तो बहुत ही ढीन था। उसकी विपत्ति- ग्रस्तता का अनुमान इसी से किया जा सकता है कि वहाँ पुन्नोत्पत्ति के अवसर पर भी असन्नता की शहनाई नहीं गूंजी भ्त्युत माता-पिता को विषाद ही हुआ , क्योकि वहाँ आनन्द-बधाई के लिए पूँजी थी, यह बिल्कुल स्वासा- विक बात है कि अत्यन्त निधन को पुतन्नोत्पत्ति के समय भी चिंता रह्दती है कि हाय | भगवान्‌ ! अकेले तो किसी प्रकार उपवास भी करके सो रहते किन्तु झब इस कोमल बालक को सोर-शुह में क्या दें अवश्य ही तुलसीदास के माता-पिता ऐसे दी विपद्ग्रस्त दीन ब्राह्मण थे तस्री तो उन्हें पुत्रोत्पत्ति का सुअवसर भी विषादमय ही प्रकट हुआ |

ये महाराज अत्यन्त दीन कुल में जन्म भमहण करने का श्रेय ही लेकर नही आए; बाल्यकाल में ही अनाथ भी बन गये; जननी-जनक त्याग कर चले गये थे एक अनाथ बाल्क जिसके आगे-पीडे कोई नहीं, उसकी कैसी दशा थी; बेचारा द्वार-हार भीख मॉगने के अतिरिक्त कर दही क्‍या सकता था। भिखमंगों की भाँति पेट खत्ला-खला कर भिक्षा के लिये दाता के पैरो तक पड़ना पढ़ता था; लोगो की अपमान भरी इष्टि को देखना पडता था। पेटांगि के कारण सुजाति-कुजांति सब का दिया हुआ हुकड़ा खाना पढता था | एक झनाथ बालक ऋर समाज के मुट्ठी सर दाने के द्विये कितना दुखी ओर अपमानित होकर घूमता था इसका अनुमान “दुखड दुखित मोद्दि हेरे” से किया जा सकता है। ऐसे अनाथ की खिन्नता की अनुभूति बिरले उदार सन्त महात्मा ही कर सकते हैं हुईं भी यही बात तुलसी की दीनावस्था देख एक सन्त महात्मा का हृदय द्ववीभूत हो गया; उन्होंने बालक को आश्वासन दिया | राम-भक्ति का उपदेश किया अनाथ बालक ने एक संबल पा दिया | उसके

१, कैविता० उ०छु० ७२ 'जायो कुल मंगन' ' “'*'तिनको तनको |”! दे० कविता०” उ० छु० ५७ 'भमातु पिता जग जाय तज्यो ७०७ ७७७ ०९००७०७ 'खोरि लाई हैः विनय०” पद २२७ "जननी जनक तज्यों जनमि, करम बिनु बिघधिहुं सज्यों अवडे रे ।”” हें 'विनय०” पद २७५ “द्वार द्वार दीनता कही काढि रद परि पा हूँ” » केंविता०” उ० छु० ७२ जाति के, सुजाति के, कुबाति के, पेशमगि बरस, खाये ट्रक"? धू, ,, विनय०” पद्‌ २२७ रे

१० संत तुलसीदास और उनके संदेश

हृदय में राम-सक्ति का अंकुर उगने छूगा | बाल्य-हृदय मे सांसारिक बासनाओ के कंटकों का अभाव होने के कारण राम-प्रेम का पौदा अबाध गति से बढने लगा और कालान्तर सें अक्षयवट हो गया। बालक बिना सोल का ही रास का दास हो गया; उसे अपने भाग्य में रामनाम ही की ओट लिखी मिली ॥.इस प्रकार निष्कपट भाव से राम-सक्ति की ओर पेर बढाते जाने और रूखा-सूखा माँग कर खाने से भी उसे शांतिमय जीवन की अनुभूति बाल्यकाल ही मे होने लगी इससे संदेह नही कि संत ने दयाक्र होकर बाल्षक को रामभक्ति का सहारा दिया आर उससे उसे शांति की अनुभूति हुईं, परन्तु इसी संबंध मे यह भी स्मरण रखने की बात हे कि बाल्यकाल मे ही रामभक्ति के साथ हनु- मान की भक्ति भी इस बालक को अतिग्रिय थी बाल्यावस्था से ही हनुमानने इसे अपना बना लिया था | इतनां हो नहीं, बाल्यकाछ से ही तुललीदासका कोमल हृदय शिव की भक्ति की ओर भी छुका था इसीबलिये इन तीनों के प्रति उनके हृदय में अन्तत, अविचल, अटल, अन्य, प्रम बना रहा। उन्होंने इन तीनो को क्रमशः साद्देब', 'सद्ाय' ओर “धुरु के रूप में देखा और इन तीचों के अतिरिक्त अन्य किसी देव को अपनी आराधना का पात्न नही बनाया | बाल्यावस्था का और कोई दृश्य उपस्थित करने के पूव बाल्यकाल के नाम का संकेत भी अंतःसानज््य के आधार पर देखिये-- “राम बोला नांस हो गुलाम रास साहि को*।” >< 4 ५९ “राम को गुठाम नाम रास बोला “- -- ।?” सम्सवतः इन्हें राम-नाम जपते देख लोग राम बोला कह कर पुकारते रहेहोी। तुलसीदास बाल्यावस्था मे कहाँ बिलबिलाते थे, इसका कोई अंतःसाक्ष्य नहीं | पर, अनुमान किया जा सकता है कि जहाँ पैदां हुए थे उसी भूमि में मारेमारे फिरते रहे होगे ओर वह्दी किसी रसते साधु ने दयाह होकर उन्हे

हिनु० बा०” छ० रे८ "हो तो बिन मोल ही बिकाने बलि बारे ते।” ,, कविता उ० छु० ४० “बालपने सूधे मन राम सन्मुख भये'* १” दनु०चा०?छु० २१ “बालक विलोकि, बलि, बारे ते आपनो कियो**।”? 9 वही “४३ 'सीतापति 'साहेब' सहाय हनुमान'""'*' गुरुके ।” (१ 'कविता०? उ० छु० १००

विनय०” पद ७६

तुलसी परिचय ११

अपने साथ कर लिया होगा तुलसी के बाल्यकाल का वह अंश जिसमे उनके हृदय में राम भक्ति का बीज अंकुरित होकर बंद रहा था गुरु के साथ शकर क्षेत्र” में बीता | गुरु उन्हें बार-बार राम-कथा सुनाया करते और वे सरल हृदय की जिज्ञासु वृत्ति से उसे समझने की चेष्टा करते

इस प्रकार यवाब्यकाल गुरु के समीप रामकथा के श्रवणादि में व्यतीत होता रहा श्रवणादि को यहाँ व्यापक अथ मे लेना चाहिये अर्थात्‌ अध्ययनादि भी इसके अ्रन्तर्गत मानना चाहिये क्योकि बिना यथेष्ट अध्ययन के नानापुराण निगमागम का ज्ञान इन्हे केसे प्राध्ष होता इससे स्पष्ट है कि बाल्यकाल में गुरु के पास उन्होंने विद्या एवं राम भक्ति दोनों का अक्षय भंडार प्राप्त किया तदनन्तर सम्भवत' ये जन्मभूमि में रहे हो या कुछ कालोपरान्त रमते फकीर हुए हो इस विषय में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता इसका कोई अन्त.साक्ष्य नही कि गुरु का स्थान छोडकर वे किधर बढे हो सकता कि सीधे पर्यटन करने में हो लग गये हो इस विषय से कुछ ओर कहने के

; ,

पूत्र गुरु के नाम का प्रसग यही समाप्त कर देना चाहिये ६५कोई अंतःसाक्ष्य नहीं मिलता जिसके आधार पर हम गोस्वामी जी के उस महान गुरु का नाम बता सके जिसने इन्हे 'शुकर क्षेत्र! में कथा सुनाई और अमित विद्या-दान दिया तुलसी ने अपना असली गुरु किसे माना है यह पहले ही संकेत किया ज्ञा चुका है। पर व्यावहारिक शिक्षा-गुरु का नाम उन्होने नहीं दिया है। विद्वानों ने स्वामी रामानन्द की परंपरा से संबद्ध नरहर्यानंद को तुलसी का गुरु माना है। ऐसा करने के लिये--“बदुउ' गुरुपद-कंज कृपा-सिंधु नर- रूप हरि ”” के अतिरिक्त ओर कोई अंत, साचय नहीं परतु इस सबंध में “नर रूप हरि! का नरहथांनंद अथ लगाना मनमाना हो जाता दे | वस्तुतः “नर रूप- हरि से गुरु का श्रेष्टत्व ही दिखाना मानना चाहिए। कि नाम-निर्देश गुरु का नाम जाने त्रिना हम गोस्वामी जी की गुरु-पर परा का निद्श केसे कर सकेंगे, इस कठिनाई से बचने के किये नरहर्यानंद को तुलसी का गुरु मान लेना उचित नहीं | वस्तुठः उनकी मान्य गुरु-परंपरा क्या थी इसे मैंने अपने अथ तुलसोदास और उनका युग के तुलसी की आचीन परंपरागत भक्ति!

जााााााााााााात५ ५5 आल का

मानस बा० ३०. मानस” ३०.१ हे मानस” बा० मगलाचरण सोरठ यह ग्न्थ 'शानमडल लि०? बनारस से प्रकाशित हुआ है।

“2 “०४

१२ संत तुलसीदास और उनके संदेश

शीपक परिच्छेद के अन्तगंत 'गुरुपरंपरा' में विस्तार पूवंक दिखाया है। अत- एवं उसकी चचा यहाँ नहीं की जाती

तुलसीदास गुरु के यहाँ से कब और किस अवस्था में निकले और कहाँ गये इन प्रश्नों के विषय में हम कोई अन्तःसाक््य नहीं उपस्थित कर सकते हाँ ऐसा अनुमान कर सकते है कि गुरु के घर से लोटने के अनन्तर ये कुछ अनियत वर्षों तक चाहे तीथथ-स्थलो में घूमते रहे हों चाहे गाहस्थ जीवन ही बिताते रहे हैं; इनके गाहस्थ जीवन बिताने को भी हम अंतःसाथय से प्रमाणित नहीं कर सकते जैसा कि लोगों ने “बाहुक” की एक पंक्ति! और “दोहावली * के एक दोहे से करना चाहा दे। वस्तुतः हस विषय पर बाह्य साकिय के आधार पर ही विचार हो सकता है। अतः इसकी चर्चा आगे होगी | सं० १६३१ में ये अयोध्या में गोस्वामी तुलसीदास बने विराजमान थे वहीं राम के चरण! में सिर कुका कर रामचरित मानस' की रचना का प्रारम्भ कर रहे थे इससे इतना तो निर्विवाद है कि वे अयोध्या में भी रहते थे

गोल्वामी जी के जीवन-चरित में अयोध्या के अतिरिक्त काशी भी यहुत महत्त्वपूर्ण स्थात रखती है। उनके काशी से संबद्ध जीवन पर प्रकाश डालने वाले यथेष्ट अन्तःसाक्य उपलब्ध हैं। फाशी में ये गंगा जी के किनारे कही बाबा विश्वताथ की शरण में रहते थे | देखिए---

“हेवसरि सेवों वामदेव गांड रावरे'*"।”? ३९ ५८ 9८ २८

“चेरो राम राय के झुजस सुनि तेरो हर, पॉइतर श्राइ रश्ो सुरसरि तीर हो ।” उस 'सुरसरि तीर के नाम का पता अ्रंतःसाकय से नहीं चतता। फलत; इसका विवेचन बाह्मसाचय के आधार पर होगा काशी में तुलसीदास का झागसन कब हुआ यह सी जिज्ञास्थ है| सं० १६३५ में ये अयोध्या में विद्यमान थे, इसलिए सं० १६३१ के उपरांत ही उन्हों ने काशी में पदापंण किया होगा कितने दिन बाद आए इसकी निश्चित तिथि अन्तःसाक्य के

(१) दे० बोहुंक छु० ४०

(२ ) ,, 'दोह्दावली' दो० २५४ ( है ) मानस" बा० ३३.४,५ ( ) 'कविता० उ० छ० १६५, (५ ) वही ५» 9 ९६

तुलसी परिचय १३

झाधार पर नही कही जा सकती 'मानल' के किष्किधा कांड का सोरढा-« “जाई बस संभु भवानि, सो कासी सेह्य कस |” से व्यंत्रित होता है कि इसके पूथ वाले कांडो की रचना अयोध्या ही में समाप्त कर तब्र बाबा जी काशी सेवन करने आए इतने रुचिर तीन कांडों की रचना जितने भी वर्षों में मान क्ञी जाय, सं० १६३१ के उतने ही समयोपरान्त इनका काशी में आगसन मानना चाहिए। वावंती संगल' का रचनाकाल उसके झन्तः- साय के आधार पर सं० १६४३ है| यह पहले द्वी कहा जा चुका है कि कानस! की रचना का समारस्त सं० १६३१ में अवध में हुआ झोर उद्नके अन्तिम चार काडो कौ समाप्ति काशी में हुई। इससे इतना अनुमान तो अवश्य ही किया जा सकता है कि वे काशी में १६३१ झोर १६४३ के बीच किसी समय झाए और तदुनन्तर स्थायी रूप से यहाँ रहे। स्थायी रूप से रहने की तिथि निर्देश के मेरे इस अनुमान का अश्रभिम्राय यह नहीं समझ बलेना चाहिए कि यह समय उनका श्राद्य काशी ग्रागमन सूचित करता है। प्रारंभिक काशी--श्रागमन कब हुआ यह नहीं कद्दा जा सकता। “रामाजशा-प्रश्नो के रचनाकाल के श्रन्त.सादय पर एवं उसमें प्रयुक्त “गंगाराम' नाम देख कर कुछ विद्वान उनका काशी-झागमनकार सं० १६२१ के पहले मानते हैं हो सकता है इस तिथि के पूत्र वे बतोर यात्री के काशी आए हो

यो ही किसी स्थान के व्यक्ति भी किसी नवीन आगमन्तुक को देख चॉोंकते

हैं। यदि आगमन्तुक में कुछ निरालापन हुआ तो फिर कहना हीं क्ष्या तुलसी दास के काशी आगमन के अवसर पर कद़ाचित्‌ ऐसा ही हुअ।। उनकी डदार राम-भक्ति को रूदिवादियों ने और का ओर ही समझा, फ़ल्लतः उनके विषय में छोंगो की सिक्ष-मिन्‍न धारयणाएँ हुई-कुछ लोगों ने 'कुसाजँ-- कर्ता समझा, अन्य लोगो ने भारी दुगाबाज' तक कष्ट ढाला और कुछ विचार- शीलों ने राम का खरा भक्त माना इस प्रकार कारी के लोगो ने प्रवाद फेलाए, पर उनका हृदय विचद्धित नहीं हुआ | ये अपने भक्ति-साग पर डे रहे | रामनाम के अमृत से अपनी तृषा शांत करते हुए काशी-सेवन करते ही

(१ ) मानस”! किष्कि० मगलाथरण

(२) 'पावती मंगला' छ०

( हे ) ना० प्र० प०? भाग १६, ४० ३१४

(४ ) कविता? उ० छु० १०८ “कोऊ कहे करत कुताज'*' ।?

१४ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

रहे “मांगि के खैबो मसीत को सोहबो” से भी परितुष्ट रहे गोस्वामीजी को काशी में जिन विविध अकार के संघर्षा का सामना करना पडा उन सबका निर्देश करने के पूत्रं उनके मूल कारणों को समझ लेना चाहिए

काशी शिवकी पुरी होने के नाते सदा से शवों की गढ रही है। अन्य प्रकार के पंथी भी अपने-अपने घधोसले यही लगाकर रहते चले आए है। शेतरो के जे,ड का दूसरा सम्पदाय वेष्णवों का है. वह भी काशी का सेवन बहुन दिनो से करता चला रहा है एक बन में दो सिद्दों के रहने पर शाति कैसी ? हा, छोटे-मोटे जीव भत्ते ही इघर-डथर रह सकते है। यही दशा काशी में थी। सिहवत्‌ शेव और वेष्णच सम्प्रदायों मे सघर्ण चलना करता था | उसी अवसर पर बाबा जी भी अपनी झोली लिए आए इनकी राम- भन्धि के नाम से ही शवों ने यदि इन्हे वेष्णव मान कर इनका तिरस्कार किया हो। तो कोई आश्वय नहीं इसके अतिरिक्त वेष्णवों ने भी इनको शिव में दृढ श्रास्था देखकर और रामभक्ति का विशेष उदार स्वरूप पाकर इन्हे ढोगी समझा हो तो कोई अस्वाभाविक बात नहीं देव भाषा' को छोडकर सभाखा' में भगवान्‌ का चरित छिखना भी कट्टर पंडितों के विरं।ध का कारण हो सकता था | अन्य पंथियों ने इन्हे अपने पथ के सकीण घेरे का जीव पाकर इनकी उपेक्षा की हो यह भी सम्भव था। अन्धी जनता में इतनी जमता ही नहीं होती कि वह तुरन्त किसी महान व्यक्ति के महान्‌ क्षय को समरू ले इन्ही कारणों ने नुलसीदास को काशी में आते ही सान-अ्तिष्ठा नहीं पाने दिया अत्युत कुछ समय तक तिस्स्कार का लदय वनाया |

खल्लो के द्वारा विरोध तो हुआ ही करते हैं उसके लिये कोई कारण नहीं ढृठना चाहिए। कुछ दुष्ट लोग गोस्वामी जी को अवश्य तंग करते थे, आंख दिखाते थे कुचाल भी चलते थे ये दुष्ठ कौन थे? हो सकता है कि बे कुछ ईष्यांलु या संकीण साम्प्रदायिकता के टोगी ज्फगे रहे हो

शिव के भक्त कहे जाने वालों में भी कुछ लोगों ने गोस्वामी जी को कष्ट पहुँचाया था सम्भवतः उन लोगो को आशंका हुईं हो कि कही तुलसी की रामभक्ति का अचार इतना अधिक हो जाय कि शेव धर्म को भी दबाने क्गे ऐसा सोचकर शिव के उपासकों ने उनका घोरतम विरोध किया और उनके

( रु ) वहाँ +#$ ९०६ (२ ) दोहावली” दो० १४४ “ुलसी रघुबर सेवकहि ''*** | ( ) बंदी » १४५३ “"रावन रिपु के दास ते **'**“**व

तुलसी परिचय १४५

विरोध ने तुलसी का जैय छुड़ा सा दिया ओर वे काशी छोडने के लिये सच्नद्ध हो गये--- “दं।व जाग तुलसी लेत काहू को कछुक लिखी भलाई भाछ, पोच करत हो | एते पर हू जो कोऊ राबरो हे जोर करे, ताको जोर, देव दीन द्वारे गुदरत हो॥ पाइके उराहनो उराहनो दीजै मे।हि, काल-कछा कासीनाथ कहे निबरत हो! ॥” विनय पत्रिका में भी शिव के सेवकों की कठोरता का उल्लाहना दिया गया है | इस उलाहने का क्या फल हुआ | इसका कोई अन्‍न्तःसाक््य नही। इतना अवश्य अवगत होता है कि इसके बाद भी उन्होंने काशी नहीं छोड़ी वे निर्भीकता से अपना जय संभाल कर समस्त विरोधों को सच्चे राममक्त की भाँ ति राम के भरोसे सह्दते रहे उन्हे पूर्ण विश्वास था कि विरोधी कुछ नहीं कर सकेंगे राम उनको रक्षा कर गे ऐसा ज्ञात द्ोता है कि कदाचित विरो- थियो ने इनका प्राणान्त करने का आयोजन भी किया था |

गोस्वामी जी के वास्तविक स्वरूप को जानने के कारण कुछ विरोधी उन्हे अपमानित करने के लिए कदायित उनकी जाति-पाँति को निम्न कह कर घोषित करते-फिरते थे। ऐसा अपवांद सुनते-सुनते उन्हें कुछ विशेष क्षोभ हुआ और उन्हों ने उन अपवादो का मुंहतोड उत्तर भी दिया--- “धूत कहो अवधूत कद्दो रजपूत कहो जोलहा कहो कोझ। काहू की बेटी से बेटा व्याहव काहू की जाति बिगारन सोऊ॥ इुन्द में प्रयुक्त धूत', अवधूत', जोलदा' शब्दों से यहों सूचित होता दे कि विरोधियों ने इसी प्रकार का प्रवाद फेलाया होगा कि यह धूते नीच जाति का है, हो हो कोई रामानंदी या कबीर-पंथाी जुल्लाहा हो श्रथवा कोई इतर वरण हो किन्तु आह्यण नहीं। सम्भवतः ग्रोस्वामों जी ने इन्हीं

(१) कविता! उ० छु० १६५

(२ ) विनय०” पद

( ) कविता०? उ० छु० ४८

( ) विनय० पद १३७

( ) कविता उ० छु० १०६

१६ संत तुलसीदास झोर उनके संदेश

प्रवादों की अति देख कर अपनी लेखनी को कुछ उभर किया ओर “'कवितावली'? एवं 'विनयपन्निका' के कुछ छुंदो में उच्र भी दिया। इन उत्तरों में उन्हों ने झपनी जाति आद्यण कह कर वही जाति और वही गोन्र बताया है जो उनके स्वासी राम का है। वे अपनी जाति क्यों नहीं बताते थे। इसका कारण यही हो सकता है कि त्यागों भक्त होने के नाते वे सांसारिक परिचय को उपेदणीय समकते थे एक बार मैंने एक बेरागी साथु से यह प्रश्न किया कि महाराज | में झ्रापका परिचय चाहता हूं? उन्हों ने मेरी भ्रद्धा का तिरस्कार करके अपना सलाम बाबा रामदास बताया। मेंने फिर पूछा झापका पहला नाम क्या था ! उत्तर मिला, यह सब पूछ कर क्‍या करोगे जब मेने उनके जन्म-स्थान, वर्ण आदि का प्रश्न छेढ़ा तो उन्दों ने बढ़ा ही कटु उत्तर दिया। मैंने द्ाथ जोढ कर कटद्दा--“बावा | किस अपराध पर इतने रुष्ट दो गए ।” बाबा ने कद्दा “बच्चा | रुष्ट होने की बात नहीं। हमारा पंथ ही ऐसा है कि उसमें झ्ाने पर हमें पिछले नाम, आम, वणण, माता-पिता झादि किसी का नाम छेना वर्जित है ।? यद्द सुन कर में चुप रहा। इस घटना की ओर संकेत करने का असिप्राय यह है कि कदाचित तुल्लसीदास भी ऐसी ही परंपरा में दीक्षित हुए हों झर उसके अनुसार उन्हों ने जाति- पाँति का विशेष परिचय नहीं दिया

उनकी जञाति-पाँति को लेकर विरोध खडा करने वाले कोन थे? हो सकता है कि यह आहायों की करवूत रही हो वे 'सानस! की रचना आदि से शंकित हो गए हों कि कहीं हम लोगों का सम्मान तुलसीदास को मित्र जाए और हमारी पंडिताई को धक्का लगे

उपयुक्त विरोधों के अतिरिक्त चोर-चाइयों के उपद्रव भी हुए थे। ये नीच, बावा जी की कुटिया में भी अपनी कछा दिखा आए थे। “दोहावली'' में उन्‍्हों ने इन चोरों की शिकायत भी शंकर से की दे

इन प्रसंगों से इतना तो स्पष्ट ही हो जाता है कि काशी ने इस महान

शात्मा का मूल्य यहुद दिनों तक नहीं समझा था। तभी तो उन्हें इतने विरोधियों का सामना करना पढड़ा। सत्य सत्य ही है। निष्यभ ज्योतियाँ

कप आकननक गा पुन प्कण मुन्ना जाति-पा ति"' "१? (२ ) 'विनय०” पद ७६ “लोग कहें पोचु सो सोच सकोच'*'” | रे ) दोहावली' दो० २३६ “ब|सर दासनि के दका'''*** ।”?

तुलसी परिचय १७

मातंड को कैसे दबा सकती थो | काछान्तर मे काशी के आंत लोगो ने अपनी भूल समक ली उन्हे तुलली की महत्ता और उनके व्यापक उद्देश्य का दर्शन हो गया। लोग अपने किए कर्मों पर पश्चात्ताप कर तुलसी के चरणों पर कुछे जिस काशी वालो ने पहले अपमान किया था वे ही बडे सम्मान की दृष्टि से देखने कगे। नीचे कुछ ऐसे अवतरण दिये जाते है जिनसे तुलसी दास के सम्मान का पता चलता है-- ४राम॒ नास को प्रभाड, पाउ महिमा, प्रताप, तुलसी से जग सनियत मद्दामुन्ति सो।” >< ५< “घर घर मांगे टूक, पुनि भूपनि पूजे पाय। जे तुलसी तब राम बिनु, ते अब राम सहाय ॥” 4 ३८ +८ ९८ ३८ “हे तो सदा खर को असवार, तिद्दारों ही नाम गयंद चढ़ायो' ॥” झन्त में, उनके सम्मान की वृद्धि यहाँ तक हुईं कि वह उन्हें खतने लगा अत्यधिक सम्मान पाने के पश्चात्‌ कदाचित्‌ दशनियों की भरमार के कारण उनके राम-भजन में कुछ विज्ञल पढ़ने छगा था। यद्द बात हनुमान बाहुक' के कुछ छुन्‍्दो से परिल्षक्षित डोती है बरतोर की बेदना दोने के समय उन्हें अपने सम्मान पर भारी ग्लानि भी हुई थीं; उन्हें कुछ ऐसा झाभास होता था कि सम्मान में पड कर मैने भक्ति को कमी कर दी, इसी पाप का फल पा रहा हैँ; उन्हें आत्म-त्ाानि होती थी--में ल्लोकरीति में पढ़ गया, गोसाई बन कर सम्मानित हो बैठा और दरिद्वता के दिनों को भूल् गया और उसी का दंड भोग रहा हूँ | मेरे शरीर से 'राम राय” का लोन! बरतोर के बहाने निकल रहा दै।। ये सच्चे सन्‍त थे अठः उन्हें अपने सम्मान से झरुचि दो गईं थी, पर उनका सम्मान उनकी रुचि के विपरीत भी बढ़ता ही गया और डनको सृत्यु के बाद यद और भी बढता जा रहा है गोस्वामी ज्ञी को अपनी वृद्धाबस्था में कुछ अआधिव्याधियाँ भी सहनी

(१ ) कविता०? उ० छु० ७२

(२ ) दोहावली' दो? १०६

(३ ) कविता०” उ० छु० ६०

( की ) बबाहुक' छु० ४० ध्प्र्यो लोकरीैति 9००० ११!

(५ ) वही » ४१ “नीच यहि बीच पति पाई" दे

श्द् संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

पढ़ी थीं। 'कवितावदयों? झौर विनयपत्निका दोनो में कुछ पेसे छन्द हैं जो स्पष्टलः प्रकट करते हैं कि उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा थी जिसकी शांति के लिये उन्हों ने राम, हनुमान्‌ तथा शिव से प्राथना की। इस प्रकार की झनिश्चित पीडा के अतिरिक्त उनको बाहुपीडा की भी असीम वबेदुना सहनी पढ़ी' इस वेदना का प्रकोष अधिक दिनो तक रहा उन्हें यहाँ तक विश्वास हो गया था कि 'कुरोग राद राकसनि' उन्हें खा गए होते यदि 'केसरी-किसोर' बरिआई बचा लेते! | अन्त में, राम की कृपा से इस पीड़ा का निवारण हो गया यह पीडा कब हुईं थी इसका कोई अन्तः- साक्ष्य नहीं; फिर भी 'कवितावल्ती के 'रुद्रवीसी के छुन्दों से 'ध्वनित डोता है कि इस वेदना के समय रुद्बीसी वत्तमान थी'। यही नहीं, मीन की शर्नीचरी भी विराजमान थी सीषण मसहामारी भी रुद्र का रोप प्रकट करती थी, गोस्वामी जी ने उसे भी अपने इृष्टदेव राम से शांत कराया इन तीनों विशिष्ट घटनाओं की तिथि पर विचार करना भी आवश्यक है पर इसे बहुतों ने बाह्य साक्यों के आधार पर कर दिया है झतः हुहराने की झावश्यकता नहीं

अन्य व्याधि जिससे तुलसीदास जी झआाक़ांत हुए वह थी बरतोर की फोड़िया | इसके कारण भी वे बहुत दी संतप्त हुए इस बार भी उन्हों ने हलुमान्‌ एवं शिव को भ्नुनय-विनय की और 'रोगलिंधु” को 'गायछुर' करने की याचना की अन्त में, यह कद कर मौन हो गए कि कोई इज नहीं, मैंने जैसा बोया दे वैसा ही काहंगा!! इसके अनन्तर कोई अन्स/साज्ष्य नहीं

( ) दे० 'कविता०” उ० छू० १६६, १६७ (२) विनय पद १६५

( रे ) दे० दोहावली' दो० २३४-३६ 'बाहुक' छु० २०-३४, ३६, ३७ ( ) 'बाहुक' छु० २८, ३०

(४ ) 'वही०? छु० ३५,

(५ )वही हे£

(७ ) कविता० उ० छु० १७०

(८) वही ,, ७७

( &. ) वही 38 9 श्र

(१०) 'बाहुक छु० ४३

(११) वी 9 ढदें

तुंलसी परिचय १६

मिलता जिसके आधार पर हम कह सके कि ये बरतोर से स्वस्थ हुए किंवा इसी से सबंदा के लिए मौन हो गए |

बिना खींच-तान के अंतःसाज्यों के आधार पर काशी में व्यतीत जीवन का जो अंश चित्रित किया जा सकता था उसका उल्लेख हो चुका। अ्रयोध्या ओर काशी के भ्रतिरिक्त कुछ अन्य ऐसे स्थान भी थे जहाँ वे अवश्यमेव गये थे अथवा अ।ते-जाते थे, इसका प्रतिभास भी अ्रन्त-साक्य देते है। कवितावल्ञी' 'रामचरित मानस? “विनय पत्रिका” ओर सब से अधिक “गाीतावल्ली” के कुछ मधुर गीतों को देखने से स्पष्ट धारणा होती है कि तुरूसीदास चित्रकूट के वातावरण से पूर्ण अभिज्ञ थे यदि वे काशी का सेवन इसे शंभ्रु-भवानों का निवास स्थान मान कर करते थे तो चित्रकूट को राम का विहार-स्थान ज्ञान कर अवश्य सेते रहे होगे इन्हें चित्रकूट में परम शांति मित्री थी--

“अगनित गिरि-कानन फिरयो, त्रिनु आगि जरयों हों। चित्रकूट गए मैं छब्ली कलि की कुचालि सब, अब अपडरनि डरयो हौ' ॥”

'विनयपश्रिका' की एक पंक्ति से कुछ ऐसी ध्वनि निकलती है कि तुलसीदास को चिन्नकूट में ही राम की कुछ विशेष लीला दिखाई परी थी; कृदाचित्‌ वहीं उन्हों ने राम का दशन पाया था---

“तुलसी तोकों ऊृपालु जो कियो कोसलपाछ चित्रकूट को चरित चेति चित करि. सो'।”

डनके तीथराज-गमन का वृत्तांत भी कव्रितावछी के कुछ छन्दो' से प्रति- भासित होता है। 'सीताबट' वाले पदो से अ्रभिव्यक्त होता है कि दे वहाँ भी गए थे बद्रिकाश्रस का चित्रण जिसे हम “विनयपश्निका में पाते हैं

भा अ]

(१ ) कविता» उ० छु० १४१, १४२

(२ ) 'मानस” अ्यो० का चित्रकू८ वर्णन

( हे ) विनय»? पद २३, २४

( ४) गीतावली” अयो० गीत ४४, ४६, ४७, ४८५, ५० ( ) विनय०” पद २६६

(६ ) वही ,, २६४

( ) कविता० उ० छु० १४४-४७

( ८) बह्दी 9. $$ रेट ४०

( ) 'विनयों पद ६०

२० संत तुललीदास और उनके संदेश

उससे उनके बदरीनारायण जाने का संकेत मिलता है। अ्रस्तु, उक्त अन्त: साक्यों से इतना तो ज्ञात ही हो जाता है कि बाबा जी पयटन भी करते थे।

पाह्म साक्‍यों से जीवनी के ग्राह्म अंश

विशुद्धु अन्तः साहयों के आधार पर अभी तक जो निर्विवाद जीवनी प्रस्तुत की गई वह अपूर्ण है। उसे सांगोपांग बनाने के लिये अब बाह्य साक्त्यो का आश्रय क्लेकर विवेचन करना होगा |! बाह्य साइयो की आधारभूत सामग्री क्या होनी चाहिए। इस शअसंग में थोडे में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि किसी कवि के जीवन चरित-निर्माण के सम्बन्ध में उसके सलन्नचिकट एवं साहचय में रहने वाले व्यक्ति की सम्मति बिशेष महत्त्वपूण होती है और जहां निकटवर्ती व्यक्ति के द्वारा कोई जानकारी उपलब्ध हो, वहां समकाछीन व्यक्ति की सम्मति उपादेय होती है; जहां समकालीन व्यक्ति से भी कोई लाभ हो, वहां कवि के स्वत्निखित किसी प्रकार के पत्र आदि जो जीवन-सामम्नरी प्रस्तुत करने में दूरोपकारक हो उन्हें ही उत्तम कोटि का बाह्य सादय मानना चाहिये जन-अ्रुतियों और अल्लोकिक चमत्कारो की गणना बाह्य साक््यों की भ्रन्तिम कोटि में करनी चाहिये। उत्तम बाह्म साक्ष्यों में सर्वप्रथम हमारी दृष्टि “भक्त-माऊर की ओर जाती है। यह नाभादास की कृति है। इसका रचनाकाल सं० १६४२ के बाद माना गया है” | नाभाजी सं० १६७७ के लगभग विद्यमान थे भर गोस्वामी जी की मृत्यु के बहुत दिन पीछे तक जीवित रहे | इंन्दोंने तुलसीदास के विषयमें जो कुछ कहा है वह 'सक्तमाल' के एक ही छुप्पयमे है। उस छुप्पय का आशय यह है कि वाल्मीकि स्वयं तुलसीदास होकर आए और कलिके कुटिल जीवोको भवसागरसे पार उतारनेके लिए उन्होंने रामचरित सानस' रूप नौकाका निर्माण किया इस छुप्पपसे इतना सूचित होता है कि तुलसीदासको अपने जीवन कातमें 'मानस' रचनाके उपरांत बढ़ा सम्मान प्राप्त हुआ झौर मानसकी बडी प्रतिष्ठा हुई | अंतः साचयके आधार पर भी दिखाया जा छुका है कि वे धाल्मीकि कददलाते थे पूर्ण आह्य होते हुए भी यह साय इतना संक्तिप्त दे कि ( ) दे० रामचन्द्र शुक्त्नः 'हिन्दी साहित्यका इतिहास” ( नवीन सस्क्रण ) पु० १७७ |

(२९ ) » " मक्तमाल सटीक” छुप्पय २२६ 'कलि कुटिल जीव निस्तार हित वाल्मीकि ठुलसी भयो।

तुलसी परिचय २१

इससे हमारे कविके जीवन चरितकी पूणता नहीं होती। अतः अन्य बाह्य साक्ष्योंकी ओर बढ़ते हैं।

'सक्तमालत्त की टीका! इसे प्रियादासने सं० १७६५९ से लिखी इन्होने उक्त छुप्पप की बीज-कथाको अपनी टीकामें काफी परिवर्धित किया है। हमारे सामने तुलसीदासके जीवन-चरित का बढा ही चमत्कारमयथ खाका खींचा है | प्रियादासके चित्रण से बुद्धिवादी सहमत नहीं होंगे, भले ही यथा- श्रुत त्राही श्रद्धालु भक्त-जन उन सभी घटनाओं को सम्भाव्य मान लें अस्त, इस टीका से इस अधिक से अधिक ग्राह्म अश छुन्द ५०० में वर्णित वह बात लेंगे जिसके द्वारा ज्ञात होता है कि तुलसीदास विवाहित हुए थे ओर पत्नी में इनको आ्रासक्ति बडी तीज थी। सम्भवत:ः वे उसे क्षण मात्रके लिए भी अपने से पृथक नहीं कर सकते थे स्त्री उन्हें बिना सूचित किए ही पीहर चल्ली गई ओर मारूस होने पर वे तत्काल ही ससुराल पहुँच गए। लज्जावश आवेश में आकर स्त्रीने ब्यंग वचन कहा ओर उनके हृदय में प्रभात हो गया ग्रियादास की टीका से यह अंश आह्य इसलिये समझा गया कि गोस्वामी जी के वैवाहिक जीवन को अन्य पझंथकारों ने तो स्वीकार डी किया है साथ ही आज तक के सभी समालोचक और समस्त जनता मानती चली रही दे बह बात जो इस प्रकार सवमान्य हो उसे अस्वीकार करना उचित नही दिखाई पढ़ता दूसरे, जब गोस्वामीजी की रचनाओं में यद्द नहीं मिलता कि उनका विवाह नहीं हुआ था और यही मिल्तता है कि उन्होंने वेवाहिक जीवन बिताया था, ऐसी स्थिति में यदि लोगो की धारणा है और उसके मानने में कोई द्वानि नही तो हम भी क्यों मान ले कि तुलसीदास ने दाम्पत्य जीवन का उपभोग किया था। जब हम उनका गाहस्थ जीवन मान देते हैं तो "हनुमान थाहुक' की पंक्ति--“परथों लोक रौति मे, पुनीत प्रीति रामराय, मोहबस बैठो तोरि तरकि तराक हों ।” विवाह की ओर सकेत करती है, यह भी समान लेना चाहिये। इतना ही नदी, दोहावक्षी के--

“खरिया खरी कपूर सब उचित पिय तिय त्याग के खरिया मोहि मेलिके बिमल विवेक बिराग ॥””

( ) दे० 'द्विन्दी साहित्य का इतिहास छू० १७७ (२ ) दे० 'भक्तमाल सटीक! टीका छु० ४६००-४१० (३ ) बाहुक' छु० ४० (४ ) 'दोहावली' दो० २४४

२२ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

का सम्बन्ध भी इससे जोडा जा सकता है।

प्रियादास के चसत्कारमय चित्र का सद्दारा लेकर राजा प्रतापसिंह ने अपने “सक्त कद्प-हुम”” से, महाराज विश्वनाथसिंह ने झपने “भक्तमाल में ओर महाराज रघुराजसिद ने “भसक्त-माल राम रसिकावली,, में तुलसीदास का जीवन चरित लिखा है। इन तीनों राजाओं के द्वारा प्रस्तुत किया गया जीवन-चरित कहाँ तक उपादेय हो सकता है जब कि इसके आधार ही की उपादेगता संदिग्ध है !

“प्रियादास की टीका' के पश्चात्‌ हम “दो सौ बावन बेष्णवों की वार्ता ! की श्रोर आते हैं क्योंकि यह गोस्वामी जी के समकालीन गोकुलनाथ जी की कृति घोषित की गईं है | परन्तु इसे गोकुलनाथ जी की कृति होने में सदेह है, इसकी भाषा बहुत बाद की प्रतीत होती है इसमे वर्णित बातों से भी स्पष्टलया लकखित हो जाता है कि थे भक्तों का गौरव प्रचलित करने और बलछभाचाय की गही की महिसा प्रकट करने के लिये पीछे से लिखी गई हैं| इस दशा में इसमें सन्निविष्ट बातो को प्रमाण रूप में प्रहण करना ठीक नहीं जचता अस्तु; इसमें प्राप्त तनिक-सी सामग्री श्रम्नाह्म एवं विवाद-अस्त समझ कर छोडी ज्ञाती है।

समकालीन व्यक्तियों के निदेशों से जो सामभ्नी उपलब्ध दहोती है उससे भी हमारे कवि का जीवन चरित अपूर्ण रह ज्ञाता है। अतः सम-सामयिकों के अतिरिक्त अन्य प्राचीन बाह्य सादयो की ओर मांकने की आवश्यकता पढ़ती है| इस ओर, सर्वप्रथम, हमारा श्याव गोसाई चरित” पर जाता है। इसकी सत्र से पहले चर्चा चलाने वाले हैं शिवसिह सेंगर। इन्दों ने अपने 'शिवसिंद सरोज में गोस्वामी जी के शिष्य पसका आम निवासी मह्दाष्मा बेनीसाधवदास को इस अन्‍्थ का रचयिता बताया है'। सेंगर जी ने “गोसाहं चरित' के विषय में जो कुछ लिखा है उमसे प्रकट दोता है कि उन्हों ने इस अंथ को स्वयं नहीं देखा था और इसके विषय में उसकी कोई विशेष आनकारी थी। इधर के विद्वानों ने सी गोसाई चरित” को प्राप्त करने के कप लक वजन आन पर

( ) दें० 'भक्त कल्पहम' पए० १०६--११२

(२) ,, भक्तमाल रामरसिकावली” श्रध्या० ६० पु० ७८२--६८६०४ ( ) हिन्दी साहित्य का इतिहास पृ० ४८०

(४ ) वही १० २१९

(५ ) शिवसिह सरीज' पृ० ३८६; ३६४

तुठढसी परिचय श्३

लिये काफी प्रयत्न किया पर उन्हे भी शिवसिंह से अधिक जानकारी न॒मिल्ली | 'गोसाई' चरित' जब कि स्वयं एक रहस्य का ग्रंथ बना हुआ है तो उससे तुलसीदास के ज्ञीवन चरित निर्माण के हेतु कोई प्राह्म अंश या साध्य हूढना निस्सार ही है |

गोसाई चरित' से हताश डोने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि बेनीमाधव विरचित “मूल गोसाई' चरितः कवि के जीवन-चरित निमोण की सभी आवश्यकताओं से युक्त, हमारे सामने छुप्पर फाड कर गिरता हुआ दिखाई पड़ता है। इससे जीवन-चरित-निर्मांण के लिए. सभी अपेक्षित वस्तुर्ष तो सम्यक्‌ रूप में वतमान दी है, एक से एक बढ़ कर चमत्कारमयी घटना भी सश्निविष्ट है। इसकी ग्राह्म और त्याज्य सामग्री पर विचार करने के पहले इसकी प्रामाणिकता पर किंचित प्रकाश डाल्नना आवश्यक है वस्तुतः “मूल गोसाई' सरित' की प्रामाणिकता संदिग्ध है। इसमें वर्णित चमत्कार स्ंथा विश्वसनीय नहीं है ऐसी घटनाएँ या विथियों जिनकी सत्यता की परीक्षा इतिहास या ज्योतिष से की जा सकती हे वे कुछ ही अंशो में प्रामाणिक उहरती है। उसमे कुछ ऐसी तिथियाँ और घटनाएँ भी वतंमान हैं जिनकी सत्यता तुलसी की कृतियों के आधार पर कुछ अशो में असंदिग्ध मानी जा सकती है इस दशा में यह ग्रंथ प्‌ण रूप से अप्रामाणिक नहीं कहा जा सकता भत्ते ही इससे प्रयुक्त सत्य शिव सुन्दरम' से उसकी कलई खुल जाती हो, फिर भी यह गोस्वामी जी की जीवनी के निर्माण में कुछ कुछ सामम्नी अवश्य भ्रदान करता है |

जीवनी में जन्म-तिथि बढी महत्त्वपृण वस्तु है। “मूल गोसाईं चरित' तुलसी की जन्म-तिथि सं० १४५४, श्रावण शुकू पक्ष की सघसी बताता है---

पंद्रह सौ चोबन विषे फाहिदी के तीर। खावन सुक्त! सत्तिमी तुलसी धरेछ शरीर'॥”

यह तिथि गणना से ढीक नहीं उत्तरती। यदि यह गणना से दीक ठीक उतरती तो भी इसे ग्राह्म नही होना चाहिए क्योंकि इसके अनुसार विचार करने पर मानस” रचना के समय तुलसीदास की अवस्था सतद्वत्तर बष उहरती है। ऐसी अवस्था में मानस सदश स्वरससय महाकाव्य की रचना करना कुछ अस्वाभाविक-सा लगता है। अतः जन्म-तिथि के दिये हम और कोई बाह्य साद्य ह॒ढंगे।

(१ ) मूल गोसाई चरित' दो०

श्ष्ठ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

गोस्वासी जी को निधन-तिथि 'सूल गोसाई' चरित' में यो दी गई है-- “सबत सोरह सो असी, असी गग के तीर। सॉवन स्थामा तोज सनि, तुलसी तजेड सरीर'॥

यह तिथि ज्योतिष की गणना से बिलकुल ठीक उतरती है और इसी विथि को टोडर के वंशज अब तक गोस्वामी जी के नाम पर सीधा देते है अत- इसकी सवमान्यता और प्राह्मयता स्वीकार करने योग्य दे

तुलसीदास के बाल्यकाल के नाम 'रामबोला का उद्लेख भी मूल गोसाईं घरित' सें किया गया है इस नाम का समथन अ्न्तः सात्य से हो जाता है। गोस्वामी जी के पिता के नामोब्लेख पर 'मूल गोसाई' चरित' मौन है। माता का नाम अवश्य दिया है। इसके झनुसार उनकी माता का नाम हुलसी' था। इस नाम की पुष्टि तुदसी के समकाद्धीन अब्दुरेहीम खानखाना के दोद़े का उत्तराद गोद लिये हुलसी फिरे, तुकसी सो सुत होय” से भी होती है। मानस! की चोपाई में “रामहिं प्रिय पावन तुलसी सी। तुलसिदास हित हिय हुलसी सी |” भी माता के हुलसी नाम का संकेत मिलता दे।

जननी के अनन्तर जन्म-भूमि का निदेश भी मूल गोसाई चरित' करता है। इसके अनुसार यमुना के किनारे स्थित राजापुर ग्राम में गोस्वामी जो झवतीण हुए" | इसकी पुष्टि भी कई बाह्य साधनों से हो जाती है। इसे कुछ विस्तारपूर्वक आगे दिखायेंगे

'मूत्ष गोसाई' चरित' का जो स्वरूप इमारे सामने उपस्थित है उसमें से कुछ कुछ उपयुक्त एगं उपादेय दे भत्ते हो उसके झंश सन्दिग्ध हों, पर विवेक की कसौटी पर परख कर हम इनसे भी कुछ सामग्री अरहण कर सकते हैं। इसके विपरीत वह अ्न्थ जिसका कोई स्वरूप ही इमारे सामने नहीं चाहे घह बुदत्काय द्वी क्यों हो, उससे क्या सामग्री मिल्व सकती है इसी प्रकार का एक भ्रन्थ है “तुलसी चरित” जिसके रचयिता गोस्वामी जी के शिष्ष्य कोई बाबा रघुबर दास बताए गये हैं। ऐसी प्रतीति दह्ोती है कि

( / मूल गोसाई चरित' दो० ११६

( )दे० 'रामचरित मानत' सम्पादक विजयानन्द त्रिपाठी, भूमिका ए० ११ ( ), मूलगोताई चरित' दो० ४.२

(४ )४ वही 3३ ०३

(४ ) वही 8 *०९,

तुलसी परिचय २४

हि.

'तुलसी चरित' के नाम पर कुछ लोग जीवनी-निर्माण का एक जाल बनाना चाहते थे, पर वह बन सका विचारशीलो ने ताड लिया कि तुलसी चरित कोई ग्रंथ ही नही ह। भविष्य में कहीं वह समूचा निकल पढ़े इसी से धजर्यादा' में छुपे उसके अंश को भी सभी ने एक स्वर में अग्रमाणित घोषित कर दिया। में भी ऐसे पूण लद्ग्धि अश से कुछ भी नहीं अहण करना चाहता।

“तुलसी चरित, का अनावश्यक विवरण यहों छोड, अब हम हाथरस वाले तुलसी साहिब के “घट रामायण से प्राघ सामओी पर विचार कर गे। तुलसी साहिब का काल लगभग सं० १८१७--६६ माना गया है | “'घटरामायण” में इन्हों ने दिया है कि पूवजन्म में में ही तुलसीदास था। उस जन्मातर की एक अपूर्ण जीवनी भी दी है उस जन्‍म में तुलसी साहिब तुलतीदास रहे हो या रहे हो इस पर तक-वितक करने फी झावश्यकता नहीं पर इस अन्स में अपने पुवजन्म की जीवनी लिखते समय उन्हों ने अवश्य कुछ छान-बीन की होगी | यदि ऐसा किया हो तो भी इन पुरानी बातो का मूल्य कुछ कुछ अवश्य है। अत: तुछसी साहिब के पूवजन्म के श्राव्म त्वरित से हम यह आह्य अंश लेते हैं--

राज्ञापुर जमुना के तीरा। जह तुकती का भया सरीरा॥ विधि बुरेलखंड वोहि देसा। चित्रकोट बीच दस कोसा॥ संबत पंद्रा से नावासो। भादों खुदी मंगल एकादसी॥ भया जन्म सोइ कहो बुकाई | बाल बुद्धि सुधि बुधि दरसाई॥ तिरिया बरत भाव सन राता | बिधि-विधि रौत चित्त संग साथा यमुना-तद का राजापुर ही गोस्वामी जी की जन्मभूमि है, इसका समर्थन तो यह अवतरण कर द्वी रद्दा है साथ द्वी जन्म-तिथि का जो निर्देश इसमें मिल रहा है उसकी उपादेयता और निर्बाध है। प्योतिष की गणना के अनुसार यह तिथि पूर्ण रूप से शुद्ध उतरतों है अतः यही जन्म-तिथि स्ंधा मान्य है। सारांश यह कि तुलसीदास का जन्म संबव १४८५, भादौ सुदी एकादशी, बार सगलबार को हुआ। सरज्ाज प्रियसंन ने जनश्रुतियों के आधार पर सन्‌ १५३२ ई० ( सं० १५८६ ) में गोस्वामी जीका जन्म ग्रहण करना माना

(१ ) ज्षितिमोहन सेन, “मिडिवल मिस्टीसिज्म श्राव इंडिया पृ० १६०-६१ (२ ) 'घटरामायण” भाग पृ० ४१४-४१८ ( ) वही 09 ३82 ४१४३,

धे

२६ संत तुलसीदास ओर उनके-संदेश

है! | प्राय: और छोगों को भी यही सानन्‍्य है। “घटरामायण” से इसकी प्रामाणिकता और भी बढ जाती है |

झब हम महाराष्ट्री कवि मोरो पंत कृत तुलसीदास स्तव” के ग्राकह्म अंश की चर्चा करते हैं| 'तुलसीदास स्तव' के रचयिता का समय सं० १७८६- १८८५१ है | 'स्तव' कार ने गन्थ मे जीवनी लिखकर वस्तुतः तुलसी की प्रशस्तियों को छन्द-बद्ू किया है। मोरो पन्‍त ने भी नामादास की भांति तुलसीदास को वाल्मीकि का अवतार माना है। उनके विषय में विविध- चमस्कारों का भी उल्लेख किया है। इसमें कोई विशेष ग्राह्म अश नहीं इृश्टिगत होता हाँ, इसके आधार पर इतना तो इठता पूवक कद्दा जा सकता है कि तुलसीदास की प्रभाव रश्मियाँ महाराष्ट्र में भी फेन्नी थीं

तुलसीदास की स्वल्लिखित सामग्री से जीवन-चरित निर्माण का जो उपा- दान उपलब्ध होता है। उसमें सें० १६६६ का द्विसा हुआ पंचायतनामा विशेष उल्लेखनीय है| भ्राजकल यद्द काशिराज़ के निजी संग्रह में है। पहले यह टोडर के उत्तराधिकारियों के पास था इस पंचायतमामे के अनुसार टोढर के दिवंगत होने के पश्चात्‌ उनकी सम्पत्ति का बेटवारा उनके उत्तराधिकारी बेटे झोर पोते के बीच हुआ था पंचायतनामे की प्रथम छुद्द पंक्तियाँ तुलसीदास की लिखी हुई हैं उक्त पंचायतनामे के झाधार पर यदि हम यह कहें सो झनुचित होगा कि गोस्वामी जी से टोडर की मैत्री अवश्य थी उसी के नाते उन्होने क॒र्तभ्य समझ कर पंचायतनामा लिखा अन्यथा एक विरक्त महात्मा किसी के घरेलू झूमेलो में क्यों पढ़ता गोस्वामी जीकी निधन-तिथि के दिन थोडर के चंशर्जों का सीधा देना भी सूचित करता है कि बाबा जी टोढर के फुल के बड़े दितेषी थे टोडर की झृध्यु के उपलब्य में तुलतीदास के जो चार दोहे प्रचक्तित हैं उन्हें एक प्रकार की प्रामाणिकता मिल जाती हैं। टोडर का का हे अस्सी पर था, इससे हलसीदास का अस्सी घाट पर रद्ना भी क्द्धित होता है

गोस्वामी जी की महत्वपूण इस्त-ल्िपि है--“रामचरित मानस” करे झयोध्या कांड की राजापुर वाली एक प्रति इस प्राखीन प्रति में राम की प्रयाग-नयात्ना के पश्चात्‌ सांग में जो एक अद्भुत तपस्वी की कथा वत्तमान है

(१) दे० | “जरनल आव दी रायल एशियाटिक सोसायटी” १६०३ पु०५४० “इन्साइक्ोपेडिया आब्‌ रेलिजन एएड एथिक्स'भाग२ प०१४७० (२ ) दे० रामचन्द्र काटे; तरत्वती' जिल्द १६, पृष्ठ ३७

तुलसी परिचय २७

उसे क्षेष्र कह कर नहीं टाला जा सकता। वस्तुतः कवि ने यह कथा सामिप्राय छिखी है, इसके द्वारा उसने राजापुर को अपनी जन्म भूमि होने का प्राकारान्तर से संकेत किया है किसी संस्कृत रामायण में अलौकिक तापस की कथा नही मिल्तती | ऐसा ज्ञात होता है कि नुलूसीदास को प्रतिभा ने उनसे उनकी जन्म-भूमि में विचरण करते हुए स्वामी के सन्मुख आकर चवरण-रज लेने के लिये उक्त कथा की उद्भावना कराई। गोस्वामी जी जैसे विराट कल्पना कुशछ कवि को ऐसा प्रसंग उपस्थित करने में क्या देर थौ, अविचल, अटल, अन्य प्रेमवश उन्होंने अपने को इष्टदेव के चरणों में डाल ही तो दिया-- “घजल नयन तनु पुलक निज्ञ इष्टदेव पहिचान परेड दण्ड जिसि धरनि तल, दसा जाइ बखानि ॥” तापस अपना परम प्रेम अपने इध्टदेव के चरणों में क्षपिंत करने के लिए एकाएक आता है | कब जाता है, किधघर जाता है, इसका कोई उल्लेख नहीं | इससे यही आभास मिलता है कि तुलसीदास ने ही अपने को तापस रूपमें अपने इष्टदेव के सामने पहुँचाया है, ठीक अपनी जन्म-भमि के प्रदेशमें। इस प्रकार अपने इृष्टदेव के समच अपने को उपस्थित करना भी भक्तों की एक पद्धति माननी चाहिये | सूरदास को ही लीजिये। बब्लभाचाय जी से दीसित होने के अनन्तर वे गोबठन पर श्रीनाथ जी के मंदिर में कीतंव किया करते थे | उन्होने सी अपने इष्टदेव के दशन के द्षिण अपने को ढाठी के रूपसे नन्द के द्वार पर पहुंचाया है-- “जन्द जू ! मेरे मन आनन्द भयो, हौं गोवद्धन तें आयो | तुम्दरे पुत्र भयो मैं सुनिकि अति आतुर उठि धायो॥” +< न्‍ /( 9६ “जब तुम मदन मोहन करि टेरी, यह सुनिके घर जाऊँ। हो तो तेरे घर को ढाढ़ी, खरदास मेरों नाझ॥” निकृष्ट कोटि के बाह्य साक्य अर्थात्‌ जन-श्रतियों के आधार पर तुलसी- दास के सम्बन्ध में प्रचलित बिविध जन श्रुतियों का संग्रह उपस्थित करने की शझावश्यकता नही ऐसे संग्रह का काय तो कुछ लोग कर दी चुके हैं। में जन-भ्रुतियों को तीन श्रेणी में रख कर प्रत्येक श्रेणी की कुछ चुनो हुई जन-अतियाँ जिनकी अवद्देलना करना ठीक नही उन्हीं का संकेत करना डचित समझता हैं

श्८ संत तुलसीदास और उनके संदेश

प्रथम श्रेणी की जन-श्रुतियाँ जो कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों को कपेटे चलती है, उनसे से दो-एक को लीजिए | तुलसीदास ओर रहीम खानखाना के बीच दोहा पूर्ति करने का प्रसग बहुत प्रचलित है। इसमे कोई ऐसी बात नहीं जो अस्वाभाविक लगती हो। गोस्वामी जी दयालु तो थे ही, गरोब बाह्यण के लिए उन्हों ने स्वयं दोहे की एक पंक्ति बना कर कविताओमी रहीम से कुछ दिलाना ही चाहा हो तो कोई असंभव बात नहीं। यदि कविता ममज्ञ रहीम ने दोदे के पूतरांद् चरण पर मुरध होकर उत्तराड की पूर्ति कर दी हो तो उसमें भी आश्चय क्या

गुगभाही अकबर ने अपने अथ सचिव टोडरमल की सिफारिश के आधार पर तुलसीदास को मनसब देने की स्वीकृति दे दी हो और गोस्वामी जी ने उसका तिरस्कार किया हो, यह भी अस्वाभाविक नही लगता। झत३---

“हम चाकर रघुनाथ के पटो लिखों द्रबार तुलसी अब का होहि गे नर के सनसबदार ॥”? की प्रचलित जन-श्रुति भी उपेच्चयीय नहीं दूसरी श्रेणी में कुछ ऐेसी जन-श्रतियाँ रखी जाती हैं जो कवि से संबद्ध कुछ विशेष स्थानीय, पारिवारिक या समकाल्लीन व्यक्ति विषयक हैं। काशी के चार विशेष स्थानों अर्थात्‌ प्रह्मदघाट, अस्सी, गोपाल मंदिर और सकट- मोचन पर तुलसीदास रद चुके थे। इन चारो स्थानो में उनके रहने के स्मारक भी बताए जाते हैं | गोस्वामी जी बहुत समय तक काशी सें रहे यह तो अतःसाज्यों से ही सिद्ध है। किन विशेष स्थानों पर रहे इसके लिए उक्त चारो स्थानों पर रहने की जन-श्रुति अहणय कर लेने में कोई अनोचित्य नही जन श्रुति के अनुसार गोस्वामी जी के पिता का नाम आत्माराम दूबे माना गया है। तुलसीदास के समी जोवन-चरित लेखको ने इसी नाम को स्वीकृत किया है। अतः इसे मान लेने में कोई आपत्ति नही दिखाई पड़ती तुखसीदास के गृह-त्याग का कारण उनकी भायां का मम-र्पर्शी चचन था!। यह भी जन-अ्रुति की देन है। परन्तु है गराह्म इसे सभी जीवनी खेखको ने माना है काशी के प्रकांड विद्वान्‌ू और प्रवर भक्त मधुसूदन 'सरस्वती' गोस्वामी जी

(१ ) “अस्थि चर्ममय देह मम, तामे जैसी प्रीति। तेसी जो भीराम महेँ, होति तो भव भीति ॥”

तुंतंसी परिचय २६

के समकालीन थे इन दोनो में भक्ति-विषयक्र कुछ विचार-विनियम हुआ था महात्मा मधुसूदन जी ने किसी के पूछने पर गोस्वामी जी की प्रशंसा में यह श्लोक पढा था-- “झाननद कानने ह्यस्मिन तुलमी जंगमस्तरुः कविता मझ्लरी यस्‍्य रास अ्रमर भूषिता॥”

यह श्लोक दोनों महात्माओ् की घनिष्ठता का भी परिचायक है

जैन कवि बनारसीदास ओर तुलसीदास का सत्सग हुआ था। इस सम्बन्ध से प्रचलित जन-श्रुति भी ग्राह्म दे, क्योंकि गोस्वामी तुलसीदास ओर बनारसीदास समकालोन थे

नाभादास और सूरदास के साथ गोस्वामी जी का समागम हुआझ्ना था, इस सभ्पन्ध में प्रचल्षित जन-श्रुति भो कुछ कुछ अयोजनीय है। भक्तों का समागम होता ही रहता है, बहुत सम्भव है उक्त महात्माओं का समागम हुआ हो क्योकि वे एक ही काल में बतमान थे

मीराबाई ने गोस्वामी जी के साथ पत्न व्यवहार किया था, यह जन-भ्रुति नितान्त निमूल ठहरती है | यद्यपि मीरा सं० १६०३ तक विश्वमान थी, पर तुखछसीदास की अ्रवस्था उस समय चोद॒द वर्ष की थी। यह नहीं कहा जा सकता कि इस अल्पावस्था में वे इतने लोकप्रिय हो गये थे कि मीरा उनसे अपने जीवन-सार्ग का निणय कराती मीरा के पत्र भेजने की स्थिति उसके स्वर्ग-प्रयाण के बहुत पहले रही होगी, उस दशा में तुलसीदास या तो बिल्कुल अनजान बालक रहे हो अथवा उनका जन्म ही हुआ रहा हो

तीसरी श्रेणी की निम्नतम जन-श्रुतियाँ, जैसे, मुर्दा जिलाना, प्रेत-मिलन तथा ऐसे ही अन्यान्य चमत्कारों को अग्राह्म समझ कर यो ही छोड़ा जाता है पर उनके विषय में इतना अवश्य कहा जा सकता है कि गोस्वामी जी का व्यक्तित्व सामान्य छोगो की अपेक्षा श्रधिक उच्चत था-श्रद्धावशश लोगो ने महत्त्व-प्रद्शन के लिए नाना प्रकार के चमत्कारों को उनके साथ जोड़ दिया है।

गोस्वामी जी की जन्म-भूमि तथा उनके ब्राह्मण भेद्‌ श्रादि को लेकर समय समय पर जो आ्ञामर विचार फैले उनका निर्देश करते हुए विशेष छानबीन करके डा० माताप्रसाद गुप्त ने अपने ग्रथ॑ 'तुलसीदास' में जो विचार प्रकठ किए हैं बे माननीय दे। अत. इस सम्बन्ध में में विस्तार नष्टी करना चाहता

(१ ) दे 'मिभ्रत्रधु विनोद! प्रथम भाग ४० ३६४ (३२ ) ओकऊा “उदयपुर का इतिहास प्ू० ३६०

३० संत तुलसीदास और उनके संदेश

साहित्यिक तथा मनोवैज्ञानिक जीवनी की स्थापना

आज के समीक्षको की दृष्टि किसी कवि की भोतिक जीवनी के पीछे आवश्यकता से अधिक हेरान रहती है। यद्यपि इस प्रकार का प्रयास उपेक्षणीय नहीं तथ!पि इसे हृतना महत्व देने की श्रावश्यकता नहीं | वस्तुतः कोई कवि झपनी भोतिक जीवनी के कारण अमरत््व नही पाता प्रत्युत वह छझापनी उदास साहित्यिक एवं मनोवैज्ञानिक जीवनी के बल पर शाश्वत रूप से प्रतिष्ठित हो सकता है| कवि की भोतिक जीवनी उसकी कृतियों को समझने में गोण साधन दोती है, इसके विपरीत उसकी साहित्यिक तथा मनोवैज्ञानिक जीवनी उसकी कृतियों के रहस्योद्धाटव का प्रसुख अंग है। कवि अपने रमणीय काव्योद्यान का झारोपण कर उसे संसार को समपिंत कर स्वयं यह घराधाम छोड़ कर चला जाता है, उस समय हमारी देष्टि उसकी साहित्यिक और मनोवैज्ञानिक जीवनी में ही रमती दे; हमें उसकी भौतिक जीवनी के परिज्ञान का संकलप भी नही होता कषि की कृतियों में ओत-प्रोत उसकी जीवनी ही चिरंतन होती है हसके विश्लेषण मात्र से हम कवि के ब्यक्तिच, उसके झादुर्श किंवहुना उसके पूर्ण चरित का साक्ात्कार करते हैं। महान साधु कवि अपनी सोतिक जीवनी का परिचय देना हेस समझ कर भले ही उसे गुप्त रखते हैं, पर साहित्यिक और मनोवैशानिक जीवनी तो छिपाने की इच्छा रखने पर सी नहीं छिपती | कवि की कृति उसके हृदय का प्रतिबिंव है। इसमें उसकी स्वभावगत, विशेषताएं, उसके चारित्र्य के नमूने आदि भी प्रच्छुच्च रूप से समाविष्ठ रहते हैं। उन्हें ढृढना विवेक का काय है |

आगे तुलसीदास की साहित्यिक जीवनी का संक्षिप्त चित्रण उपस्थित करने का प्रयास किया जाता है। साहिस्य-निर्माण में कवि का जो जीवनांश समर्पित होता है उसे इम उसकी साहित्यिक जीवनी कद्ट सकते हैं। हमारे कवि की काव्य-प्रतिभा को ज्योति प्रस्फुटित कराने वाज्ञा वातावरण बडा ही मनोरस और मनोनुकूल् था। बाल्यकाल में ही सौभाग्यवश उसने इस दृष्ट घातावरण को पा लिया था | यद्यपि अधे संसार ने उसे बाल्यकाल में अनाथ होने पर भीख माँगने का ही रास्ता दिखाया था, पर उसके भाग्य ने उसे ऐसे गुरु का द्वार दिखाया जद्ाँ उत्तकी काब्य प्रतिमा के बीज को उगने और विकसित होने का यथेष्ट सुझवलर मिलता गुरु ने अपने अमित वात्सल्य के प्रभाव से बालक के हृदय को विशाल कोमत्तता का थालत्वरा बचा दिया। यह

तुलसी परिचय ३१

बढी ही स्वाभात्रिक बात दे कि जिस बालक को नित्य ही पेट भरने के लिए मिककार और फटकार सुननी पढती हो उसे यदि कोई जरासा भो प्रेम दिखाते हुए टुकडे दे तो वह दाता के प्रति नेसगिक कृतज्ञता से गद्रादू दो उठेगा | भक्ते ही बार-बार ठुकराए जाने से उसकी कोमल्ता की भावना दुबी पडी हो, किन्तु उस दयालु सहदय दाता के प्रति वह उसी त्ुण श्रवश्य कोमल कटपना करेगा ऐसी दी बात बालक तुलसीदास के साथ हुईं। गुरु का साब्िध्य और वात्सलय प्राप्त कर इनके बाल्यकाल के माता-पिता के प्रति अचरिताथ अतएव सुप्त प्रेममाव सजग हो उठे और बालक ने गुरु को ही अपना अनन्य आश्रय पाया दूरदर्शी गुरु ने बालक की ल्रगन और उसमें प्रतिभा का अंकुर देख कर उसका सरकार दी कुछ ऐसे ढंग से किया कि वह झागे चत्ष कर अपनी प्रतिमा की पराकाष्ठा का प्रदर्श कर सका। इस काय के लिए शास्त्रों में पारंगत करना झावश्यक था। झत: गुर ने शिक्षा तो दी ही साथ ही भगवान्‌ के विशेष स्वरूप राम की कथा का प्रबल संस्कार भी बाब्यकाल में ही इनके हृदय-पटल् पर अंकित कर दिया। इस प्रकार तुलसीदास की साहित्यिक ओआंवनी का प्रादुसाव गुरु के पास से ही रामकथा को लेकर होता है और अन्ततः यही रामकथा उनको साहित्यिक कृति बनी रहती है। इसी रामकथा के प्रति अन्य प्रेम तथा उसकी अनूठी अभिध्यंजना शेल्ली जो उनकी साहिस्यिक जीवनी की झाधारशिला है, उसे कौन भुला सकता है ? प्रसिद्ध अंग्रेज समीक्षक वाह्टर रेजे ने अपने भथ “मिल्टन' में महाकवि मिल्टन के सम्बन्ध में कहा है--“मिश्टन अपने गद् तथा पद्म दोनों में अपने जीवन भर वहीं बाल्यकाल का एक आसीण चरवादा ( प्र 00प्रातत 5शथ!7॥ ) बना रहा ।” ठीक इसी प्रकार गोस्वामी जी की साहित्यिक ज्ञीवनी के आधार पर कक्ष जा सकता है कि थे भी आजम्म एकमात्र वही राम-युण-गायक बने रहे जो बाल्यकाल में थे! इस राम-गुण- गान को सर्वोत्कृष्ट रूप में अभिव्यक्त करने के लिए तुलसीदास को प्राचीन संस्कृत साहित्य का गंभीर अध्ययन करना पढ़ा जैसा कि “मानस से स्वयं सिद्ध दे। तुलसीदास की साहित्यिक जीवनी उनके मेधादी होने के साथ उत्तके अगाघ पाँडित्य का भी संकेत करती है। वह यह भी स्पश्टवया कष्ित करती है कि उनकी प्रतिभा का विकास रामकथा के घेरे में ही उत्तरोसर तैता रहा 'रामलला नहछ”, 'रामाज्ञाप्रश्न, “वेराग्य-सदीपिनी' झादि रचनाएं उनकी प्रतिभा के प्रभात काल की सूचना देती हैं। इसके झननन्‍्तर यदी प्रभात मानस' के रचनाकार तक पूर्ण उत्कष को प्राप्त कर

३२ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

उ्योतिमान्‌ हो उठा है प्रतिभा-विकास के साथ ही उनके व्यावहारिक अनुभव का विकास भी उनकी साहित्यिक जीवनी से प्रतिपादित होता है। उनके जीवन का वह व्यावहारिक ज्ञान, उनका वह कला प्रदशन का पॉँडित्य जो मानस, “गीतावल्ली', 'कवितावली?, 'दोहावल्ली', 'विनय-पत्निका' आदि में अवगत होता है वद अविकसित काल की रचनाओं में नहीं है। उनकी साहित्यिक जीवनी से यह भी प्रकट होता है कि यह महात्मा अपने काल के प्रभाव से स्वयं विमृद नहीं हुआ किन्तु उसने अपनी सामयिक विषमताश्रों के उच्छेद का साधन भी मधुर रामकथा को ही समका |

रामकथा के भीवर हम तुलसीदास की जिन चारित्रिक विशेषताओं का दुशन करते हैं वे भी विचारणीय हैं। यद्यपि महाकरषि अपनी व्यापक अनुभूति शोर प्रतिभा के सहारे सद्‌, असद्‌, दिव्य, अदिव्य, लोकिक, अल्लौकिक सभी प्रकार को बातें दिखाता है पर इन सबके झ्ाधार पर उसकी व्यक्तिगत चारित्रिक विशेषता का उद्धाटव करना टेढी खीर है। पेसा होते हुए सी इतना तो निर्विवाद है कि कल्लाकार जिन पात्रों के चित्रण में सर्वोच्च समानुभृति प्रकट करता है उनके चरित्र में उसका ( कल्ाकार का ) व्यक्तित्व भी प्रतिविबत हो उठता है। हस दृष्टि को लेकर हम इस निष्कषं पर आते हैं कि तुलसीदास की अनन्य समानुभति राम के श्रति है। अतः उनकी चारित्रिक विशेषताएं राम की विशेषताओं के अकाश में अधिकांश में देखी जा सकती हैं। यही नहीं, राम के सक्तो के चरित्र के साथ भी तुद्कसीदास के व्यक्तित्व का तादासत्य है कद्दो-कहीं कवि के स्वतंत्र विचारो से भी उसको कोई कोई चारित्रिक विशेषता ऋलकती है।

गोस्वासी जी के चरित्र की सवग्रधान विशेषता है उनकी रामोपसना इससे बढ कर ये किसी अन्य देव की उपासना नद्दी मानते उन्हे सर्वकाल में अपनी रामोपासना पर गव रहा देखिए---

“राम गवरों कह्ावों गुन गावौं राम राबरोई,

गेटी हूं हों पावों राम रावरी ही कानि हों। जानत जद्दान, मन भेरे हूँ गुमान बड़ो, सान्यो में दूसरो, मानत, मानिहों! ॥”

मानत' में सक्ति शिरोमणि शंकर, शेष, नारद, शारदू, ऋषि, मुनि, देव,

ऊँच, नीच सभी ने एक स्वर में रामोपासना को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हुए रामके

( ) 'विनय०' पद ६३

तुलसी परिचय ३३

चरणों का अनुराग ही चाहा है| इससे स्पष्ट है कि गोस्वामी जी की व्यक्ति गत रामोपासना की प्रवृत्ति छा ही रकु सब पर चढा है। वे सारे संसार को रामोपासना का आश्रय ग्रहण कराना चाहते हैं। 'मानल! और विनयपत्रिका' उनकी इस कामना को प्रत्येक पद के द्वारा प्रकट करते हैं !

लोक-वेद की मर्यादा के प्रति अनन्य आस्था और विश्व-कल्याण की कामना तुलसीदास के चरित्र की अन्य विशेषताएं हैं। जब उनके उपास्य ही इस ल्य की सिद्धि के लिये अवरतीण होते है तो इनका व्यक्तिगत चरित्र इन गुणों से क्यों भूषित होता रामका प्रण है--

“धरम के सेतु जग-मड्गल के हेनु भूमि-

भार हरिबों को अवतार जियो नर को | नीति प्रतीति-प्रति-पाल चालि प्रश्नु मान, लोक-वेद राखिबे को पत्र रघुवर को'॥ ४५ 4 “बदऊ कोसिल्या दिसि प्राची। कीर्रात जासु सकल जग मांची | प्रगटेड जहँ रघुपति ससि चाहू | बिम्व सुखद खल-कमल-तुसारू

ऐसे 'रघुबर!' के अनन्य सेवक के लिए यह स्वाभाविक ही था कि वह लोक-मद़ल कर्ता होते हुए वेद, पुराण, शाख्रादि की भयांदा का रक्षक बने साथ ही अपने नीति-नेपुण्य की, प्रेम ओर विश्वास की स्पृह्वणीय ज्योति भी फैलाए तुलसीदास के चरित्र से ये गुण वतमान थे | इसी से उनकी कृतियों इन विशिष्ट गुणों से अनुप्राखित हैं

सहिष्णुता और तितिज्ञा गोस्वामी जी की अन्य स्वभावगत विशेषताएँ है काशी के संघर्षों की चर्चा पहले हो चुकी है। यह उनको सहिष्णुता ही थी कि उक्त संघर्ष उन्हे उनके पथ से रंच मात्र भी विचलित कर सके झपने विषय में नाना प्रकार के श्रवादु सुन कर भी इस सहिष्णु महात्मा का चित्त क्ुब्ध हुआ---

“बहत काहू सों, कहत काहू की क्छु, सब की सहत डर अन्तर ऊब है ॥” इनमें जहां एक ओर सहिष्णुता थी वहीं दूसरी ओर उनका आत्मसम्मान

( ) कविता उ० छु० १२२

(२) मानस बा० १५.४,५

£ ) कविता उ० छु० १०८८

३४ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

भी उच्च कोटि का था। संसारमें जन्म महण करने के नाते वे आत्मसम्मान की उदास प्रवृत्ति को सज्मग रखने वाले थे | तभी तो उन्होंने यों भी कह्दा है -- “घूत कहो, अवधूत कहो, रजपूत कद्दी, जोलहा कह्दो कोऊ। काह की बेटी से बेटा ब्याहब, काहू को जाति बिगार सोऊ' || अवतरण में 'काहू की बेटी से बेटा व्याहब, चिंद नहीं भ्रत्युत आत्म सम्मान की व्य्ञना कर रद्दा है। इसी प्रकार की व्यन्जना निम्नांकित छुन्द से भी हो रही है-- “मेरे जाति-पाँति चद्दों काह की जाति-पॉति मेरे कोऊ काम को, नहीं काह के काम को |

»८ >८ अति ही अयाने उपखानो नहि बू्े लोग, साध द्वी को गोत गोत होत है गुलाम को'

साधु असाधु, के भलो के पोच सोच कहा, का काहेूँ द्वार परो जो हैं। सो हों राम को'॥”

अननी जन्म भूमिश्र स्थर्यादपि गरीयसी' की भावना से भी गोस्वामी जी का हृदय परिपूर्ण था। यथ्यपि ये सारे संसार को बन्‍्धुत्त की दृष्टि से देखने वाले ये फिर भी अपने देश भारतवर्ष की महिमा और गरिसा पर उन्हें गये था$& तुलसीदास को भारतीयता पर सुग्धघ ट्वोकर आचाय रामचन्द्र शुक्ल ने बहुत ठीक कहा है--झाज जो इम बहुत से भारतोीय हृदयो को! चीर कर देखते हैं, तो वे अमारतीय निकलते हैं पर एक इसी कवि केसरी को भारतीय सम्यता, भारतीय रीति-नीति की रक्षा के लिए सब के हृदय हार पर झढ़ा देख दस निराश होने से बच जाते हैं] ।”

निर्भकता ओर स्पष्टवादिता सी तुलसीदास की प्रकृति की सहज विशेष- वाएं थी। मह्दान्‌ से महान्‌ व्यक्ति भरी उन्हें सयभीत नहीं कर सकता था। शसम की शरण में जाकर वे पुणंतया अभयदान पा चुके थे। उनका अच विश्वास था कि राम जिसकी रक्षा स्वयं करते हैं उसे कोई नहीं मार सकता। सामान्य मनुष्यों की कोन कहे, वे कार से भी दरने की प्रतिज्ञा करते हैं

(१ ) वही 3 ९०५

( ) 'कविता? उ० छ० १०७ # देखिए, “कबिता' उ० १३ वा छुन्द (वितय०' पद १३४ [१] [ तुलसी मन्यावली' तृतीय भाग प्रस्तावना ४०११६

तुलसी परिचय ३४

“तुलसी यह जानि हिये अपने सपने नहि कालहु ते डरिदे | कुमया कछ हानि शरनको जो पे जानकीलाथ मया करिहे ॥”” हब “कौनकी त्रास करे तुछ्सो, जो पे राखिद्दे राम तो मारिहै को रे ॥” गोस्वामी जी बले-बडे समृछशाल्ियों की कृपा-कटात्ष अथवा उदबके मुंह मोडने की तनिक भी परवाह नहीं करते थे | देखिए-- “क्रपा जिनको कछु काज नहीं, अकाज कछू जिनके मुँह मारे करे तिनकी परवाहि ते जो विन पूछ विखान फिरे दिन दौरे। 'तुलसी' जेहि के रघुनाथ से नाथ सम सुसेवत रीमत थोरे। कहा भत्र पीरपरी तेहि धो, विचरे धरनी तिनसों तिन तोरे ! रावण सहश मंडलीक मणि की राज सभा में जहाँ बढे-बडे देवगत भी दाथ जोडे सुँद् ताका करते थे वही अंगद के वाद-विवाद द्वारा रावण का जो झपमान कराया गया है, उससे भी तुलसीदास की निर्मोक और स्पष्टवादी प्रकृति का आभास मिलता है। उनकी स्पष्टवादिता का एक ज्वलंत उदाहरण यह भी हैं--- “तुल्लती जु पे गुमान को, होतो कछू उपाड | तो कि जानकिहि जानि जिय, परिहरतेड रघुराड' ॥” समस्त सदगुणों के आकर अपने दृष्ट देव में सी जरा-सी कमजोरी देख कर उसे कद् डालना स्पष्टवादिता नहीं तो क्या है। विभीषण और सुगीव राम के पक्के भक्त हे इस नाते तुलसीदास उन दोनों में बडी आस्था रखते है| भक्तों की श्रेणी में दोनों की महिसा बार-बार दुदराते हैं, पर उन दोनों का विशेष कृत्य इनकी दृष्टि में घ्रणास्पद था, इसका संकेत भी इन्होने अपनी स्पष्टवादिता के कारण दे दिया है। देखिए--- “महाबली बालि दूलि कायर सुकंठ कप सखा किये महाराज हों काह काम को आातघात पातक्ी निसाचर सरन आये किये नाथ अंगीकार ऐसे बड़े बाम को" ॥” ( ) वही उ० छु० ४७ (२)वही ,, ,, ४८ (३) 'कविता० 3० छु० ४६ (४) 'दोहावली” दो० ४६३ (४) 'कविता० उ० छु० १४

१६ संत तुलसीदास और उनके संदेश

कहना नहीं होगा कि अवतरण मे रेखाकित पदों का प्रयोग कवि की स्प्ट- वादिता के ही कारण हुआ है। अपनी इसी प्रद्ृत्ततश उसने राम में एक आक्षेप योग्य स्थान भी देख लिया था--

“बंधुबधू रत कहि कियो, बचन निरुत्तर बालि। तुलसी प्रभु सुमीद की चितइ कछू कुचालि' |”

उपयुक्त दोहा यद्यपि प्रशु की अशंसा में ही कहा गया है, पर उससे ऐसा भी अतिभासित होता हे कि तुल्लसीदास ने आत्मीयता और पक्चपात के फेर में पढ गये राम के चरित से आशक्षेप-योग्य स्थान देख लिया था

गोस्वामी जी बडे उदार ओर गुणगआाही थे | सदूगुण चाहे शज्रु में दी क्यों हो उसके लिये यथेप्ट सम्मान तथा शिष्ट जनोचित उदारता उनफे हृदय में वर्तमान थी उन्होने प्रबल शत्रु, असुर रावण मे भी जो महत्ता देखी उसकी प्रशंसा करने से वे तनिक भी हिचके---

“बीस बाहु दस सीस दुलछि, खेंड खंड तनु कीन्ह सुभट सिरोमनि छंकपति, पाछे पॉव दोन्ह' ॥7

रण में पीछे पर नहीं रखना ही वीर शिरोमणि का मुख्य धर्म है; उसकी महान कीर्ति है| रावण ने अततः पीठ नही दिखाई। यही कारण है कि जो तुलसीदास उसकी निशाचरी बृत्तियों के क्षिण उसे घोर विगहंणा का पात्र सममभते थे वही एक गुण के नाते उसकी प्रशंसा भी करते हैं।

तुलसीदास की अ्रन्य उत्कृष्ट विशेषता हं--उनकी श्रशांत प्रकृति तथा हृदय की प्रगाढ कोमछता 'विनयपतन्निका' में एक से एक बढ़कर ऐसे पद दे जो इन विशेताओ को परिलच्चित करते हैं। 'मानस' में प्राय: सभी भक्त पात्नो की प्रकृति मानो इन्हीं दोनो विशेषताओं में ढल्ली है। इसे गोस्वामी जी के व्यक्तित्व का प्रसाद ही समझना चाहिए

ससार से तटस्थ रदने वाले बढे-बड़े साधु महात्माओों में से अधिकांश गम्सीर ओर उदासीन प्रकृति के ही दिखाई पढ़ते हैं गोस्वामी जी संसार से निर्लिप्त रहकर पूर्ण गंभीर तथा उदासीन होते हुए भी अपने सरल हृदय के कारण हास-परिहास का भी मल्य समझते थे। उनकी विनोदशील्ल प्रकृति उनकी रचनाओं में कह्दी-कही अपना नाज दिखाती हुईं नजर आती है। उनकी द्वाल्य प्रिय सनोवृत्ति के व्यक्षक छुन्द ऐसे दे कि वे पाठक के हृदय में मधुर

(१) दोहावली' दो० १५७ (२) 'रामाज्ञा-प्रश्न' पंचम संग: दो० ४७

तैंढसी परिचय ३७

एवं सुखद गुदगुदी पदा करने की क्षमता रखते हैं ऐसी गुदग़दी से पाठक का हृदय मुस्करा उठता हे, स्मितद्ास्य उसके अधरों पर चमक कर अंत हो जाता है। अशिष्ट अहृदाल करने का अवसर नहीं आता। कवि अपने डउपास्य की श्यामता की केसी चुटकी ले रहा है, यह देखिए -- 'धारव करहु रघुनदन जनि मन माह देखहु आपनि मूरति सिय की छाँह ॥” शंकर के गररू-पान की आदत पर कैसा छीटा दिया गया है--- केसे कहै तुलसी! वृषासुर के वरदानि। बलि जानि सुधा तजि पियन जहर को ! ऋषि-मुनियों के अति अगाढ श्रद्धा रखते हुए भी उनके साथ मधुर परिहास करने में भी तुलसीदास जी नहीं हिचके-- “बिध के बासी उदासी तपोन्नत धारी मद्दा बिनु नारि दुखारे गो तस तीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनि बूंद खुखारे। हैं हे सित्य सब चंद्रमुखी परसे पद्‌ मंजुछ कंज तिहारे। कोन्द्दी भछी रघुनायक जू करुना करि कानन को पगु घारे' ॥”? मानस! में यत्र-तत्र कुछ देवों की कुतूइल पूर्ण सूरत को ब्यग का लक्ष्य करके भी तुल्नसीदास ने अपनी विनोदर्शाल्न प्रकृति का परिचय दिया है'। अहल्या जब अपने उद्धार के पश्चात्‌ पति के साथ जाने छगती है तो विनोदी तुलसीदास उसे गोने की दुलहिन बना देते है-- 'गौतस सिधारे गृह गौनों सो लिवाई के ।”

'गोस्वामी' उपाधि का मर्म

यथा संभव तुलसीदास की निर्विवाद जीवनी अस्तुत परिच्छेद की इस खघुसीमा में दर्शांयी जा चुकी, पर इतनी चर्चा हो जाने पर भी तुलसीदास के साथ लगा हुआ “गोस्वामी” शब्द तो झभी अछूता ही रह गया झतएव

(१) बरबे रामा०” बा० छुन्द १७

(२) कविता ०? उ० छु० १७०

(३) वही श्रयो छु० रद

(४) दे० “मानस! पृ०४७ (शिवपावती का वर्णन), ४० १४४ (शंकर ब्रढ्म, स्वामिकार्तिकेय इद्रादि के कुछ विशेष श्रंगो की प्रशसा आदि)

(४) कविता०” अयो० छु०

३६ संत तुलसीदास और उनके सदेश

इसका भी सम समझ छेना चाहिए | यदि यह आल्लोचकों के द्वारा प्रयुक्त केवल सम्मान सूचक विशेषण ही होता तो विशेष छानबीन करने की झावश्यकता पढ़ती, क्यो कि उस दशा में यह 'इन्द्रियों को वश में करने वाज्ला' महात्मा का ही व्यंजक होता तुलसीदास बड़े संयमी इन्द्गरिय निअ्रह्ठी महात्मा तो थे ही फलतः यह विशेषण सवदा उनके योग्व ही ढहरता परतु बात कुछ और है कवि की रचनाओं में भी इसका विशेष प्रयोग! देख कर इसे केवछ सम्मानाथक कह कर नहीं टाला जा सकता शिवोपासक शेवो की एक जाति विशेष जिसके गिरी, पुरी आदि दस भेद द्वोते हैं, 'गोसाई' कही जाती है। इन्ही भेदों के कारण ये 'दस नामी गोसाई” कहे जाते दँ हमें श्रमवशा 'गोसाई” जाति से तुलसीदास का कोई संबंध स्वप्न में भी नही जोड़ना चाहिए। अन्तः साक्ष्य से यह प्रमाणित दे कि तुलसीदास जी आह्वण थे, अतः यह निविद है कि उनके साथ लगे हुए “गोस्वामी' या गोसाई” शब्द गोसाई' जाति के बोधक कदापि नही हैं “गोस्वासी' कुछ सम्प्रदाय विशेष सें दीक्षित होने के फल्चस्वरूप प्राप्त उपाधि भी है। यथा, बल्लेभाचारी कृष्णोपासकों की गद्दी आ्राबांद करने वाले थाए दिन भी गोस्वामी” पद से भूषित रहते है इसी प्रकार महाराष्ट्र में माध्व सम्प्रदाय के अनुयायी दीता लेने पर 'गोस्वावी” बन जाते हैं | यह 'गोस्वाबी' गोस्वामी? या 'गोसाई? से भिन्न नहीं। बहुत सम्भव है कि किम्नी सम्प्रदाय विशेष के असाद से “गोस्वासी' की उपाधि तुलसीदास को भी मिली हो | ऐसे झनुमान के लिए देखना चाहिए कि तुलसीदास ने कृष्णोपासना के हेतु उनका कौन-सा स्वरूप अंहरण किया है यदि गोस्वामी जी चाहते तो वे बड़े बड़े भपात्नों के बीच लोक-ब्यवस्था की रचा करने वाले महाभारत के कृष्ण का चरित्र भी ऐसे सवांगीण रूप में चित्रित करते कि उसके द्वार उनकी लोक-संग्रदद की चरमाभिय्यक्ति और ज्ञीवन के व्यापक से व्यापक क्षेत्र की प्रतिष्ठा हो जाती पर॑तु, उन्हों ने पेसला नही किया “ऋकृष्णगीतावल्ली' उन्हों ने किसी भ्रवश्य, पर उसमें कृष्ण का वही स्वरूप दर्शाया जो पुश्टिमार्गियों की उपासना के अन्तर्गत आता दे 'सागवत में 'पुष्टि! यार पोषण का अर्थ 'सगवान्‌ का भलुग्रह' है दे० 'कविता०' 3० छु०४० “तुलती 'गोसाई” भयो भोड़े दिन भूल गयी, २८ ७७७४४०३४४ हा

वही , »#7८? आगे को गोसाई स्वामी सबल...... |”!

| 'विनय०” पद २६३ “मेरे भले को शोसाई? पोच की

सोच. .. ...०«« तक

तुलसी परिचय ३६.

(पोषण तदलुअहः” भागवत २।३०)। 'पुष्टिमाग' में सर्वास्मना झात्म-समपंण तथा विप्रयोग रसात्मिका प्रीति की सहायता से आनन्दन्धाम भगवान्‌ के साक्षात्‌ अधरामृत का पान ही मुख्य फल है। परम रुप-धाम भगवान्‌ श्रीकृष्ण के मुखारविन्द की भक्ति पुष्टि भक्ति है। जिज्ञास्य दे कि “कृष्णगौतावली' के ऐसे साम्प्रदायिक ढंग से प्रथयन करने का अभिप्राय क्या दो सकता है इस संबंध में पेसा अनुमान करना असंगत नहीं होगा कि कदाचित्‌ तुलसीदास कृष्ण के छीलाधाम गोकुल बृ दावन में भगवस्मेमास्त तरगिणी के तट पर पहुँचे हो और वह्दी वल्कक्षाचायं की पुनीत कीति फेलाने वाले गोस्वामी विदुक्तनाथ जी से समागम हुआ दो तत्परिणाम स्वरूप इनकी प्रतिष्ठा आदि के द्विए विद्वल्ननाथ जी ने इन्हें गोस्वामी! की उपाधि से भषित किया हो। ये चह्दी से पुष्टि भक्ति का संस्कार लिए आए हो ओर उसी के अनुसार कृष्ण गीतावल्ली' की रचना की हो | कुछ लोगों की धारणा है कि “गोसाईं” मठाधीश की उपाधि थी; जो किसी मठ के महन्त को स्वयमेव मिलती थी। आज़ भी तुल्नसी-सठ का अस्तित्त्त लोलाककुंड अस्सी पर विद्यमान है | हो सकता है कि इस अथ में तुलसीदास के साथ “गोसाईं” चलन पढ़ा हो | पर ऐसा मानने में भारी सदेह यह होता हे कि क्‍या गोसाई”? मठाधीश की उपाधि थी ! आज़ तो मठाथीश को 'महन्स! कद्दते हैं, गोस्वामी नही दूसरी बात यद्द भी है कि वेष्णव चतुष्टय-सम्ध- दायान्तगंत केवल मठाधीश्वर होने के नाते कोई महानुभाव “गोस्वामी” उपाधि से विभूषित नहीं हुए

तुलसी की सनन्‍्त*भावना

सनन्‍्तों की व्यक्तिगत दवोपासना

पिछुले प्रकरण में गोस्वामी जी के व्यक्तित्व का किशल्नित आभास देने के अनन्तर अब प्रस्तुत प्रसंग में उनकी सन्‍्त-भावना का ऐसा विश्तीषण अपेद्ित है जो यथाथंतः उनके सगत-हृदय का परिचायक हो। तुलसीदास जेसे भग- वान्‌ राम के चरित गान में निम् थे वैसे ही सन्‍्तो के गुणानुवाद में भरी | यही कारण दे कि उनकी मानस-सदृश उत्कृष्ट कृति मे भगवान्‌ के चरितामृत के अचन्‍्त प्रवाद के साथ सन्‍्तो की विशद्‌ विरुदावली का सददज स्लोत भी स्थन्द- मान्‌ होता है। 'मानस' ही नही, 'विनयपत्रिका', 'दोहावली', “कवितावली/ झादि में भी थे सन्‍्तों की कीर्ति नही भूले सन्‍्तो की गुण-गरिसागान के लिये साथ ही सन्‍्तों की पहचान के दिये, एक स्वतन्त्र-पन्थ 'चेराग्य सन्दीपिनी' का प्रशयन करने में भी वे नही चूके अस्तु, 'वैराग्य-सन्दीपिनी' पुव॑ श्रन्य इंगित प्रथों के आधार पर उनकी संत-भावना का स्वरूप निरूपणीय है। ऐसा करने के पूत्र एक बात ओर ध्यान में रखनी चाहिये। “सनन्‍्त' शब्द का प्रयोग तुलसीदास ने रूढिगत अर्थ में नहीं किया है। उनके मतानुसार “सन्त शब्द उस संकीण अथ का वाहन नहीं हैं जिसके अन्तर्गत सिर्फ निगुशण पन्‍थ के अनुयायी साथक आते हैं। उन्होने इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है। यह सज्जन, सच्चरित्र साधु आदि का ही प्रकाशक है'। केवल्न साम्मदायिक निगु णियों का नहीं |

सनन्‍्त-स्वभाव की प्रमुख पहचान है उसकी स्वांगीण सहज सरलता इसी सहज सरलता के कारण सभी आशणियों पर प्रेम भाव रखना ही सन्‍्तों का धम हैं | ऐसे 'सरलचित” सन्‍तों का आवि्सांव विश्व के कल्याण

( ) दे० मानस! बा० १.४, ४, ७; २.१२; ३.; ४५३ वही. श्ररण्य० ४४.९; ४५.८ वही उ० रेष,

(२) विराग्य० दो० ८;

( हे ) मानस” 'अरण्य०? ४५.२

तुलसी को संत-भावना २१

के लिए द्वी होता है वे चंद्रमा झोर सूर्य की भाँति विश्व सुखद” होते हैं वे कटुमाषी नहीं होते उनकी अमख्तमय कोसल वाणी कठोर से कदोर हृदय को मोम बनाने , अमाच्छादित सु हृदय को जगाने तथा परितप्त हृदय को शीतल करने में सम होती हैं | ऐसे ही सरल-प्रकृति सच्चे संत के हृदय की मार्मिक ब्यजना इन पंक्तियों में की गईं है-- “सत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्द पे कहई जांना॥ निज्र परिताप द्रवहइ नवनीता। परदुख द्रवह्दति संत सुपुनीता' ॥” कदाचित्‌ यह कहने की श्रावश्यकता नहीं कि हृदय की ऐसी विशाल कोमलता के फलस्वरूप दी मनुष्य दया, उमा, प्रम, श्रद्धा, शीत आदि गुणों का भण्डार बन जाता है। फिर संतो के विषय में कट्टना ही क्या। वे सदाचार के प्रतीक होते है और होते हैं 'गुणागार, 'संसार-दुख-रहित' तथा 'विगत-संदेह सी; परमात्मा के चरणो के अनन्य प्रेम में लीन भी रहते हैं: वे आत्मश्लाघा के भूखे तो नदी रहते पर पर-गुण-अ्रवण से आह्वादित होते हैं, उन्हें समदर्शिनी बुद्धि प्राप्त रहती दहै'"; उनके झ्राचरण भूल कर भी नीति- विपरीत नही दोते ', जप, तप, नियम आदि कर्मो में आस्था रखना साथ ही विप्र, गुरु एवं परमात्मा के चरखों में प्रेम करता भी उनकी अन्य विशेषताएँ है!” उनमें अद्धा, दया, झसा, मैत्री, वितय विवेक, झ्ञान, वेराग्य और बेद- पुराण का यथाथ बोध प्रद्धति गुण वर्तमान रहते है”; हितु-रहित-परोपकार

(१ )वही बा० रे.

( २) वही उ० १२०. २१

( हे ) वही उ० ३७८८

(४ ) विराग्य० दो० १६

(५ ) वही दो० २०

(६ )वही ,, रे१

(७ ) 'भानस! उ० १२४.७

(८ ) वही अ्रण्य०” ४५,

(्‌ €्‌ ) वही , 8 4

(१०) वही , . बा० ३०; अरण्य० ४५..२, उ० ३८५ 'वैराग्य०! दो० १३, ३०, ३९

(११) मानस अरण्य० ४५१,२; ल० ३४५; उ० ३७.८

(१२) वही ४३.३; 3० ३७.६, (१३) वही ,, ४५.४,

दृ

४२ संत तुलसीदास भोर उनके संदेश

भी उनका बाना दै'; गुण-गाहिता के तो मथधुकर ही हैं; विकार रूप बारि का परित्याग कर गुण रूप पय को भ्रहण करने याले संत ही इंस भी कहे जाते हैं संतों के इन डपादेय गुणों कौ चर्चा करने के उपरांत अरब किश्नवित ऐसी क्रियायें भी विचारणीय हैं जो उनके लिए देय ठहराई गई हैं। गोस्वामी जी ने संतो को बार-बार सावधान किया है कि वे षड़ विकारों के लक्ष्य हों, उन्हें ( पढ़ विकारों को ) अपने वश में करें; स्वधा अहंकार-झुन्य हों! कस्‍्तुतः जो "मे! ते! के अहंकार से मुक्त दो जाते है वे ही 'संत-राज' है, परम शांति-सेवी संत जन श्रहंकार की अप्नि से दुग्ध नहीं होते'; अपनी शांति के भावार पर ही वे समस्त संसार को दग्ध करने वाले अहंकार की ज्वाज्ञा से बचे रहते हैं; वे जैसे अहंकार का शमन करते हैं वेसे ही राग-हंष का भी; वे अभृतरिष', 'विमद', 'विरागी', लोभामष हष भय त्यागी होते हैं!”; वे तो पर-द्ोह का चिंतन करते!' और खत जनो की कट्ट वाणी से छ्लुब्ध होते तुलसीदास ने, यों तो संतो के माहात्म्य की प्रतिष्ठा के छिए उनका गुणा- नुवाद करने में अति और शारद को सी असमर्थ बताया है”, और उनके ख़यों को झगणित घोषित किया है”, पर सूत्र रूप में अपनी संत-भावना प्रकट करने के हेतु उन्हों ने “विनय पत्रिका' में निम्नाँंकित एक ऐसा पद भी दिया है जो संत बनने की स्पृद्या रखने वालों के लिएु सवंथा मननीय है--- 'कबहुँंक हो एहि रहनि रहों गो। श्री रघुनाथ-हपालु-कृपा तें संत सुभाड गहों गो॥ जथालाभु संतोष सदा काहू सरों कछू चहों गो “परदित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेमु निबद्दों गो |

(१) वही अरण्य० ४५.७; उ० १२०. १४-१६ पिराग्य०? दो० १० दोहावली' ,, ३७४ (२) 'मानस' बा० ६. (३) वह्ठी ,, ९. दोहावली' दो० २६६ (६ ) वही दो० प्रष्ध-६०

(४) 'मानस' अरण्य० ४४.६ (१०) मानस उ० ३७.२ (४) वही ,, ४४.८ (११) वही १४.१ (६) विराग्य०” दो ३३ (१२) वही किष्कि० १३.४ (७) वही दो० ५२ (१३) वही “श्ररणय०” ४५.८

(८) वही ,, ५३ (१४) वही उ० ३६,

तुलसी की संत-भावना ४३

पुरुष बचन अति दुसद खबन सुनी तेददि पावक दहो गो

विगतमान, सम सीतछ मन, पर-गुन, नहीं दोष कट्दो गो ।।

परिहरि देह जनित चिता, दुख सुख सम बुद्धि सहों गो

तुलसीदास प्रश्ु यहि पथ रहि अबिरल हरि भगति लहो गो |!

संत-स्वरूप की झॉकी करने के अनन्तर उनकी व्यक्तिगत देवोपासना भी विचारणीय है। किसी संत की उपासना दो रूप धारण कर सकती है-- ऐकान्तिक अथदा समाजिक ऐकान्तिक उपासना में लीन संतजन इस प्रपश्चा- स्सक जगत से तटस्थ होकर किसी निर्जन अरण्य में, अथवा किसी पवत की कन्दरा में शासन सार कर विविध साधनों के द्वारा भ्रा्मचतन करते हैं। उनका संसार उन्ही के भीतर रहता है और उसी में वे ध्यान, धारणा, समाधि आदि साधते हैं। बाह्य जगत्‌ का पतनोत्थाव किस प्रकार हो रहा है इससे उनका कोई सरोकार नहीं यदि सरोकार भी हो तो उन्हे अपने भीतरी “गिरघर गोपाल प्यारे! अथवा 'झात्माराम' की उपासना से फुरसत कहाँ ऐसे ऐकान्तिक साधक अपनी ऐकान्तिक साधना के बल्ध पर मुक्ति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं और होते है; वे अपने जीवन कात्ष में ही बह्मानद-हृद में भ्बाध गति से झवगाहन कर सकते हैं और करते हैं; वे अपने उद्धारक और पूण उद्धारक कह्टे जा सकते हैं परंतु वे संसार के भी उद्धारक हैं यह धडठले के साथ नही कहां जा सकता पेकान्तिक साधना की सरणि पर शल्तने वाले संतो का उपास्य कोई सगुण देव हो यह आवश्यक नहीं | साधक अपने निगु ण, निराकार, शुद्ध ग्रह्मचितन में ही मस्त रहता रहता दे अथवा अज्ञात के अन्तन सोन्दय पर फिदा होकर प्रेमोन्‍न्माद में ही अपनी ऐकान्तिक उपासना का आनन्द उठाता है यह तो हुई पेकाल्तिक उपासना की बात अब दूसरे भ्रकार की छोकोप-

कारिणी उपासना की ओर आइए संकेत किया जा चुका है कि ऐकान्तिक साधना व्यक्तिगत साधक को परम पुरुषा्थ सोक्ठ प्रदान करने वाली है। मो प्रा८ करने वाले धन्य हें। परंतु वे साधक जो स्वयं तो मोक्त के अधिकारी होते ही हैं साथ द्वी संसार को भी मुक्ति के पथ पर खाते हैं उनकी तुलना किससे की जाय ? ऐसे ही साधको में अन्यतम हैं हमारे सन्‍्त तुलसीदास इस विश्वकल्याणार्थी महात्मा को विश्वकल्याणकारिणी उपासना अभीष्ट थी। इसीलिए उन्हे संसार के समत ऐसे देव को उपासना प्रतिष्ठित करनी पडी जिसकी झोर छोगों का कुकाव सहज और सरल खुपसें हो जीवन में जाने कितनी दयनीय घटनाएं घटित होतीं हैं; जाने कितनी आपत्तियों के पहाड हमारे सामने ठहते हैं; जाने कितनी शोक-वह्धि की ज्वाल्ाएं हमें दग्ध करती

४७ संत तुलसीदास ओर उनके सदेश

हैं; निराश्रयता का अरक्पार हमारे चतुर्दिक्‌ लदराने लगता हैं--ऐसी दशाज्ओं में जो व्यक्ति हमारे साथ संवेदना प्रकक करता है हम जन्‍्म-जन्मान्तर के लिये उस पर अपना प्राणेत्स्ग कर देना चाहते हैं, उसके चरणों मे अपनी अपार श्रद्धा और प्रेम समपंण करने पर उतारू होकर उसका बेदाम का दास बन जाने के द्विए कमर कसे रहते हैं। तुलसीदास ने संसार के सामने अपने ऐसे ही उपास्य देवको उपस्थित किया है जो विश्वमात्र के साथ भूरितम संवेदना रखता है, प्रत्येक का दुःख बटाने वाला है, प्रत्येक को सुख पहुंचाने वाछा है, संसार-यात्रा में प्रत्येक का सहायक है ओर शण-छ्षण में प्रत्येक को आश्वस्त करने वाला है। इस देव का परिचय पाते ही कोन ऐसा इतभाग्य होगा जो उसके स्वागत के लिए हृदय पाँवड़े बिछ्लठा दे |! भोर जिसके हृदय को भगवान्‌ के चरणों का स्पश मिला वह अनायास ही मुक्ति का अधिकारी हुआ। गोस्वामी जीने अपने इृष्टदेव का जो लोकरक्षक स्वरूप चित्रित किया है वह लोकग्राह् होने के कारण ल्ोकोद्धारक भी है। दृष्टदेव के स्वरूप-निरूपण का विशेष बिस्तार करके यहाँ हम इतना ही कहना चाहते हैं कि तुलसीदास सदश समाजोद्धारक्क उपासक सगवान के गुणागार अवतारी स्वरूप में पूर्ण आस्था रखते हैं उसमें अपरिमेय शक्ति, शीत और सौन्दर्य के दुशन करते हैं#

संतों का त्याग

पीछे संतों की अनेक विशेषताओं की ओर संकेत करते हुए उनके गुणों को अगणित कद कर प्रसंग की इति की गई है। प्रस्तुत प्रसंग में संतो के स्याग पर कुछ विशेष प्रकाश ढालने की अपेक्षा है क्योंकि गोस्वामी जी की रचनाओं में इसकी व्यापक प्रतिष्ठा है। पहले त्याग की परिधि को समर लेता चाहिए | विश्व-सूत्रधार, इसें अपना जीवन-नाटक खेलने के लिए संसार के रंगमंच पर भेजता है इस एक से एक बढ कर नवीन भ्रासक्ति के पात्र बन कर झाते हैं। गम्म-मंथि के छूटते ही हमें माता के पयोधर का पीयूष पान करना स्वयमेव झाजाता है, क्रमशः होश संभाद्वने के साथ ही माता-पिता के प्रति इसारी झासक्ति बढती जाती है, काल्वान्तर हमें झपना कुटुम्ब अति प्रिय छगने लगता दे और इस उसी में निमस होने लगते हैं। हमारे बय-

# गोस्वामी जी के इष्देव का स्वरूप बहुत ही मार्मिकवा और विस्तार के ठाथ मेरे 'ठुलसीदास श्रोर उनका युग” ग्रथ के 'तुलसी की उपासना पद्धति! शीषक परिच्छेद में दिखाया गया है |

तुलसी की संत-भावना ४५

विकास के साथ हमारी इन्द्रियाँ और भी हुत गति से बढती चलती हैं और अपने अ्रपने विषयों की ओर हमें अ्नायास ही ख्लीचती हैं। हम दसो इन्द्रियों ओर ग्यारहवे उनके सम्नाद मन के वशवचर्ती होकर ऊटपटाँग गल में चक्कर काटते फिरते हैं तात्पय यह कि मन और इन्द्रियाँ स्वभाव से ही हें सांसारिक आसक्ति में डुबाए रहती दे इन्ही के वशीभूत होकर हम रूप, रस, गंध आदि विषयो में नाचा करते है। इन दुराधष इन्द्रियो को कायू में करना सच्चा त्याग है, वेराग्य है। महर्षि पतश्नल्तनि के मतानुसार वेराग्य का स्वरूप देखिए---

“इष्टानुभ्विक विषय वितृष्ण॒म्य वशीकार सज्ञा वैराग्यम्‌ ॥”

सूत्र से स्पष्ट है कि वैराग्य के लिए ऐेडिक और आसुष्मिक दोनों प्रकार के विषयो से वितृष्णा होनी चाहिए। लोकिक अथवा पारलोकिक सुख की किन्चित स्पूह्या रहते त्याग कैसा ? यद्द तो हुईं सामान्य वेराग्य की बात। अब परम वेराग्य को लीजिए---

“तत्परपुरुषज्यावेगुण बैठृष्ण्यम्‌ ॥”

त्रिगुणों से परे हो जाना ही परम विरागी की पहचान है! श्रिगुणातीस के लक्षण और आचरण आदि भी विचारणीय है। भगवद्गीता में कहा गया है---प्रकाश रूप सत््व गुण, प्रवृत्ति रूप रजोगुणग और मोइरूप तमोगुण के प्राप्त होने पर जो उनसे हं नही करता; उदासीन की तरह स्थित हुआ जो गुणो से विचलित नही होता; 'गुण ही गुणों में वतते हैं? यह समस्त कर जो अविचल रूर से स्थिर रहता है, जो सुख दुख में सम है, अपने श्राप में मस्त है, मिट्टी, पत्थर, सोना, प्रिय, अप्रिय सब को समान जानता है, धैयंचान है, निंदा स्तुति, सानापमान, शज्रु-मित्र के विषय में समदर्शी है और सवंथा आडम्बरों से दूर रहता हं--वहीं त्रिगुणातीत कहलाता है| वही अपनी अनन्योपासना के द्वारा परम पदाधिकारी होता है

(१ ) “पतज्जलि योग” “समाधिपाद' चृत्र ॥१५॥

(२ ) वही न्‍ शव

( ) गीता! १४।२२-२५

(४) वही १४।२६-२७

उपपु क्त ऐतिहा विचारों को ध्यान में रखते हुए तुलसीदास के त्याग विषयक विचारों की मीमांसा के लिए आगे बढना चाहिए। ऊपर कहा जा चुका है कि सासारिक एवं स्वर्गिक दोनों विषयो का त्याग ही सच्चा पैराग्य

४६ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

या त्याग है। गोस्वामी जी ने भी सच्चे त्याग का यही रूप माना है, फलतः:

उन्होने कद्दा है--

"एहि तन कर फल्न विषय भाई। स्वगहु स्वह़प अन्त दुखदाई' ॥” वस्तुतः ऐड्कामुष्मिक दोनों ही विषय त्याज्य हैं। इसी से बाबा जी ने

संतो को त्याग, विरति, वैरात्य झ्रादि का प्रशस्त पथ घुनः पुनः दिखाया है।

वैराग्य विरोधी संसार के इन तीन अजेय विषयों से सतके रहने की उनकी यह

चेतावनी बडी महत्त्वपूर्ण है--

“सुत वित लोक ईषना तीनी | केट्टि के मति इन्ह कृत सत्लीनी' ॥” इन त्रिविध एपणाओ का अत्यन्ताभाव हुए बिना वेराग्य कैसा! और

वेराग्योद्य बिना सन्त बनने का दावा झूठा है। जो साधु, सन्त शभ्रथवा भक्त

हैं वे भोगो को रोगों के समान त्याग देते हैं। देखिए --

“सैं जानी हरिपद रति नाहीं। सपनेहूँ नहि बिराग मन माहदी॥

जे रघुत्ीर चरन अनुरागी। ते रब भोग रोग सम त्यागी

काम भुअंग डसत जब जाही | विषय निंब कटु लगे तादी' ॥” २८ ५८ ५८

“रमा बिछास रास अनुरागी। तजतब बसन इब नर बड़ भागी ॥” पू् आचायों की भॉति तुलसीदास ने भी भ्रिगु्ों के त्याग को ही परम बेराग्य ठहराया है--- “कहिय तात सो परम बिरागी | ठून सम सिद्धि तीन गुन ध्यागी।॥” गीता के आधार पर त्रियुणातीत की उल्लिखित विशेषताओं को ध्याव में रखते हुए वियार करने से प्रकट होगा कि भोस्वामी जी ने भी उन्हें विशेषताओो को संतो का तत्चण ठहराया है। इसी से संतों को जन्म-मरण, सुख दुख, हानि-लाम, प्रिय-मिल्षन-वियोग आदि सभी स्थितियों में सम रहने का निर्देश किया है'। यह भी कहा है---

( ) मानस! 3० ४३.२

( ) वही १४% ७०.६

( ) 'विनय०” पद १५७

(४) मानस' श्रयो० ३२२.८

( ) वही अरण्य० १४.८

(६ ) देखिए, 'मानस” अयो० २४८०५०---७

तुलसी की संत-भावना ७9७

“सम अभूत रिपु विसद बिरागी। लोभामष हु भय त्यागी'॥' ४५ 4 9८ “अखिल जीववत्सल निमत्सर चरन कमर अनुरागी। ते तब प्रिय रघुबीर। धीर मति अतिशय निजञ्ञ पर त्यागा ॥” ऐसे स्यागी संत कचन और काँच को सम जानते हैं, कामिनी को काष्ट ओर पापाण समभते हैं निन्दास्तुति में अभेद बुद्धि रखते हैं'। मानापमान को भी एक दृष्टि से देखते है? अस्तु विचारणीय है कि गोस्वामी जो ने त्याग का लद्॒य क्या माना है। सन स्वभावतः विपथगामी होता; यह आत्मा के दिव्य स्वरूप का विस्मरण कर इन्द्रियो का दास होकर विषयों में हो सना रहता; जन्म-जन्मातर के विषय- संस्कारों के कारण इसकी विषयासक्ति का वारापार नहीं रहता फलत:ः इसे शांति या विश्राम की छाया स्वप्न में भी नहीं छूती। विरति, विवेक, त्याग आदि के द्वारा ही इसे विश्राम या शांति मिल सकती है। अतएव, त्याग शांति-पद का अचूक साधन है देखिए, निम्नांकित पद में मन की व्याकुलता और उसकी मलिनता का संकेत करते हुए उसे स्वच्छ और शांत करने का एकमात्र साधन भी बताया गया है-- “कबहूँ सन विद्याम मान्‍्यो | निसि दिन अभ्रमत विसारि सहज सुख जह तह इन्द्रिन्ह तान्यो॥ जद॒पि विषय संग सद्यो दुसह दुख विषम जार अरुकतान्यो। तद्पि तजत मूद समता बस, जानत हूँ नहिं जान्यो॥ जनम अनेक किए नाना विधि करम-कोच चित सान्‍यो। हाय बिमछ विवेक नीर बितु वेद पुरान बखान्यो॥ के ' सर खनतहिं जनम सिरान्यो'॥” ओर भी स्पष्ट शब्दों में कद सकते हैं--“ त्याग को भूषन सांति पद, तुलसी अ्रमल्ल अदाग” ॥? यह 'सांतिपद' मन के विश्राम का दी धोतक है। सन जिस समय विस्लाम आाप्त कर क्षेत्र है उस समय--- “सकलछ काम बासना बिलानी। तुलसी यह सांति सहिदानी॥”

(१) वहीं उ० ३७.२ (५ ) वही उ० १३, (२ ) विनय० पद ११८ (६ ) 'विनय०” पद व्यय (३ ) विराग्य०” दो० २७, र८ हि (७ ) 'ेराग्य०” दो० ४४ (१ ) मानस उ० रेप. (५) वी *१

धर संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

मन को विश्राम देने का अद्वितीय साधन ही मानने के कारण तुलसीदास ने व्याग की अप्रतिम प्रतिष्ठा की और उसे संतों का परमोच लक्षण ठहराया“ इसमें कोई सदेह नही ध्याग के स्थूल्न अर्थ को ध्यान में रखकर ऐसी शंका भी की जा सकती हे कि क्‍या कर्मो' का करना ही त्याग है ? उत्तर है--नहीं। कम दो प्रकार के होते हँ--सत्कम तथा असत्कर्म इनमें से दूसरे प्रकार के कम निंध होने के कारणा त्याज्य हैं। त्याज्य कर्मों के उदाहरण देने की आवश्यकता ही क्या जब कि संसार में ऐसे कमों का बोलबाला है। हाँ, सत्कर्मों के विषय में कुछ विधार अवश्य कर लेना चाहिए | भगवदगीता में कद्दा गया है-- “त्याज्यं दोष बद्त्यिके कर्म प्राहुमंनोषिणः यज्ञ दान तपः कम त्याज्य मिति चा परे॥ |; यज्ञ दान तप: कम त्याब्यं कायमेब तत्‌। यज्ञों दानं॑ तपश्चेव पावनानि मनीषिणाम्‌॥ एतान्यपि तु कर्माणि सहूं त्यक्त्वा फछानि | कतव्या नीति मे पथ निश्चितं मतमुत्तमम्‌ ' ॥?” अझवतरण से स्पष्ट है कि सत्कर्मों का करना तो आवश्यक है पर उनमें आसक्ति और फल्च की कामना का अभाव होना चाहिए। अपने वर्ण-बिहित कमों को निष्काम भाव से सम्पादित करते रहना ही कतंव्य है। निष्काम करे करना ही त्याग है। ऐसे ही निष्काम कर्म को गोस्थामी जी के विचार से भी तंतो का त्याग कद्ठा जा सकता है। देखिए-- “त्यागहिं फरम सुभापुमदायक | भजर्दि मोदि सुर-नर-मुनी नायक ॥॥” “प्रथम्राहि विप्त चरन अति प्रीति निज निज करम निरत सुति नीती यहिं कर फलु सनु विषय बिरागा। तब सम॒ चरन उपज अनुरागा ॥” सन को विषय विसुख होने के क्षिए, त्याग की उत्तरोत्त अभिवृद्धि और पुष्टि के किये 'प्रबोध चंद्रोद्य' का यह सह्स्वपूर्ण निर्देश स्मरणीय है-- “सावानाम नित्यता भावनमेव तावन्ममतोच्छेदस्य प्रथमोड्भ्युपायन' ।?

(१ ) गीता १८३, ५,

( ) 'मानसखो 5० ४०.७

( हे ) मानस अरण्य० ६५,३६.७

(४ ) प्रबोध चन्द्रोदय' पंचमो अंक एलोक २६ के पश्चात

तुलसी की संत-भावना ४६

इधर वेराग्य साधन के लिए वेराग्य का प्रथम सोपान जिसका तुझूसीदास ने निदेश किया है वह यह है---

“धर्म तें बिरति, जोंग तें ग्याना। ग्यान-मोच्छ प्रद्‌ वेद बखाना'

हमें स्वधर्मांचरण करते हुए, मन को विषयो से पराइ्खुख करने के लिए उसे नाना प्रकार से चेतावनी भी देते रहना चाहिए। ऐसा करतेनन्‍करते मन को जग जामिनी' में देह-गेह नेह”ः सभी 'घन दामिनी' घबत्‌ प्रतीत होने छगेंगे' भगवान की विषम माया से श्राज्षिप्त जीव को चाहिए कि वह इस घोर, गंभीर, गहन संसार कांतार की दुर्भधता ओर भयंकरता के स्मरण मात्र से संत्रस्त द्ोकर प्रवृत्ति रूप आपगा में पाप की उतुझ्न तरगो को पुनः पुनः आकाश चूमते देख भयभीत हो उठे, उसकी अपार दुस्तरता विचारे और अपने तन, मन, सुदृद, परिवार प्रतिष्ठा आदि खब को उक्त भयावह आपगा के विविध अवयव मान कर उनसे झनासक होने का प्रयास करें साथ ही कलि की प्रचंडता और काल को कठोरता समझ बार-बार भगवान्‌ की शरण में जाएं; अहंकार और मन की चंचलता दोनो को बंधन का महान कारण जान उन्हे छोडने का सतत प्रयास स्वयं करता रहे ओर इस हेतु भी भगवत्कृपा का याचक निरंतर बना रहे; आशभ्यन्तरिक मलोच्छेद कर हृदय को शुचि एवं पविन्न बनाए और सदेव यह विचार करता रहे कि जन्म-जन्म के अभ्यास के कारण मन सोह-जनित नाता प्रकार के विषयों से पंकिल हो गया है, आँखे परनारी को देखने से मज्तिन हो गईं हैं, हृदय, वासना, सान, मद आदि के कारण मद्तिन हो गया है; में झपना सहज सुख छोडने के कारण मज्निन हो गया हैं, कर पर-निंदा सुनते-सुनते और जिद्मा पर-निंदा गाते-गाते मत्निन हो गईं है, भगवदभक्ति करने से सभी प्रकार के मत्नो का भार मेरे पिर पर लंद गया है--अतएव मेरे खिए इन सभी प्रकार के मलो से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय है भगवदूमक्ति हृदय जब तक मत्र शून्य नहीं होता तब तक उसमें बेराग्य कौ प्रखर ज्योति देदीप्यमान नहीं होती ओर हृदय के

(१ ) मानस” अरणए्य० १४५१

(२) विनय० पद ७३ जागु जागु जागु जोब जोहै' जग जामिनी देह-गेह नेह जानि जैसे घन दामिनी ॥”

(३ ) वही पद ८१

(४ ) वही पद ८२ हा

५० संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

आखोकित हुए बिना 'जगजोनि' अमण ही बन्द होता और शांति ही मिलती |

त्याग का यथार्थ स्वरूप हृदयंगम कराकर उसकी परिपुष्टि में योग देने वाले अ्नेकानेक सुंदर पद्‌ “विनथपत्रिका' में समाविष्ट है' इन पदों के द्वारा गोस्वामी जी ने वह मनोकज्ष साग॑ बताया है जिसके अनुधावन मात्र से हम सच्चे त्यागी बन सकते हैं ज्योही इमें वास्तविक त्याग की पूर्ण अनुभूति होगी त्योहदी हमारे हृदय से माया के प्रपंचोी का नितांत अभाव हो जाएगा, भर तत्परिणास स्वरूप अनायास ही हमसे आनन्द की सहजानुभूति दोने लगेगी इसीसिए संसार-संतरण का सर्वोच्कृष्ट उपाय है--स्याग | देखिए---

“बहु उपाय संघार तरन कई बिमल गिरा श्रति गावै। तुलसिदास 'मैं' मोर” गए बिलु, जिव सुख कहूँ पावे |”

कहना नहीं होगा कि 'में', 'मोर' ही साया का स्वरूप है--

मैं अरु मोर तोर ते माया | जेहि बस कीन्हें जीव निकाया | गो गोचर जहँ लगे मन जाई सो सब माया जानहु भाई ॥!

संतमत और लोकमत का विरोधाविरोध

संत-भावना एव संतों के विशिष्ट व्याग की हस सक्षिप्त चर्चा को साधुमत

की ऊॉँफकी के लिए पर्यात समझ कर अब हम संतमत झौर लोकमत के विरोधाविरोध का प्रसंग छेढ़ना चाइते हैं इस प्रसंग के स्पष्टीकरण के हेतु इससे अधिक कहने की आवश्यकता नहीं कि संतमत का परिपात्नन वैयक्तिक साधन कहद्ा जा सकता हे और लोकमत का अनुसरण उन सावभौमिक सिद्धान्तों का अनुधावन कहा! जा सकता है जो समाज के सुब्यचस्थित संचालन के लिए प्राचीन परंपरा से चले रहे हद एक दृष्ठान्त के द्वारा भी संतमत झौर लोकमत का भेद समझ लीजिए काकभुशुंडी के जन्मान्तर के शआाख्यान में गुरु ने शिष्य की घोर शठ्ता देख कर भी उसका “परस कल्यान” चाहा, यह साधुमत की बात है, क्योंकि---

( ) विनय०? पद १२३

(्‌ ब्‌ ) वही ,, ११७, ११६-१२२, १२६, १३६, १६८, १६९, २०२ ( रे ) वह्दी 99 १२०

(४) 'मानत' शझरण्य० १४.२,

तुलेती की संत-भावना। ४१

'उम्ता संत की इहै बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई! ॥!

इसके विपरीत हर ने क्रद्ध होकर जो शाप दिया वह लोकमत को रखा हुईं क्योंकि खोकमत के अनुसार नियमों के अतिक्रमण करने वाले व्यक्ति को दंडसागी होना चाहिए प्रस्तुत दृष्टान्त में संतसत और लोकमत का विरोध दिखाई पडता है अर्थात्‌ संतमत अपराधी का भी कब्याण चाहता है और लोकमत अपराधी को दंडनीय ठहराता है और दड देता है। तुलसीदास लोकमत के ही समथक है, इसीलिए उन्हों ने लोकमत विरोधी को दंड दिकाया है। लोकमत की पुष्टि के लिए उन्हों ने दोहावली' में भी कई इष्टान्त उपस्थित किए हैं |

जहाँ संतमत और लोकमत में पररुपर ऐसे विरोध की संभावना नहीं जो लोक-हानि का कारण हो वहाँ संतमत ही श्रेयस्कर बताया गया है। देखिए---

'जूमे ते भर बवृमिबो, भरी जीति ते द्वारि। डहके ते डहकाइबो भलो जो करिआ विचारि॥”

संतमत और क्लोकमत के विरोधाविरोध का नि्णय गोस्वामी थी के शादर्श पात्रों द्वारा भी किया जा सकता है यथा, भरत जो संतो के साक्षात्‌ प्रतीक हैं फल्वतः वे संतमत के पक्‍के अनुयायी और श्रादर्श हैं। उनके विषय में स्वयं राम ने कहा है--“मिरत कहे महें साथु सयाने |”

भरत के प्राय. सभी कार्य साधुमत के अनुसार हुए है हाँ, जब वे राम को लौटाने के लिए वन में आए और वहाँ उनसे मिल्रे तो अन्त में उन्‍्हों ने राम को लोटा ले चलने का विचार छोड दिया--यही एक अपवाद है। यहाँ उन्हे कोक- मत के सामने साधुमत को महत्त्व देना ठोक नहीं जेंचा श्रत, प्रजा के कल्याण की कामना लेकर वे अयोध्या ल्लौट आये; अवधि पंत साथना करते हुए भी लोकमत के अनुसार प्रजा-पात्नन से संत रहे

राम ने छोकमत का केसा निर्वाह किया यह भी द्रष्टव्य है। तुलसीदास के हो शब्दो में राम लोकमत के वशीभृत ह--

( ) 'मानस' सुदर० ४०.७

( ) 'दोहावली' दो ३६३-४०१ (३ ) वही दो० ४३१

(४ ) 'मानस' अ्रयो २२५.५

५३ संत तुलसीदांस ओर उनके संदेश

'ठोछ एक भाँत को, त्रिकोकनाथ लोक बस, आपनो सोच, स्वामी सोच द्वी सुखात हो' ॥। यद्यपि गोस्वामी जी ने रामको लोक बस' ही बताया है , पर जहां कहीं उन्होंने राम की लीला दिखाई है वहीं उसमें साधुमत की प्रतिष्ठा कर दी है। वस्तुतः उनके विचार से राम साधुमत के पोषक होते हुए लोकमत के वशीभूत हैं। एक उदादरण से बात स्पष्ट हो जायगी रास ने द्वाथ जोड़कर अनुनय- बिनय करके समुद्र से पार जाने का रास्ता माँगा, उनका यह झ्राचरण साधुमत के अनुकूल हुआ, परंतु अपनी याचना के निष्फत्ष दोने पर क्षुब्ध होकर-- संघानेड प्रभु बिसिख करालहा | उठी उद्घधि उर अंतर ज्वाढा॥ अस्तु, उद्धि के हृदय में ज्वाला उत्पन्न करने वाला सर-संधान लोकमत के अनुकूल हुआ क्यों कि लोकमत के अलुसार शठ से विनय करना द्वी भूल दे | वहाँ तो नीचो का गछा दबा कर ही काय कराने का विधान है' | राम ने रावण आदि राचसो का वध सी लोकमत के कारण ही किया अन्यथा साधुमता मुसार तो सब कुछ खोकर भी संतोष किए बेठे रहना चाहिए था अन्त में अब जरा छक्‍्मण के छोकमत पालन का नसूना देखिए | में सम- सता हूँ, लत्तमण ल्ोकमत के उत्कट अजुयागरी चित्रित किये गए है। इनकी साधुमत-पालन की प्रवृत्ति बहुत दृढ़ने पर मिलने तो मिले तो मिल्ले जब देखो सब वे छोकमत के अनुसार तुरंत कमर कसे तैयार रहते हैं। समुद्र-शोषण के लिए रामने बाद में जिस जिस लोकमत का अनुसरण किया उसे लक्ष्मण पहले ही बता चुके थे--- “ज्ञाथ देव कर कवन भरोसा। सोखिय सिधु करिय मन रोसा। कादर मन इहूँ एक अधारा। दैव देव आलसी पुकारा गोस्वासी जी का कुछ ऐसा निश्चित विचार अवगत होता है कि संतमत का पुट ज्लोकमत के साथ तब तक भ्रवश्य छगा रद्दना चाहिए जब तक कि प्रथम का द्वितीय से कोई विरोध नहीं होता; परंतु जद्ाँ वे परस्पर विरोधी हों वहाँ लोकमत को दी प्रश्रय मिल्लना चाहिए इसदशा में साधुमत की किद्वित

(१ ) कविता०? उ७०७ छु० १२३ (२ ) मानस सुदर० ६७.६ (३) वही », ५२.२ (४)वही (५५ ) वही 99 ०, ,४

तठुलंती को संत भावना ४३

उपेक्षा निदनीय नहीं दूसरे शब्दों में यों भी कद्दा जा सकता है कि व्यवहार- क्षेत्र में सबंदा और सवंथा अलनुकरणीय द्वे--लोकमत, कितु साधना-्षेत्र में साधुमत की प्रतिष्ठा होनी चाहिए

स्त्रियों के प्रति संतों को परंपरा से गरहीत विचार

संत भावना के लोक में स्तियों की प्रतिष्ठा भी विचारणीय है। सबप्रथम देखना चाहिए कि प्राचीन परंपरा के पिरथिक विराणी साधुन्संतो ने नारी के प्रति कैसे विचार प्रकट किए हैं। पद्ल्ले परम विरागी भतृहरि सच्श महास्सा के उपदेशो को लीलिए--

“सत्यं जना बच्मि पक्तपाता-लोकेषु सबंबु तथ्य मेतत्‌। न्‍य नन्‍्मनोहारि नितम्बिनीभ्यो दुश्खेक हेतुन कश्चिदन्यः”॥

इस निष्पक्ठ उक्ति से स्पष्ट है कि नितम्बिनी सर्वोपरि मनोहर वस्तु तो है पर उससे बढकर कोई अन्य दु खदायी वस्तु भी नहीं। लारी वैराग्य नष्ट करने का मुख्य कारण है यह सिद्ध करने के लिए भतृदरि ने कहा है- यह विवेक रूपी निमंल दीपक विवेकियों के हृदय में तभी तक प्रकाशसान्‌ रहता है, जब तक वह सृग नयनी ख्थियो के चंचल नेत्र रूपी अंचल से नहीं बुकाया जाता |” और भी, “मनुष्य सन्‍्माग में तभी तक प्रवृत्त रहता है जब तक कि लीलावती भामिनियों के नयन बाण से बिधा नही जाता ॥” नारी का कटाक्‍ नरक का द्वार उन्सुक्त कने का साधन भी माना गया है'। नारी माया की कैसी पिदारी है, यह देखिए---

“आवते संशयानाम विनय भव पत्तन॑ साहसानां

दोषाणां सन्निधा्नं कपट शतमय क्षेत्रम प्रत्ययानाम्‌

स्वग द्वारस्थ विध्नो नरकपुर मुर्ख सबंमाया करण्डं

स्त्री यन्त्र केन सष्ट विषममस्तमय प्राखिनां मोहपाशः

उद्धरण में इड्ित भयावहता और भी बढ जाती है जब कि भतृंहरि नारी को विषेले सपंसे भी अधिक विषेत्नी सिद्ध कर देते हैं--सपंका विष तो मन्‍्त्रादि

( ) /शगार शतक” इलोक ५४

(२) वही » रे, (३२) वही , ( है] ) बंदी 9१ ६२

(५ ) शगार शतक श्लोक ७६

५9 संत तुलसीदास ओर उनके-संदेश

तथा श्रोषधियों से उतारा जा सकता है, परन्तु प्री का विष किसी प्रकार नहीं उतरता' भागवत' में ख्री का संग और ख्री का संग करनेवाले दोनो ही बन्धन के कारण 5हराए गये हैं- ने तथास्व भवेन्मीहों बन्धश्चान्य प्रसंगत. योषित्सगाद्यया पुसो यथा तत्संगिसंगत:' ॥” चाणक्य नीति, द्वितोपदेश, पत्चतन्त्र प्रश्नति नीति अन्थो के नारी-विषयक ऐसे विचारों को विस्तार भय से छोड, हम निगु पन्‍थी दो महात्मा कबीर झोर दादू के नारी परक उपदेशों की ओर संकेतमात्र कर गोस्वामी जी की झोर बढ़ना चाहते हैं कबीर की दृष्टि में 'कांमणि काली नागणी” है; वह 'पांणि कौ मीना! भी है, अतएव छेड़ने पर काट खाती है। नारी क्‍या अपहरण करती है और उसके द्वारा साधक क्या खोता है, यह देखिये--- नारी सेती नेद्द बुधि विवेऊ सबही दर कांई गवाबव देद कारिज काई ना सर!॥! ५८ ५८ ५८ नारी नपावे तीनि सुख, ज्ञा नर पासे होई। भगति, मुकुति निज ग्यान मे पेसि सकई कोइ कयोर ने 'कनक अरु कामनी' को वह तीर्णं ज्वाक्षा धोषित किया है जिसे दूर से देखने पर भी शरीर भस्म दोने लगता है और कहीं स्पश कर किया तो बचाने वाला कोई नहीं शअ्रप्मि की ज्वाला के भ्रतिरिक्त नरक का कुण्ड” भी नारी ही है | इस कुण्ड में गिरने से बचने वाले विरक्े साधु ही

(१) वही १» ८३, ८३ (२) भागवत ३॥३१।३५ ( हे ) 'कबीर अन्थावली” कामी नर की अंग सांखी

(४ ) वही १9 १8 (५. ) वही 99 कर (५ ) वही 39 39 २० ( ) वही १5 १२

(८) वही 99 38. (४,

तुलसी को संत-भावना श्र

होते दे कबीर की ऐसी ही ओर भी बहुत सी साखियाँ है जिनमें उन्होंने भर पेट नारी-निंदा की है |

दादू दुयाल ने भी कबीर ही की भांति कनक-कामिनी की कुत्सा की है | इन्हें माया का प्रबत्त रूप माना है! दीपक की शिखा बताया है जिसमे जीव पतिंगे अनायास ही आकर भस्म होते हैं | नारी “नागेणशि' के उसने से कोई नही बच पाता, अ्रतः उससे बहुत सतक रहना चाहिये दादू के बिचार से नारी नागिणी' ही नहीं वर 'वाधिणी” भी है, जो छोग इसमें आसक्त होते हैं उन्हें यह निश्चय ही खा जातो है'। नारी को इतना खतरनाक समझ कर दादू दयाल सलाह देते हं--

नारी नेन देखिए मुख सू' नाव लेइ कानों कामणि जिनि सुण, यह मण ज्ञाण देह |।'

दादू के पश्चात्‌ अब अपने कथनानुसार हमें गोस्वामी जी की ओर आना चाहिये पर उनके अनन्य जोडे सूर को केसे छोड़ा जाय | अस्तु, भधिक नही तो दो-चार शब्दो में दी इम सूर के विचारो को भी ध्यक्त कर देना चाइते हैं। वण्य, विषय, उपासना-पद्धति, एवं घोर रसिकता से संप्क्त अपनी व्यक्तिगत प्रवृति के कारण सूर ने जैसे अपनी रचनाओं में सामाजिक, नैतिक अथवा साधनात्मक अन्यान्य बहुत-ली बातों की ओर विशेष ध्यान नही दिया वैसे ही नारी निंदा-स्तुतिकी ओर भी तो भी साधक होनेके नाते उन्होंने भी “सामिनी' और 'भुअंगिन! की समता कर दी है--

“भामिन ओर भुअंगिन कारी इनके विषद्दि डरेए। राचेद विरचे सुख नाहीं भूलि कबहु पत्यए इनके बस मन परे मनोहर बहुत जतन करि पए कामी दोइ काम आतुर तेहि केसे पं समुझेए' ॥”

(१ ) दादू दयालकी बानी” भाग £ (१२) माया को अंग साखी ३२८, १३५

( रे ) वही 399 99 99 9) 9 59 89 3२, ७दे ६३ ) वही 38 38 9 8 $# 99 9 १%० ( ४) वही 3) 38 3) 9 39॥ $ (+६ (५) वही 9 8 98 $॥ 99 39 9

( ) 'सूरसागर ४० ४०६

४६ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

और भी-- “ज्ञारी नागित एक स्वभाउ ।** नागिन के कादे विष होइ।

नारी चितवत नर रहे मोइ'।” संतों की परंपरा में स्त्रियों के प्रति जो विचार गृहीत थे उन्हे ध्यान में रखते हुए अब विचारणीय है कि इस सबंध में तुलसीदास की क्‍या धारणा थी ! इसमें संदेह नद्दी कि संतों के परंपरागत विचारो के अनुसार तुलसीदास ने भी स्त्री को बंधत का कारण मायारूप ही माना है पर उन्हों ने डसे न्ागिन!, बाधिण', “नरक-कुड' आदि कह कर गालतियाँ नहीं दी हैं। उन्हो मे मर्यादा के अनुरूप साहित्यिक ढंग से दशौया है कि काम-क्रोध-लोभादि-मद प्रवल्ल मोह की सेना के शूर है और इन्ही अजेय शन्रुओ में अति दारुण दुखद माया रूप नारी भी है नारी ही 'मोह-विपिन! की बसंत है; सारे जप-तप-नेम प्रद्धति जल्लाशयों का शोषण करने के लिए नारी ग्रीष्म है; काम- क्रोष-मद-मत्सर रूप मेढकों को जीवन दान देने के लिए नारी वर्षों का प्रथम जलन ( दूवगरा ) है; दुर्वांसना रूप कुमुदों को उत्फुल करने वाली शरद भी नारी ही है; वही समस्त धर्म रूप कमत्नों को झुलसाने से लिए हिम है, ममता रूप जवासा नारी-शिशिर को प्राप्त कर डहड॒हाता है, पाप-डल्कों के लिए सुखकर निविड़-तिमिरमय रजनी भी नारी ही है; इतना ही नहीं, सत्य, शील, चुक्टि, बल, रूप मछलियों को फसाने की तीदुण बंसी (कठिया ) भी नारी हैं| प्रमदा दी अवगुणों की मूल, शूलप्रदायिनी, यातनाओं की खान है” युवती का तन दीप-शिखा के समान है उसमें भस्म होने के लिए मन को पतिंगा नहीं होना चाहिए" बेर और झूत्यु का कारण भी नारी है। झूर-नयनी का कटाच सर बडा ही भयंकर होता है उससे बचने वाले घन्य हैं। तुलसीदास के इन विचारों से स्पष्टतया प्रकट द्ोता है कि उन्हों ने नारो के उस पत्ष को उद्घाटित किया हैं जिसके द्वारा विराग की पुष्टि होती है। संकेत किया जा चुका है कि इन्द्रियों के विषयों पर अधिकार पाना सच्चा त्याग है। स्त्री अनेकानेक विषयों की पोषिका है। फलतः एकमामन्र स्त्री के प्रति

(१) 'दूरसागर' 9० ६५

( ) 'मानस' अ्ररय० ४३. 'दोहावली' दो" २६६

( हे ) मानस अरण्य> ४३.१-८

(४)वही ,, ४४.

(४ ) मानस” अरण्य० ४६. 'दोहाबली' दो० २६६ 'विनय० पद १४२

तुलसी की संत-भावना घड

वराग्य जाने पर कितने ही विषयों का दमन स्वयम्रेव हो जाता है; इस देतु प्रमदा के प्रति त्याग को दृत्ति उत्तरोत्तर इृद करने के लिए आवश्यक है कि साधक उससे विरक्ति उत्पन्न करने वाले विचारों की ओर ध्यान दे | मन दीध रोगी की भाँति कुपथ्य ही चाहता है, परन्तु चतुर साधक-वद्य डसे कुपथ्य से हठा कर कडवी ओषध के समान विराग के साधनों का सेवन ही बताता है। यही कारण है कि अन्यान्य संतों के इस विचार से गोस्वामी जी की विमति नद्दी कि साधनक्षेत्र से च्युत करने ओर पतन के गत में ठकेलने में नारी का बड़। हाथ रहता है

तुलसीदास ने नारी-प्रकृति के कृष्ण-पत्त भर उसकी सहज दुशृसतियों को खोल-खोल् कर इसीलिए दिखाया है कि उस ओर ध्यान जाते ही नारी के प्रति श्रनासक्ति हो इस संबंध में हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि उन्दों ने कोईं अनगंल या मनमानी बात नही कही है। वस्तुतः नारी श्रकृति की जो दुबंलताएँ प्राचीन १२ंपरागत शास्त्रों में वर्णित हैं भ्रधिकोश में वे ही दर्शायी गई हैं उन्हों ने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर भी जो कुछ कह्दा है उसमें लल्ल-बुदू के अप्रतिभ अनुभवों की एकांगीकता नहों अत्युत सर्वजनीन सावंभौमिकता है

तिरिया चरित्तर अपार, अगम्य सागर दे, दपण में हम अपना प्रतिबिंव भले ही पकड़ लें कितु “नारिगति! हमारी पकड़ के बाहर हैँ, प्रबल अबक्ा सब कुछ कर सकती है; उसकी लीला को सममना टेढी खीर है उसे विधाता भी नहीं जान सकते“; नारी कैसी कामान्ध होती है इसका तो कुछ कहना ही नही, मनोहर पुरुष देखते दी वह मर्यादा का अतिक्रमण कर बैठती है--- “थ्राता पिता पुत्र उरगारा। पुरुष सनोहर निरखत नारी

दोइ बिकलछ मन सकइ रोकी जिमि रबि मनि द्रव रबिद्ि विज्ञोकी' ॥?

इसके अतिरिक्त वह इतनी बेवफा होती है कि हृदय में रखने पर भी

किसी की नहीं दोती--- “राखिय नारि जद॒पषि डर साहीं। जुबवती साथ्र तृपति बस नाहीं'॥”

(१) मानस” अयो० २६.७ ( २) वही ,, ४५.८

( दे ) वही ,, ४७, ( ष्ठं ) वही 99 १६०, (५ ) वही अरण्य० १६.५, $,॥ (६ ) वही » ३२६,६

प्र संत तुलसीदास और उनके संदेश

नारी के ये श्राद अवगुण जन्म-सिद्ध माने गए हैं--- साहस अनृत चपलता माया भय अबिबेक असोच अदाया'॥”

जडता और अझज्ता स्त्री-प्रकृति के सहज अंग है'। गोपन की प्रवृत्ति भी डसकी स्वभावगत प्रमुख विशेषता है वह सशंक और कच्चे मनवाली भी होता है' |

तुलसीदास ने स्त्री-स्वभाव के इस निदकृष्ट स्वरूप का चिश्वण जिस झमिग्नाय से किया है वह यही है कि साधना क्षेत्र में पाँव रखने वालो का मन रमणी में रमे हसके अतिरिक्त उनका कोई अन्य भमन्‍्तब्य सोचना ठीक नहीं थे स्त्री-जाति से चिढे थे अथवा उन्हें उससे कट अनुभव हुआ था, इसकल्विए उन्हों ने ऐसा चित्रण किया ऐसी बात नहीं। यदि कोई घोर विषया- सक्त अपनी प्रबल श्रासफि के कारण किसी कुछटा में ही समस्त गुणों को ल्ञा-ज्ञाकर आरोपित करे और उसके अंग प्रत्यंग में मोद्च का साधन बताए तो इसका अभिप्राय यह नहीं हुआ कि वह स्त्रियों के प्रति बड़ा उदार है ग्रत्युत यहाँ यही कहना समीचीन होगा कि वह झपनी आसक्तिवश प्रशंसा का पुद् बाँध रहा हे। इसी प्रकार यदि कोई विरक्त अपना वैराग्य इढ़ करने अथवा ओरो का वेराग्य दृढ़ कराने के ल्विए नारी-निंदा करे तो उसका झाशय यह नहीं हुआ कि वह नारी-जाति के प्रति अनुदार है

गंभीरता से विचार किया जाय तो अवगत होगा कि तुझ्सीदास ने जोक- कल्याण के विचार से भी स्त्री-मकृति के कृष्ण-पक्ष का प्रकाशन किया है। उन्हों ने नारी स्वभाव की जिन ग्रुटियो को दिखाया है थे उसमें अधिकांश में रहती हैं अवश्य यह दूसरी बात है कि किसी में न्यून मात्रा होती हैं और किसी में अधिक नारी-जाति का सब से बढ़ा समथंक होकर में मुंह से भक्ते ही कह दूँ. कि नारी इन निबंतताओं से शून्य होती है पर मेरी अन्तरात्मा कदाचित्‌ ही ऐसा कह सके और यदि मेरा हृदय सचमुच ही नारी को इन दोषों से रह्दित स्वीकार करता है तो में यही कष्ट सकता हूँ या तो मुभे नारी-हृदय की परख नहीं अथवा उसकी माया में पढ़ कर में उसके

वामन्तविक रूप को नहीं पहचान पाया। ऐसी दशा में इमें गोस्वामी जी की परस

(१ ) मानस लं० १५८३

(२ ) वही बा० ४७,

(३ ) वही ,, ४२

(४ ) वही ,,४०.६, लं० ३६,

तुलसी की संत-भावनां

को ही ठीक समझना चाहिए और विचार करना चाहिए कि इस ठीक परख से मेरे अथवा लोक के कल्याण की संभावना किप्त रूप में होगी। व्यक्तिगत रूप में संभाव्य कल्याण यही कहा जा सकता है कि हम नारी के फेर में पढ़ कर बरबाद नहीं होगे कढपना कीजिए कि हम इसे पक्की बात मानते हैं कि स्‍त्री एफान्त पाकर मय्यांदा का अतिक्ररण करके हमारी ही भाँति चंचल हो सकती है फिर तो हम एकान्त में किसी स्त्री के साहचय का अवसर ही नहीं आने देंगे यदि हम जानते हैं कि नारी में अविवेक की मात्रा अधिक है तो हमें उसके अविवेकमय कार्यो का कुफल नहीं भोगना पडेगा। इसी प्रकार यदि हम इस तथ्य से परिचित हैं कि स्त्री अपनी चंचलतावश बडे से बडा झनथथ कर सकती दे तो हम उसके अनथों' से भी सावधान रह सकते दें। एक उदाहरण से इन बातो का स्पष्टीकरण हो जायगा मान लीजिए इसमारे पास एक सधा हुआ स्वामिसक्त अश्व है जो किसी समय अपनी अमुक नैसर्गिक प्रणा होने पर हमें अपनी पीठ से फेकने का प्रयत्न करता है, इस परिस्थिति में घोडे की उस विशिष्ट प्रेरणा को भल्नलोभाति जानकर ही इम सतक और सुखी रद सकते हैं। यही बात स्त्रीपर घथाहएु यावव्‌ हमें डसकी प्रकृतिगत निबल्लताएँ नहीं माठ्म रहती | तावत्‌ उससे गाफिल पढ कर हम चूर-चूर हो सकते हैं। स्त्री यदि अपनी जन्मजात दुर्बेछताओं को जानतो रहती है तो वह भी उनके निराकरण का प्रयास करेंगी इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि वाबा जो ने नारी के कृष्णपत्त की अभिव्यक्ति करके साधुमत का तथा लोकमत दोनों ही की योग दिया। इसी प्रसंग में हमें यह भी ध्यान से रखना चाहिए कि लखोकद्वित के ल्विए नारी जाति का बहू शुक्ज॒पक्ष जो जीवनदायक होता है तथा जिससे समाज उत्तरोत्तर समृद्ध और सुखी होता है उसकी भी व्यापक ओर हृदयभ्ाहिणी अभिव्यक्ति गोस्वामी जी ने की है। इस विषय की भ्थेष्ट चर्चा मेने अन्यत्र की है!

तुलसीदात के भ्राता पिता पुत्र उरगारी“ ' 'रबिदि बिल्लोकी ।' का प्रतिस्पर्धी वक्तव्य किसों भ्रग्य सन्‍त की रचना में नहीं मिलता इसलिये थे नारी के प्रति झनुदार ठहराये गये हैं#। ऐसी नीतिपरक उक्तियों के आधार पर फैसला देना डचित नहीं 'द्वितोपदेश” सद्श नीति-अंथ में भी ऐसी उक्ति समाविष्ठ है---

4 देखिए--- तुलसीदास और उनका युग” के 'तुलसीदास का सामाजिकमत' शीषक परिच्छेद मे सन्निविष्ट समाज मे स्त्रियो का स्थान # दे० माताप्रसाद गुवः तुलसीदास! ६० ३५०१--२

६० संत तुलसीदास और उनके संदेश

सुवेष पुरुष दृष्टा भरातर जनक वा सुतम | योनि: क्लिद्यति नारीणां सत्य सत्य हि नारद! ॥!

आता, पिता, पुत्र आदि के सौन्दरय पर मुग्ध होकर चलायमान होने की बात खटकती है अवश्य, पर सांप्रतिक काल में भी ऐसे दृष्टांतों का पूर्ण अभाव नहीं तुलसीदास के युग मे मुसब्सानों संस्कृति के प्रभाव के कारण कदाचित्‌ ऐसी घटनाएँ अधिक घटित होती रद्दी हो ओर उन्ही के आधार पर इस स्पष्टवादी भद्दात्मा ने यद् बात कही हो | सर्वोत्तम अनुमान तो यह दोगा कि यह उक्ति नीतिवाक्य के रूप में कही गई है। फलतः इससे अथवाद ही समझना चाहिए

मलुष्य आत्म-इलाघा का भूखा होता है। उसे अपने दोषों का सुनना जहर- सा लगता हैे। वह अपनी प्रशंसा सुनने मे अपार आनन्द का अनुभव करता है | इसीलिए यदि कोई इमारी प्रशंसा की उपेक्षा करके हमारे दोषों को दिखाता दे तो हम उसे अ्रजुदार कद्द बेठते दे भले ही उसने हमारे दिताथ दी इमारे उन दोषा को अनावृत्त किया हो तुलसीदास पर अनुदारता का आरोप हमारी इसी मनोदृत्ति ने कराया है परंतु तथ्य की बात तो यद्टी है कि उनकी अनुदारता में भी साधुमत एवं क्ोकमत के प्रस्थापन की उदारता निद्ठित है

जानस' में सती, सीता, कैकेयी अभ्ठति असाधारण कोटि की जो पतिनता स्त्रियाँ अस्तुत की गईं हैं उनमें भी उनकी प्रकृतिगत निब्रल॒ताएँ जिनके कारण भयावह परिणामों की सृष्टि हुई उन्हे देखते हुए यह आवश्यक था कि गोस्वामी जी स्त्री-स्वभाव की सहज श्यामता को स्पष्ट कर देते

अब आगे हम यह देखना चाहते हैं कि तुलसीदास की संत-भावना आदि प्रसंगो में चित्रित संत स्वरूप हाथी का निकला हुआ दाँत है अथवा उनके ब्यक्तिगत जीवन से भी उसका कोई संबंध है। और खुले शब्दों में कह सकते है कि तुलसीदास जो ने संतों की जो कसौटी बताई है उस पर उनके व्यक्तिगत चरित्र को कस कर हम उनकी संत प्रकृति की जॉच करना चाहते हैं। उसके लिए भ्रस्तुत परिच्छेद के आरम्भ में दिए संतो के छत्ण और 'तुद्सी परिचय” परिच्छेद में अंकित गोस्वामी जी की चारिन्रिक विशेषताओं को इष्टि में रख कर तुलना करनी होगी !

(१ ) 'हितोपदेष' मित्रलाम कथा श्लोक १६५

तुलसी की संत-भांवनां ६१ संत ओर तुलमीदास की तुलना

संत-प्रकृति की प्रमुख विशेषता है--सरलता, कोमलता और विनन्नता; गोस्वामी जी की प्रकृति में हन तीनो गुणों की पूण प्रतिष्ठा थी। संतज्न विश्व- कल्याण के लिए. अ्रवती्ण होते दे; गोस्वामी जी का श्रात्िर्भांव भी ससार के हित के लिए हुआ | संतो की वाणी अज्ञान को दूर करने वाली और तापो को शांत करने वाली होतो है, महात्मा तुलसीदाघ की वाणी में भी ऐसी ही शक्ति थो जैवा की उनकी रचनाएँ प्रमाणित करती हैं | संतजन सदाचारी होते हैं, तुलसीदास जी भी सदाचार के साज्नाव्‌ स्वरूप थे। संतलोग संसार के प्रति अनासक्त और परमाध्मसा के प्रति परमासक्त होते हैं; गोस्वामी जी को भी संसार से पूर्ण वितृष्णा और मगवान्‌ में परमासक्ति थी। संतजनों को ज्ञान, बेराग्य, भक्ति आदि का पूर्ण बोध होता है, तुलसीदास को भी इनका यथार्थ बोध था। संतजन वर्णाश्रम-धम, वेद, पुराण आदि में पूर्ण आस्था रखते है; तुलसीदास भा धर्मपरायण और वेद-शास्त्र- सेवी थे कुमार्ग एवं अधम का मुलोच्छेद करना तथा सन्‍्मा्ग एवं धर्म की रझ्चा करना संतो का बाना है; गौस्वामी जी भी कुमा्ग और अधम को ध्वस्त करके सनन्‍्माग और धर्म की नीव को अचल करने वाले थे संतज्न षड्विकारों के खद्टय नहीं होते; तुलसी- दास में भी अहंकार आदि के चिह्न ल्ेशमात्र नहीं मिलते, वे दृन्‍य के साकार प्रतीक थे। संतजन सरुपम्त में भी परद्रोह नहीं करते; गोस्वामी जी में भी यहीं बात थी तभी तो उन्हों ने परद्रोह की घोर कुत्सा की है | संतो की सहिष्णुता भी सराहनीय होती है, वे खल्ो के वचन-विशिख से शछ्लुब्ध नही होते; तुखसी- दास की सहिष्णुता भी उच्च कोटि की थी। संतों को, अनासक्त भाव से निष्कास कर्मों का सतत सम्पादन करते-करते वेराग्य इढ़ हो जाने पर, वास्त- विक तत्त्व-बोच के काश्य संसार पश्मात्मा का ही विस्तृत रूप दिखाई पढ़ने लगता है; गोस्वामी जी को भी यह तत्व प्रतिभासित हो चुका था इसी से उन्हों ने---

"सीय राम मय सब जग जानी करडं प्रनाम जोरि जुग पानो ॥”? है ०५ 7५

में सेवक सचराचर रूप स्वामी भगबत ।' आदि की घोषणा की दे गोस्वामो जी के द्वारा निर्दिष्ट संत-लक्षण और उनके व्यक्तिगत चरित की इस संक्तिप्त तुलना के उपरांत दम इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि तुलसीदास

' ६२ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

से संत थे। उन्हो ने संतों के जो लक्षण व्यक्त किए हैं वे शास्त्रीय होते हुए भी उनके व्यक्तिगत साधुचरित के प्रतिबिंब मात्र हैं

संत-प्रकृति ओर नवधा भक्ति

संत-मकृनि को ध्यान में रखते हुए विचारणीय है कि उसमें और गोस्वा- मी जी के द्वारा निरूपित नवघा भक्ति में क्या संबंध है। उस संबंध विशेष को समभकने के पूव प्रस्तुत प्रसंग में निरूपिणीय नवधा भक्ति का यह संकेत देखिये--

“तुलसी-भनित सबरी प्रनति, रघुबर प्रकृति करुना मई।'

गावव, सुनत, समुकत भगति हिय होय प्रश्चु पद नित नई ।॥”

अस्तु, प्रश्चु के पद में नित्य नूतन प्रेम उत्पन्न करने वात्ती नवधा भक्ति के सभी नेद द्ृष्ट्य हैं। संत-सत्संग नवधा भक्ति का प्रथम प्रकार है और दूसरा है भगवान्‌ की कथा वार्टा में अनुरक्त होना; गुरु के चरणों की सेवा करना तृतीय भेद है और चौथा है निष्कपट भाव से भगवान्‌ का शुणानुवाद करना; पाँचवें सेद के अन्तर्गत परमात्मा में दृढ़ विश्वास रखने के साथ मंत्र, जपादि के भलुष्ठान आते हैं और छूटे भेद में झ्राचार, शीज, साधु-धर्मांचरण, इन्द्रिय- निग्रह और उत्तरोत्त वैराग्य की पुष्टि सन्नि दृत हैं; सातवें भेदानुसार समत्य की दृष्टि मिल जाती है, समस्त संसार अभुमय दिखाई देने त्गता है और साधु संत भगवान्‌ से भी बढकर प्रतीत होने रूगते हैं; आठवं भेद की विशेषता है कि भक्त स्वप्त में भी पर-छिद्धान्वेषण नहीं करता और जो कुछ भी उसे मिल जाता है उसी में परितृष्ट रहता है; अन्तिम प्रकार की नवधा भक्ति है मदुल प्रकृति का होना, सब के साथ निष्कूपट ध्यवहार करना, अपने हृदय में एकमात्र भगवान्‌ का अनत्य॑ भरोसा रखना और हप-विषाद आदि हंढों से शुम्य हो जाना .

नवधा भक्ति के इन भेदों से स्पष्टलया प्रकट होता है कि उनमें से कई भेद तो सदाचार-प्रतिष्ठा और वर्याभ्रम घम-पालन का हो संकेत करते हैं। हम जिस किसी वर्णाश्रम के हों उसके शास्त्र-विहित कर्मों को निष्काम भाव से करते चर ओर उत्तरोचर अपनी प्रकृति को संत-प्रकृति के सौँचे में ढांतते रहें हक करते-करते अ्रन्ततोगत्वा हमें भी सुनि और योगियों के पद की प्राप्ति |

|

) गीतावली' अरण्य० गीत १७ (८) ( ९३ ) मानस” अरण्य० पु० ३२०

आधा, अधिक "पार ७०५५ 4१५७ ५ऑ ७७७७४ ७५७५५७३ ३३५७ ९७७५+ कक... 2 की वश ७भ

तुलसी की संत-भावना ६३

संत-प्रकृति तथा नवधा भक्ति के अम्तगत जो विशेषताएं दिखाई गई हैं यदि उनका परस्पर मिल्लान किया जाय तो स्पष्टतया प्रकट होगा कि जिसकी संत प्रकृति हें अर्थात जो संत है उसमें नवधा भक्ति के एक ही नहीं अपितु सभी प्रकार अनायाल द्वी जगमगाते हैं। भरत सदश एक संत चरित्र के द्वारा भी इस कथन की पुष्टि की जा सकती है। वन-गमन के समय मांग में जितने भा साधु-महात्माओं या भक्तों से उनका मिलन हुआ, अयोध्या के जितने भी ब्राह्मण, गुरु, मंत्री, सज्जन आदि उनके सम्पक में आये सभी का सत्संग उन्दरोंने पूर्ण निष्ठाके साथ किया उन्होने सतो के लक्चण' एवं माहात्म्य जानने की उत्कट जिज्ञासा प्रकट करके उसका समाधान श्रीस्ुश्न से कराया--इन सभी प्रसंगो से उनकी संत-संग की प्रथम भक्ति प्रकट होती है। राम-कथा में उनकी प्रीति अटल है, वे प्रत्येक च्षण उसे सुनने के लिए उत्कंठित रहते हैं, इनुमान से मिलने पर उनकी अग्रत्युपकाय कृतज्ञता प्रकट करते हुए वे कहते हैं--- “जाहिन तात ढरिन मे तोददी अब प्रश्नु चरित सुनावहु मोही' ॥” यह कथन भी उनकी भगवत्कथा विषयिणी प्रीति का ही परिचायक है | उनकी गुरु-सेवा के पक्के अमाय स्वरूप यह देखिए---- “तेद्िते कददर्ड बदोरि बहोरी भरत भगति बस भई मति भोरी' ॥” ( 4 'गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम हृदय आनन्द बिसेखी' ॥/ नवधा भक्ति के चोथे भेद अर्थात्‌ नाम जप या कीतन झादि में तो वे अहनिश रमते हो थे पॉचवें ओर छुठे भेद की बातें श्रथाँव्‌ मंत्र, जप, शील, झाचार, धर्माचरण, इन्द्रिय-निग्नह नथा वैराग्य वृत्तियों का उत्तरोत्त विकास झादि सभी उनमें विद्यमान थे जैसा कि निम्नांकित उद्धरणों से अवगत दोता हें-- धघुनि त्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाही' ॥! 9९ न्‍

(१) वही उ० ४६०.०-४६१. (२) वही », . ै«०१४

(३) वहीं अयो० २५४६.५ (४) वहीं , २४७१

(७ ) मानस” अयो० ३२४१६ उ० १, (६)व्ही +॥ रेरेड४

६४ सत तुलसीदास ओर उनके संदेश

“सम दम संजस नियम दपासा | सखत भरत द्िय विमल अकासा' ॥” ५८ )< ५८ पहिय सम्रेम सुमिरहु सब भरतहि निज गुन सील राम बस करतहि' ।” ५८ २८ ५८ लो होत जग जनम भरत को सकल धरम घुरि धरनि घरत फो'। ५६ >< ५८ 'रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़ भागा ॥* हक ०५ भरत रहनि समुकनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूति॥' सातवें, आठवे ओर नवें भेद की विशेषताएं भी उनमें थीं। वे समत्व की भावना को प्राप्त कर स्वाथ और परमार्थ दोनों की व्यापक सीमा के झागे बढ़ चुके थे; वे स्वप्न में भी पर-दोषों पर दृष्टि डालने वाले नहीं थे; उनके हृदय से ढुंडों का नितान्ताभाव हो गया था तभी तो उन्हों ने स्वयं कद्दा है-- नाथ मोहि संदेह कछु सपनेहु सोक मोह केवल कृपा तुम्हारि ही ऋपानंद संदोह'॥म इस प्रकार हम देखते हैं कि साधु भरत में नवधा भक्ति के सभी भेद वतमान थे। बात यह दे कि जिस व्यक्ति में उक्त नवधा भक्ति होगी वह संत-प्रकृति का होगा और झवश्य होगा | गोत्वामी जी ने संत प्रकृति और नवधा भक्ति में निकटतम पूवं अन्‍्योन्याश्रय संबंध ठहराया है। संतप्रकृति वालो के ल्षिए यह भक्ति सुगम है क्योंकि--- ज्जो जेहि कला कुसल वाकहूँ सो झुलभ सदा सुखकारी की वात पक्की है, इसके विपरीत जो लोग संतप्रकृति के नहीं हैं उन्हीं के लिए-- “रघुपति भगति करत कठिनाई” का संकेत समझना चाहिए

( 4 ) वही 98 २२२३.४ (२) वही ,, २६१३.८ ( $ ) वही ॥३ २१.१ (४ / वही 9. ्नरै-थ ( 4 ) वही 99 ३२३,७ (६)वी » २८७,७ (७)वही 3० ३६,

तुलसी की संत-भावना ६५

अन्त में, ज्ञानी मुनि! सुतीतद्ण ओर 'अधम जाति जोपित जड' शबरी सदश दो भक्त पात्रों की भक्ति का उत्त्ष दिखा कर प्रस्तुत प्रकरण की इति की जायगी |

शवरी ओर सुतीक्षण

सुतीचण परम सत हैं; फत्नतः अविरल भक्ति, विरति, विशान और सकल गुण-ज्ञान-निधान हैं” | भक्ति-बुदधि की परिशुद्धि अथ च॒ प्रेससक्ति का आहुर्भाव तथा परिमाण सांसारिक प्रेमवत्‌ लक्षणों से ही जाना जा सकता है अर्थात्‌, जसे अनुभाव, रोमाश्च, अश्रुपातादिक से द्ोकिक रसो के उद्बेक का अनुमान तथा ल्ब्बण मनुध्यो में प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार भगवर्मेम रूपा भक्ति के प्रादुभाव का अनुमान ईश्वर के कीतनादि में भक्त के रोमाश्च, प्रलाप, अश्र- पात, लय आदि सार्विक अनुभावो के चिह्लो ले किया ज्ञाता है और उन्ही से प्रतीत दो जाता है कि भक्तके प्रेम की गदराई कितनी हैं। सुतीक्ष्ण की भक्ति का अनुभान निश्नांकित पंक्तियों से कीजिए-- “निभेर प्रेम मगन मुनि ग्यानी | कहि जाइ सो दसा भवानी दिसि अरु विदिसि पंथ नहिं सूका को में चल्ले्ड कह्दों नहि बूका कबहुँक फिर पाछे पुनि जाई | कबहूँक नृत्य करइ गुन गाई॥ अविरल प्रेम भगति मुनि पाई , प्रभु देखहि तरु ओट लुकाई अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा | प्रगदे हृदय हरन भव भीरा' ॥” इस अतिसय प्रीति का इतना तीज प्रभाव हुआ कि आत्म विस्मृति हो गईं--

“मुनि संग मॉक अचल होइ वेसा पुत्रक सरीर पनस फल जैसा' ॥” “'ुनिर्दि राम बहु भांति जगावा | जाग ध्यान जनित सुख पावा" |” है (

ऊपर के अ्रवतरणों से स्पष्ट है कि सुतीत्ण की भक्ति उनके अविरत रास- प्रेम की परिचायिका है। यद्यपि वे राम को विरज्ञ, व्यापक, सब के हृदयों

(१ ) मानस” अरण्य० १०. २६ (२ ) 'शाडिल्य सूत्र! || ४३॥ “तलरिशुद्धिश्व लोकवल्लिड्रेम्यः' ( ) 'मानस' अरण्य० ६. १००१४ (४) वह्दी 9५ 8६« १५. (५ ) वही 99 ९७

६६ संत तुलसीदास ओर उत्तके संदेश

सें निरंतर वास करने वाक़े व्रह्म के रूप में जानते हैं तथापि उनके नराकार सगुण रूप का ही चिंतन फरते हैं'। अब राम ने इस प्रेमा भक्ति से परम प्रसक्ष होकर मुनि को वरदान देना चाहा उस समय भी सुनि ने नरवेश धारी सगुण राम की ही भक्ति मॉगी-- अनुज जानकी सहित प्रभ्न॒ चाप बान धर राम | मम हिय गगन इंठु इब बसहु सदा निहकास ||

और, इन कोसलपति, राजीव नयन राम के अतिरिक्त वे अपने हृदय में किसी अन्य को स्थान देने वाले नहीं-- 'अस अभिमान जाय जनि भोरे। में सेवक रघुपति पति मेरे ।॥!

सुतीद्णय के इन जिचारों से पेसा छगता दे कि मानों तुलसीदास ने अपसे निज्जी विचार ध्यक्त किए हैं। ऐसी कल्पना करके हम यह भी कह सकते हैं कि दोनों ही परम संत हैं अतः साम्य का होना स्थामाविक ही दे उनमें प्रकृतितः भक्ति के सभी प्रकार अवगत होते हैं।

परम संत सुतीद्ण की बात छोड अब दूसरी ओर आहए। शाटों ौर स्त्रियों की आध्यात्मिक उन्नति के द्वार पर अग॒ंक्ा क्षगा कर वेदो ने उन्हें साधना-क्षेत्र से घबन्मित कर दिया था परंतु पुराणों ने उस द्वार को उन्मुक्त किया और श्वृद्र तथा नारी दोनों ही भक्ति के अधिकारी घोषित किए गए। तुलसीदास सभी प्रकार के अधिकारियों की भक्ति-सावना का निदुशन उप- स्थित करना चाहते थे। फल्वतः उन्हों ने निम्नवर्ण एवं नारी जाति की भक्ति- भावना का आदर्श भी दिखाया है। इसी से निषाद और शबरी की भक्ति का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है

भगवद्धक्ति में खबलीन प्राणी सामाजिक व्यवस्था की तुला पर नहीं तोला जाता | अर्थात जिसने अपने आपको भगवच्चरणारविंद में सवंथा अर्पित कर दिया है वह अपने वर्ण में सब-सम्मति से अपवाद स्वरूप समझा जाता है यथा, झुद्ववर्ण का कोई चाडाल है जो अपने कर्मा में प्रवृस्त रहते हुए निरन्तर भगवध्पेम में निमभ रहते-रहते अन्त में भगव्ठ्योेम का प्रतीक ही बन जाता है। इस दशा में वह सक्त अपने वर्ण को पुनीत करता हुआ स्वयं चांडाल कुल में अपवाद स्वरूप ही माना जायगा समाज उसे परमोत्कृष्ट ही स्वीकृत करेगा

( ) मानस अरण्य० १०. १७, १८ (२) वही 99 2१, (३१)वही +»५ १९०० २१

दे संत तुलसीदास और उनके-संदेश

“हिसांरत निषाद तामस वपु पु समान बन चारी। भटयों हृदय लगाइ प्रेम बस नहि कुल जाति बिचारी' ॥” शबरी की भक्ति की चर्चा करते समय सर्व श्रथम हमारा ध्यान इस ओर जाता हे कि शवरी की भक्ति में सुतीषण की भक्ति सी गहराई नहीं राम के प्रेम मे वह इंबी है अवश्य, पर उसकी तनन्‍्मयता इतनी नहीं बढ गई है कि राम के समीप आने पर भी उसे खत्रर हो वह तो सामान्य प्राणियों की भाँति राम की प्रतीक्षा में उत्कंठित हो करं---

“छन भवन,छुंन बाहर विछोकति पथ अर पर पानि के राम के सत्कार के द्षिये किए गए इस सामान्य उपक्रम से उसका सहज स्नेह छुलंकता है--- दोना रुचिरे॑ं रचे पूरन कंद-सूल-फल-फूल | अनुपम अमियहूँ ते अंबक अवलोकत अनुकूल ।॥ अनुकूल अंबक अंब ज्यो निज डिस हित सब आनि के | संदर सनेह सुधा सहज जनु सरस राखे सानि कै ||” अन्त सें, भेम के वशवर्ती राम सहानुज उसके समत्त लोचन-गोचर होते हैं। उन्हें देखते ही उसने अपने को भगवच्चरणों में अपिंत कर दिया--- 'घबरी परी चरन लपटाई' ग्रेमातिरेक वश मुक-सी होकर बारम्बार नमन करने लगी तदुपरांत चरण धोकर उन्हे सुंदंर आसन पर बिठा कर-- कंद मूल फल घुरस अति, दिये राम कहूँ आनि। प्रंम सहित प्रश्नु खाये, बारम्बार बखानि'॥?” भगवान्‌ केवल बखान कर ही नहीं खाए अपितु और भी माँग-माँग करे खाए. “'ध्रम्नुं खात मागत, देति सबरी राम भोगी ज्ञाग के' |” यह रश्य देख“ सिव,सिद्ध-सनकादि' भी उसके भाग्य कौ सराहना किये बिना (१ ) विनय०” पद १६ (१) विनय० पद १६६... ( ) 'गीतावली' अरण्य० गीत १७ [३ ] ( रे ) वही .। है 9९ 99

(४ )'मानस! ,, हे रे:वर (५.)वही ; ३.६ (९)वही ,, ३४,

(७) गीतावली! ,, गीत १७ [६]

तुलसी की संत-भावनां ६६

रह सके यदि कोई संदेह करे कि राम को शत्ररी का कंद मुल-फल इतना क्यों भाया तो तुलसीदास उसका समाधान यों करते हैं-- “बालक सुमित्रा कौसिला के पाहुने फछ साग के। सुनि समुक्ति तुलसी' जानु रामहि बस अमल अनुराग के ॥” इसी अमल अलुराग' से ही मुच्धि भी हस्तगत होती है। तमी तो वह- “अति प्रीति मानस राखि रामहि, राम धामहि सो गई तेहि मातु ज्यों रघुनाथ अपने हाथ जल अंजलि दई ॥” तुलसीदास की रचनाओं में शबरी का जो चित्रण मिलता है उसके झाधार पर यह निणय करना कठिन है कि रास ने नवधा भक्ति के जिनसेढ़ो को उसे समझ्षाया वे सत्र उसमें विद्यमान थे या नहीं; पर राम की इस उक्ति--- 'नवमहूँ एकड जिन्ह के दोई। नारि पुरुष सचराचर कोई सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे सकल प्रकार भगति हृढ़ तोरे ॥” से स्पष्ट है कि उसमें नवधा भक्ति थी | भले ही वह अधम जाति की स्त्री थी; परंतु उसकी प्रीति सच्ची और उच्च कोटि की थी, इसी से भगवान ने बिना किसी भेदभाव के उसका उद्धार किया” अधम जाति जोषित जड़ लोक बेद तें न्यारी। ज्ञानि प्रीति दे दुरस कृपानिधि सोउ रघुनाथ उधारी' ॥”

(१ ) गीतावली' अरण्य० गीत १७ [ | (२)बहों + » ४ॉ१७[८] डे ) “मानस! $) 939 ३४. ९, (४) विनय०” पद १६६

तुलसी का प्रभाव

मानस की र्याति ओर उसका उदातत स्वरूप

पिछले दो परिच्छेदों में यथा संभव अंतः साक्षयों का आश्रय अहण करके हमने गोस्वामी जी के व्यक्तित्व को अनावृत्त करने का किब्वित्‌ प्रयास किया आर अब अस्तुत प्रकरण में उनके प्रभाव की विविध दिशाओं के संकेत द्वारा उनकी महत्ता का अनुमान करें गे 'रामचरित मानस! की अपरिमित ख्याति तथा उसके परमोदात्त स्वरूप के कारण तुलसीदास के प्रभाव की जो दिव्य उ्योति प्रस्फुटित हुईं वह व्णनातीत है। भारतीय द्वी नहीं, भ्रपितु भ्रन्यांग्य देशीय विद्वलनों की दृष्टि में भी अत्युद्ध आसन भहण करने का अधिकारी गोस्वामी जी से बढ़कर अन्य कोई महांकवि था भक्त हिन्दी-साहित्य में नहीं दृष्टगत होता। “मानस” के प्रताप से थे असंख्य मानसो में प्रविष्ठ हो गए और जाने कितनों में प्रवेश कर रहे है। 'मानस' की सुकीति के विषय में ग्रियलंन का यही वाक्य अक्तरशः सत्य है--““इसकी सुख्यांति साथक होने में तनिक भी सदेह नहीं! अपने देश में हसने सब प्रन्थों पर प्राधाग्य ज्ञास किया है और सब-साधारण पर इसका ऐसा प्रभाव पढ़ रहा है कि उसे बढ़ा-चढ़ा कर कहना कठिन काय है! |” इसो प्रकार का एक दूसरा वाक्य भी उद्धरणीय १---विल्ायत सें जितना बाइबिल का अ्रचार है उससे कहीं अधिक बंगाक और पंजाब एवं दिमात्रय ओर विन्ध्या के मध्यस्थ प्रदेशों में इस महान प्रंथ का प्रचार है |?” रामायण के प्रसिद्ध अंग्रेज़ अनुवादक भराउस साहब का निन्नांकित कथन भी 'मानस' की विश्रुत्ि एवं उसके भति-भब्य स्वरूप का समर्थन कर रदा है--“रामायय केवल हिन्दुओं का राष्ट्रीय प्राचीन काव्य ही नहीं है किल्तु उसमें यह विशेष गुण भी है कि वह अपने देश-वालियों के विश्वास तथा चरित्र का चित्र अत्यन्त सत्यता पूवक चिंत्ताकर्षक रूप में खींचता है इसका फल्न यह दोता है कि उसके अनुशीक्षन से योरप-वासियों के बहुत

से मिथ्या विश्वास और दुांव जो इस संबंध में हैं दूर हो जाते हैं और दोनो

( ) “जनेल आव रायल एशियाटिक सोसाइटी” १६०३ प्रृ० ४५१ (२) व्द्दी १) $$

तुलसी का प्रभाव ७१

जातियों में परस्पर समानुभृति की वृद्धि होती है! ।” रामायण में वर्णित पात्नो से प्रभावित होकर प्राउस साहब यह भी लिखते हैं--''कोई व्यक्ति राम, सीसा, भरत तथा लच्तमण के संदगुणों पर मुग्ध होकर इन लोगो की पूजा चाहे करे, किन्तु इनके सदगुणों की लराइना सभी करेंगे। हम कहते हैं कि इन्हें कोई ईश्वरावतार या ईश्वरांश माने या माने परंतु अपने अल्नोकिक भव्य गुणों से ये लोग अवश्य ईश्वरत्व और देवत्व को आप हैं और सब पुज्य है | हिन्दू-समाज में चिर काल से घर-घर में इनको पूजा होती आईं हे और अवश्य होनी चाहिए इन्हीं लोगो पर श्रद्धा-भक्ति रखने, इन्हीं की पूजा करने, इन्हीं महापुरुषों के सुकायों से सित्चा-ग्रहणथ तथा उनका झनुकरण करने से मनुष्य का उभय दछोक में कल्याण हो सकता हैं ।??

हमारे स्व० कवि सम्नाद्‌ 'इरि औध' ने मानस! के प्रचार भोर अत्युदात्तरव का संकेत करते हुए कद्दा है--“ऐसा अंथ जो हिन्दू जाति का जीवन स्वस्थ, उन्नयक और कल्पतरु है जो आदर्श चरित का भंडार और सद्भाव-रत्रों को रत्ागार है, जो आज दूस करोड से भी अधिक दिन्दुओ का सत्पथ प्रदर्शक है, यदि है तो 'रामचरित मानस” है, और वह गोस्वामी जी के महात्र तप का फ्ल ह्वैर !!१

स्‍्व० रामदास गांड ने 'मानस' को चारों पदार्थों का साधन माना है। देखिए--“इस विचितन्र अथ के सद्दारे वणमाला सीखने के लाभ से लेकर भुक्ति झोर सुक्ति तक लोग कमा लेते हैं। सचमुच 'मानस' कहीं तो प्रकाशकों या रोजगारियों को श्र दे रहा है तो कहीं घर्म-पाणयों को वर्म सिखा रहा है, काव्य-ममंजश्ञो को लोकोत्तर आनन्द दे रहा है और सुमुक्षुओं को मक्ति-मांग से ज्ञान ओर तदुपरांत मोक्ष तक भी पहुँचा रद्दा है | ऐसे विरत्ेद्दी अन्य होते हैं जो चारों पदार्थ देने वाले हैं ।””

श्रीमेथिली शरण गुप्त मानस” को कोन-सा पद देते हैं, हृतना और देख लीजिए--“कहने को तो हम बेद-शालों का नाम जेते हैं, परंतु सच्ची बात यह दे कि आज 'रामचरित मानस” ही हमारा धम्म-अन्यथ दे। में समझता हूँ उसे यह पद देकर हमने कुछ नही खोया, उल्टा सब कुछ एक साथ ही पा

(१ )दे० आ्राउसः“रामायन आव ठुलसीदास” की भूमिका (२ ) दे० 'रामायन आव तुलसीदास” की भूमिका

(३ ) 'सदम सर्वस्व' ६० १४५

(४ ) रामदास गोड़ः “मानस की भूमिका” (ूर्वा खंड ११ १०६

७रे संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

लिया है। तुलसी ने लोक और वेद से जो कुछ भिज्षाटन करके पाया, सब अपने प्रभु को समर्पण कर दिया। उस भोग का प्रसाद जिसने पाया उसका भी लोक परत्नोक बन गया “|”

जिज्ञास्प है कि मानस! की कीर्ति के आधारभूत कारण क्या है? मानस! की ख्याति के सर्वप्रमुख कारण हैं--सुलली के राम अपनी विश्वव्यापिनी झन्तदृंध्टि के बल पर गोस्वामी जी ने राम के अति ध्यापक एवं सूदमाति सूच्तम स्वरूप का स्वयं साक्षात्कार कर चुकने के उपरांत ऐसा सावभौमिक निर्देश किया कि सभी लोग उसे अपनी-अपनी रुचि के अनुकुक्ष पाकर स्वभावतः उसकी झोर आक्ृष्ट हों | निस्संदेद तुलसी के पूव भी बहुत से संतों ने राम का स्वरूप दिखाने का प्रयास किया था, पर उन महात्माओं ने राम को सोमित-सा कर स्षिया था, इसी से उन्हों ने राम को केवल अध्यक्त, पराप्पर श्रह्म का ही प्रतीक मात्रा निगु णियों के राम का यही रहस्य है। तुलसी ने गंभीर भ्राध्यात्मिक इृष्टि से राम को अव्यक्त परात्पर ब्रह्म तो माना ही दे साथ ही साज्षात्‌ मानव दाशरथि राम रूप में सी अद्ण किया है। श्रह्म के सगुय और निगु दोनों रूपों को अमेद माना है भेद सान कर चलने वालो को नि ठहराया है

दोनों स्वरूपों को अभिन्न मानने के परिणाम स्वरूप यदि गूढ अध्यात्म तरवो के पारदर्शी सुद्दी भर ज्ञानी जनो के उरो में राम ब्रह्म सच्िदानन्द रूप से चिंतन के विषय हैं तो अधिकांश जन-सामान्य के हृदय में अचतीण राम के रूप में झचिंत हैं। इस प्रकार तुलसी के राम में सगुण और निगुशण दोनों प्रकार की भावनाएँ परितुष्ट हो जाती हैं। एतदथ दोनों प्रकार की भावना वाले रामोस्मुख होने के क्षिए 'मानस' को उत्कृष्ट साधन समझ उसी के सहारे अपने दुष्ट को प्राप्त करना चाइते हैं। 'माचस' राम के सम्मुख ले जाने का अचूक साधन है--«

जे एहि कथदिं सनेह समेता | कहिहृदि सुनद्दि समुझति सचेता | होइह॒दि राम चरन अनुरागी | कलि मत्न रहित सुमंगल भागी ॥” विभिन्‍न दाशंनिक इष्टि कोणों का समन्वय भी “सानस' की ख्याति का दूसरा कारण है। यह ऐसे ही समन्वयवाद का परिणाम दै कि अद्ठेत, विशिष्टा-

(१ ) कल्याण मानसाडू १० १०६०

(२ ) मानस बा० ११५४, सगुनहि अगुनहिं नहीं कछु भेदा ।! (३) व्दही , ६६१४-रैचचछ

(४ ) मानस वा० १४. ६०, ११

तुलसी की संत-भावना ७३

देत, दत आदि सभी सिद्धान्तानुयायियों के बीच 'मानस” की कीर्ति की मधुर स्वर-लट्टरी गूंजती हुईं कर्णगोचर होती है | इसमें निर्दिष्ट साम्प्रदायिकता इतनी व्यापक और सावशौमिक है कि इसमें सभी सम्प्रदाय वाह्तो को अपने- अपने सम्प्रदाय के सत्य मूल तत्त्व की प्रतिष्ठा मिलती है। फलतः यह अधि- कांश सम्प्रदायों में आदत है | शेव और वेष्णव दोनो ही भक्तिपूर्चक इसका पारायण करते हैं। यह बहुतो की दृष्टि में इसलिये भी सम्मानित है कि इसमें प्राचीन भारतीय हिन्दू-संस्कृति, परंपरागत चियम, विश्वास, कि बहुना ससस्त भारतीयता के उद्चाद्शों के अध्ययन की सामग्री भी है। लोक भाषा में होने के कारण भी इसकी ख्याति हुईं है। गोस्वामी जी अधिक से अधिक पाठकों को लाम पहुँचाना चाहते थे और चाहते थे जगत का उपकार करना | यही कारण है कि अच्छे संस्कृतज्ञ होने पर भी उन्हों ने 'मानस' का प्रणयन लोक- भाषा में ही किया इसी अभिप्राय से महात्मा छथर और टिंडेल आदि ने भी अपने देशवासियों के लिये, 'बाइबिल' और ल्‍न्‍*न्युटेस्टामें”' की रचना देश भाषा में ही की थी मिल्टन जैसे महान्‌ लेटिन-ज्ञाता कवि ने भी अधिकांश लोगो के हिताथ ही भ्रपन्नी रचनाएं प्रचलित देश भाषा में ही की भाषा ही नहीं; भाषा को काव्य के अग्रतिम सांचे में ढल्ली रहने के कारण भी मानस की ख्याति बहुत बढ़ी है। इसे बडे-बडे सहृदयो ने सूक्रम से सूचम काव्य की कप्तोटो पर कस चुकने पर अद्वितीय स्वीकार किया है। तुलसीदास के महान व्यक्तित्व से भी “मानस की कीर्ति का विस्तार हुआ है। मानस के उदात्त स्वरूप की चर्चा भी दो चार वाक्यों मे इसी सिलसिल्लेमें दो जानी चाहिए। सानसकी ख्याति ओर उसके स्वरूप की अतिभध्यतासें बडा दी घ.नेष्ठ संत्रंध है वस्तुतः इसने जो लोकोत्तर ख्याति पाई है उसके मूल्त में इसके उद्ात्त स्वरूप का ही श्रेय है| यह उदात्तता एकाक़ी होकर सर्वागीण है। क्या नायक, कया विषय, क्या भाव, क्या चरित्रांकन,क्या चित्रित वातावरण किसी दृष्टि से विचार करने पर सवन्न भव्यता ही भ्रब्यता इष्टिगत होती है ग्रथ की इस चतुर्दिक उदाचताकों देख हम कह सकते हैं कि जिस दिन संसार मानवता का पूणस्वरूप समझ लेगा उसी दिन से 'मानस' अपने उदात्त स्वरूप के कारण विश्वमात्र का अनूठा आदुश पथ-परद्शक रूप में स्वीकृत हो जाए तो कोई शआाश्चय नहीं। मानस के उदात्त स्वरूपके विषयमें इसके प्रणेताने स्वयं कहा है- “संबुक भेक सिवार समाना इह्दों विषय कथा रस नाना | __ तैद्दि कारन आवत हिय हारे कामी काक बलाक बिचारे। ॥” _ . मानस! बा० ३७, ४.४... हः.ए २७०

७४ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

सारा अंथ ढूंढ डालिए, कोह ऐसा प्रसंग नही मिल्लेगा जो इसके उदात्त स्वरूप के प्रतिकृल्षन हो ऐसी अतिभव्यता के कारण यह भारतीय होने पर भी सा्वज्लौकिक और खब-घम-समनन्‍्वयकारी कट्दा जा सकता है|

समकालीन समाज पर प्रभाव

तुलसीदासका सामयिक वातावरण नाना प्रकारके मत-मतान्तरो के चक्रब्यूह से घिरा पडा था। प्राचीन सनातन धम का अम्युद्य ही नहीं रुका था अपितु वह नाना प्रकार के कुढाराघातों से हवास को प्राप्त हो रहा था | ऐसे ही समय में उस व्यूद के सेदनाथ मानो गोस्वामी जी ने 'मानस' रूप अह्माद्ध का निर्माण किया अब आइए विचार करें कि उनका समकालीन समाज उनके तेज-पुज से कहाँ तक प्रभावित हुआ

प्रस्तुत ग्रथ के तुलसी-परिचय' परिस्छ्ेद में अंतःसाथयों के द्वारा अ्तिपा- दित किया जा चुका हे कि तुलसीदास की प्रतिष्ठा उनके जीवन काल में ही बहुत बढ गईं थी इस सम्मान-बृद्धि ले उनकी प्रभावशीलता के अतिरिक्त झौर कथा प्रकट होता है। बाबा जी का समकालीन समाज उनसे प्रभावित डुआ इसका एक प्रमाण यह भी दै कि शैवों और वैष्णवो का साम्प्रदायिक संघर्ष पूर्ण रूप से नही तो अंशत: ठंढा ही पद गया। शैवों में अग्रगण्य मधुसूदन “सरस्वती ने जिन शब्दोंमें तुलली की प्रशंसा की, वह देखने योग्य है-

“आनन्द कानने ह्मस्मिन तुलसी जंगमस्तरुः कविता मझरी यस्य रास-अमर भूषिताः॥?

उत्कट शेव के मुख से ऐसी प्रशंसा सुन कर क्ष्या यह नहीं कद्टा ज्ञा सकता कि अपने समकालीन विचारशीछ शेदों के हृदय में भी गोस्वामी जी ने स्थान पा लिया था|

गोस्वामी जी के लिए अपना सम्मान प्रकट करने के निमित्त नाभादास जी ने जो छुप्पप रचा है उसकी पहली ही पंक्ति “कल्तनि कुटिल्न जीव निस्तार ददेत बाल्मीकि तुलसी भयो उनकी उज्ज्वल कीर्ति और प्रताप साथ ही प्रभाव भी सूचित करती है। वस्तुतः अपने सम सामयिक समाज पर उनका प्रभाव

तुलसी के सामयिक हासोन्मुख समाज का चित्र देखना चाहे तो “तुलसीदास

ओर उनका युग” के 'तुलसीकी समकालीन परिस्थितियां? शीषेक परिच्छेद पढ़ें दे० 'मक्तमाल' छुपय १२६

तुलसी की संत-भावना है

इतना अवश्य बढ गया था कि लोगो ने उन्हें बाल्मीकि के अवतार के रूप में स्वीकृत कर लिया था | यह बात अंतःसाक्ष्य से भी प्रमाणित की जा चुकी ह। जिनके हृदय में रामसन्ति का मधुर स्लोत प्रवाहित होता रहा अपने उन सभी सम-सामयिक व्यक्तियों पर तुलसीदास का अभाव अवश्यमेव पडा, कदाचित्‌ इस ओर संकेत करने की आवश्यकता नहीं

तुलसीदास का समकालीन समाज प्राचीन सनातन परंपराओं को भग कर पतन की ओर बढा जा रहा था; उनके सम-सामयिक नाम सात्र के ज्ञानी प्रचारकक्क और सुधारक लोग प्राच्य सिद्धान्तो पर कुठाराधात करके स्वनिर्मित पंथों का पाठ पढा रहे थे; उनकी सामयिक कतिपय उपासना पद्धतियाँ अन- घिकारी साधकों के प्रमादवश अ्रनाचारमय हो गई थी; उनके युग का शासक वर्ग प्रजा का शोषण करता और उसे दंड के शिकंजे में जकडे था--तुलसीदास ने एक ओर इन सभी दानवीय ल्लीछाओं की कड्डी आलोचना की और दूसरी ओर उन सत्र के दिताथ उनके समझ भव्य आदुश उपस्थित किए अस्तु, यह नहीं कहा जा सकता कि वे सत्र गोस्वामी जी के प्रभाव से भद्धूते रहे |

इतिहास के अनुशीरून से पता चलता है कि तुललीदास के युग के पहले जहाँ यवनों के शासन-काल में संस्कृत-नाटकों के अभिनयादि का प्राय” लोप-सा हो गया था, वहाँ रास-लीला पराधीन हिन्दुओ का जैसे-तैसे मनोर॑जन करा रही थी भ्रकबर के समय में भी हिन्दुओं के बीच रास-लीला का प्रचलन भली भाँति था। गोस्वामी जी को रास लीला से संतोष हुआ और उन्हों ने राम लीला की स्थापना की। समाज ने इसे सद्ष स्वीकार कर लिया यह भी सामान्य प्रभाव नही।

रामलीला को प्रोत्साहन

'एसिक प्रकाश भक्त साल के आधार पर कट्दा जाता है कि गोस्वामी जी के पहले भी रामलीला होती थी। उस लीला के प्रवतक थे मेघा भगत | इन्हो ने भगवान के दुश्शन के लिए अनशन ब्रत किया और उनको स्वप्त में आज्ञा हुईं कि साक्तात्‌ दुशन दुलंभ है, तुमे मेरी लीला का अजुकरण करो तभी से मेघा भगत ने पहले-पहल रामलीला का सूत्रपात किया | सेघा भगत के समय की लीला इस समय काशी में चित्रकूट की लीला के नाम से प्रसिद्ध है। पही छ्ीला प्राचीन है। पर 'सानस' को गा-गा कर उसके अनुसार रामत्षीला करने की जो प्रथा हम देखते हैं उसका प्रयत्न तो तुश्नसी- दास के समय से ही भावना होगा आज भी वह गोस्वामी ज्ञी की लीला

७द संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

के नाम से विख्यात है। प्रत्येक वर्ष क्वार के मह्दीने में यह अस्सी पर हुआ करती है। तुलसीदास के समय से रामलीला का जो स्वरूप चला वह शनेः शरने: उत्तरापथ के सभी भागों में प्रचल्षित हो गया आए दिन भारत के अ्धि- कांश प्रदेशों में रामलीला किसी किसी रूप में पहुँच चुकी है। उत्तर- प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा पंजाब आदि के प्रदेशों में इसका प्रचार विशेष रूप से है। राजस्थान के मध्य रामायण और रामलीला दोनो का प्रचार नगण्य है महाराष्ट्र आदि के पांदुरंग के उपासको के बीच झभी तक रामलीला का प्रभाव नहीं पहुँच सका दे यही बात सुदूर दक्षिण के शेवों झोर वेष्णवों तथा पूरे के आसाम और उत्तर के काश्मीर प्रति स्थानों के संबंध में कही जा सकती है। अन्त में हमें यद भूलना चाहिए कि उन पांतों में जहाँ हिन्दी भाषा का प्रचार नही दे उनमें भी तुलसीकृत रामायणमें वर्णित रामलौता का प्रचार राम-लीला-संडलियो के द्वारा किसी किसी अश में पहुँच गया है। ये मंडल्तियाँ नाटकीय ढंग से रंगमंच पर रामलीला करती हैं। इन मंडल्ियों का दौरा कभी कभी राजस्थान, झासाम तथा दूरस्थ दछ्चिण में हो जाया करता है यह बात अवश्य है कि इन मंडल्ियों की संख्या बहुत अल्प होने के कारण इनके द्वारा राम-छीछा का प्रचार व्यापक रूप से नही हो पाया है।

परवर्ती समाज पर प्रभाव

गोस्वामी जी के प्रभाव-प्रभांत की कांचनाम किरणें यद्यपि उनके जीवन काल में ही प्रस्फुटित हुईं तथापि इनकी प्रखर ज्योति उनके परवर्ती समाज पर पढ़ी आज वे झपने परम रमणीय काव्य कोशत्व के सहारे 'मानस' के रूप में अमर होकर करोड़ो मनुष्यों पर अपना प्रभाव जता रहे हैं। मानस! असंख्य प्राणियों के कब्याण-साधन का अ्रद्वितीय सोपान बन रहा है| इसमें निर्दिष्ट पधावलंबन से जाने कितनों का उद्धार हो गया; जाने कितने अज्ञान तिमिरान्ध उरो में ज़्नोदय हो गया और जाने कितने गए-बीते भी सन्‍्मार्ग पर गए यह तुलसीदास का श्रभाव डी है कि कहीं रामलीलाएँ होती हैं, कहीं रामायण के पारायण होते हैं तो कहीं प्रवचनों के प्रबंध होते रहते हैं। कही छोटी-बढ़ी कत्चाओो के छात्र अपनी पाव्य पुस्तकों में 'मानस' से ग्ृहीत अंशो की तैयारी करते रहते हैं तो कहीं डी० ल्विट्‌ को परीक्षा के लिए प्रबन्ध प्रस्तुत करने वाले संशोधक विद्वान 'सानस” की थाह क्गाने की अ्रप्रत्रि- हत चेष्टा करते दें; कहीं साधु-महांत्माओं के समागम में 'मानस” को चचो होती है; कटी विहवस्मंडल्ली में हस पर ऊद्ापोह होता हैं और कही एकात

तुलसी की संत-भावना ७७

सेवी साथक इस प्रंथ का चिंतन करते हं। इस प्रकार 'मानस' के प्रभाव का क्षेत्र बहुत व्यापक है |

अपने परवर्ती समाज पर गोस्वामी जी ने जो प्रभाव छोडा उसे बठा- चटा कर कहने की अपेक्षा नहीं। यह उनके प्रभाव का ही फल्न है कि प्रत्येक वर्ष सहपष हम उनकी जयंती मनाते और स्वय कृताथ होते है। राम-भक्ति विकास के साथ ही राम-भक्तो की उत्तरोत्तर बढती संस्य्रा भी क्या तुलसीदास के प्रभाव से बची होगी ?

गोस्वामी जी ने राम-नाम का माहात्म्य सर्वोपरि बताया है। नाम को ही समस्त यज्ञों, महायज्ञों का उपादान ठहराया है। उनके परवर्ती समाज ने इस सदेश में पूण आस्था प्रकट की है आज जब कि रणचंडी अपने दोनों हाथो में खप्परें क्ेकर अपनी जिल्ला रूपरृूपाती हुईं निरीहों का रक्तपान कर रहों है; आज जब की दानवता अपने श्रत्याचारों की बढ्ठनि प्रज्वलित कर मानवता को छ्ार करने पर तुल्ी है--इस संकटाकी्ण काज्ञ में तुलसीदास के प्रभाव के कारण ही हमारे देश के कोने-कोने में अखंड-सद्दा संकीतन यज्ञ का स्वर॒निनादित दो रहा है। सम्प्रतिक भारत में अखंड सकीतंन की सक्रियता व्यक्त करने के लिए में प्रभुदत्त ब्रद्मचारी के आरम्भिक भाषण का वह परचा जो कई वष पहले त्रिवेणी तट के संकीतंन घास पर किए गए “अखंड- महासंकीतंन-यज्ञ" के अवसर पर छुपा था, उसके कुछ अंश अविकल रूप से उद्धत करता हूँ--

“सबत्‌ २००० की शिवरात्रि से इस महान यज्ञ का भझारंस हो गया था। दस दिनो तक श्रयाग की संक्रीतेव मंडलियो ने चलाया और दस दिन से अब भारत ब्ष की भिन्न-भिन्न प्रांतो की संडलियाँ चलना रही हैं। दो दिन से झआानेवाली मढलियों का थोडी थोड़ी देर, दस-दुस, पाँच-पॉच मिनट इस पंडाल में सकीतन हो रहा दे जिससे समस्त मेंडलियो का परिचय दो जाय, किंतु मंडलियोँ इतनी अधिक आईं हैं कि उनको यज्ञ-पंडाल में पूरा समय देना अस स्मभव है। ...... भागलपुर, पूर्णिया, छुपरा से लगभग पेंसठ मंडलियाँ आईं हैं जिनमें आठ सो भक्त हैं गुट्दर के श्री सीताराम सघ' से भी बहुत से भक्त पधारे हैं; बंगाल से, महाराष्ट्र से, राजपुताना, मध्यभारत, ब्रजमंडल्व तथा अन्य प्रांतों से भी बहुत संकीतंन मढत्तियाँ आईं है ।....... . अखंड संकीतंन को भक्त धूम-धाम से चला रहे है। बद्यामंडल के समस्त पंडित महारुद्ध याग को बढ़े प्रेम और लगन से कर रहे हैं। भागलपुर की 'मानस-अचार-मंडल्ती

््द संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

कितने उत्साह से अखंड रामायण-कीतन गाजे बाजे और घूम धाम से कर रही है। श्री अयोध्या जी की सुप्रसिद्ध रामलीज्ञा मडली भी अपनी भावसयी लीला से भक्तो को आनन्दित कर रही है। जिम कक,

भारतवासियों की एक बडी संख्या संकीतन में तल्लीन है, इसका आभास अवतरण से मिल ही गया होगा आज कितने ही सात्तिक भक्तगण वस्तुत “हरे राम ! हरेराम | राम ! राम | हरे | हरे |? की प्रतिष्वनी से गगन भेद कर राम को रक्षा के लिए बुरा रहे हैं। यह किसकी बताई युक्ति है? कहना नही होगा --सत तुलसीदास की

कला क्षेत्र में प्रभाव

अपने गंभीर शास्त्रानुशैल्लन, विलज्ञण कारयित्नी अतिभा और अपरिमित लोक व्यवद्दार-निषपुणता की अखंड विभूति के बल पर तुलसीदास ने जो रमणीय साहित्य क्षेत्र तैयार किया वह बेजोड है उनके ऐसे अलभ्य साहित्यिक उपहार को प्राप्त कर हिन्दी काव्य डससे अप्रभावित कैसे रह सकता था | तुलसीदास के रान चरित-गान का झालोक उनके समय में ही इतना प्रखर हुआ कि केराव दास सरदश दरवारी कवि में भी 'रामचद्रिका' दिखने की उज्कंडा जगी पर सामान्यतः बहुत कांच तक कलावानों की सूक सोती रही | कालान्तर में कितने ही कवियों ने राम-कथा लेकर गोस्वामी जो की रचनाओं का अनुकरण किया | भले ही उन अनुकरण कत्तोश्रों की कृतियाँ तुलसीदास की कृतियों के सामने ख्याति पा सकी, पर यद्द तो निर्विवाद है कि गोस्वामी जी से प्रभा- दित हो कर हो उन लोगो ने रामायणों को रचनाएँ बढाई' रांतिकाल्ष के घोर £ गारी युग में भी मद्राराज विश्वनाथ सिंद ने अपनी अनेकानेक रचनाओं के अतिरिक्त रामायण” “गीता रघुनंदन प्रमाणिक' 'रामचंद्र की सवारी” आनन्द रामायण” प्रति ग्रंथों की रचना की खल्कदास के 'सत्योपाख्यान' में राम कथा का अच्छा विस्तार है नवत्न सिंह कायस्थ के 'रामचंद्र विल्ास' “अध्यात्म रामायण” “रूपक-रामायण” और रामायण सुमिरनी' आदि के! चयय विषय भी उनके नाम से प्रकट हैं। “भारतेंदु' के पिता बाबू गिरधर दास भी अपनी विविध कृतियों से संतुष्ट रहे ओर उन्हों ने 'अदूभुत रामायण”

( ) रा० शु०; हिन्द साहित्य का इतिहास” ( नवीन सस्करण ) पु०३७७ (२१) वही 9. 9 9 ४5९६ ( रे ) वही 393 93) 9 ४5९२९ (४) वही 9 9 93 ४ंरेरे

तुलसी की संव-भावना ७६

ही लिख कर अपनी लेखती को पविश्र किया छोडिए इन कवियों को बीसव शतक में भी रामचरित विषयक रचनाओं की रघृष्टि प्रचुर परिमाण में हुईं है। इस युग में अयोध्या के बाबा रघुनाथ दास ओर महन्त रामचरण दास की रचनाएँ तो हुईं ही, मद्दाराज रघुराज सिह का रास स्वयंवरं ( सं० १९२६ ) वणनास्मक प्रत्रन्ध काव्य अच्छी तरह प्रतिष्ठित हुआ अयोध्या के प० रामनाथ ज्योतिषी का राम चंद्रोदय! और पं० रामचरित उपाध्याय का “राम चरित चिंता-मणि' स्दश रत्न भी निर्मित हुए श्री मेथिल्दी शरण का “'साकेतः तथा “इरिश्रोध! जी का वेदेही वनवास” भी इसी युग की देन हैं। राधेश्याम कृत रामामण गायकों का मनोरंजन अलग दी करा रदा दे

इस प्रकार इम देखते हैं कि राम साहित्य हिन्दी काब्य में अभो तक प्रोत्साहित द्ोता चल्ना जा <डा दे | तुलसीदास के पश्चात्‌ राम साहित्य का जो विस्तृत क्षेत्र प्रस्तुत हुआ दे चद्ठ उनके प्रभाव से चचित नहीं कहा जा सकता

तुलसीदास ने अपने विस्तृत साहित्य-क्षेत्र में इनुमान बाहुक की विशिष्ट रचना करके भी अनेकानेक कवियों को अपना अनुयायी बनाया है। तभी तो दनुमत्‌ चरित को लेकर भी बहुत सी रचनाएँ हुई जेसा कि अनेकानेक हनुमत्‌ पचीसियो, छुबीलियो और पंचको से अवगत होता है

तुलसीदास की रामभक्ति की धारा से काब्य की कई पद्धतियों को भेरणा मिलती इनमें भी प्रबन्ध-पद्धति तो पूर्णतया सनाथ हो गईं। इसकी ओर कतिपय कल्लाकारो का मन विशेष रूप से लगा गोस्वामी जी के पूरे यद्यपि जायसी ने दोहा ओर चोपाई में ही अपना प्रबंध रचा था, पर जायसी को झादुर्श मान कोई असिद्ध कवि चला हो ऐसा नहीं कहा जा सकता किसी ने उनके ठेंठ को ही अपनाया ओर उनके मसनवी ढरें ही को। इसके विपरोत तुलसीदास की साहित्यिक अवधी और उनका दोद्ा-चौपाईं का क्रम जाने कितनों ने ग्रहण किया मंचित कृत 'कृष्णायन” तुलसीदास के रामायण के अनुकरण पर दोद्या-चोपाईं में लिखा गया, कवि ने तुलसी की पदावत्ली तक का अहण किया है। मधुसूदनदास ने अपने बडे और मनोहर प्रबंध काव्य रामाश्वमेध' में तो गोस्वामी जी की शेज्ली का इतना गदरा अनुगमन किया है

(१) वहीं ६६

(२) वही ऐएडरे

(३ )दे० वही » १६६, २६५, ४१०, ४११, ४२० (४ )दे० वही ४०७

८० संत तुलसीदास और उनके संदेश

कि उक्त प्रंथ सब प्रकार से मानस का परिशिष्ट होने योग्य है। “इस पंथ में प्रधानता दोहे के साथ चौपाइयों की है, पर बीच-थीच में गीतिका आदि और इन्द भी हैं। पद-विन्यास और भाषा-सौष्ठव रामचरितमानस' का-सा ही है प्रत्यय और रूप भी बहुत कुछ अवधी के रखे गये हैं। गोस्वामी जी की प्रणाली के अनुकरण में मधुसूदनदास को पूरी सफलता हुईं है। इनकी प्रबन्ध कुशलता, कविस्व शक्ति और भाषा को शिष्टता तीनों उच्च कोटि की हैं। इनकी चौपाइयाँ अझलबत्त; गोस्वामी जी की चौपाइयों से बेखटके मिकाई जा सकती हैं'।”” तुलसीदास की प्रबन्ध वाली शेली के अनुकरणकर्ता और भी कितने ही कवि हैं पर स्थानाभाव के कारण उनका उद्लेख अनावश्यक समझा जाता दे |

तुलसीदास के यूर्ववर्ती, सामयिक अथवा परवर्ती कवियों में प्राय सभी ने भाषा के साथ बराबर बरजोरी की ओर रह रह कर उसके अंग-अंग मसल डाले और बेचारी उस कोमलांगी को विकछांगी बनाने में वे सब के सब तनिक भी हिचके पर हमारे गोश्वामी जी ऐसा करने वाले थे | वह तो असामान्य भाषा-तायक थे | उन्हों ने अवधी और ब्रज दोनों भाषा-नागरियों के साथ अपना ऐसा गूठ संबंध रखा कि दोनों ने अपना सवस्व उन्हें अर्पित कर दिया उन्हों ने दोनों को उच्चातिउच्च स्थान देकर अहदण किया दोनों की सूच्म से सूचम अवृत्ति का मान रखते हुए, उनके अंग-प्रत्यंग की सुषमा बढ़ाई | दोनों के लावश्यमय स्वरूप का अनोखा प्रतिमान स्थापित किया त्रजभाषा प्रकृतितः सामासिक पदों से दिचकर्ती थी, पर जब वह तुलसीदास के समीप गईं तो उसने अपनी रुचि में ययेष्ट परिष्कार कर लिया; वद समासयुक्त पदावली में भी झपनी मंजु इठलाहट दिखाने लगी | 'विनयपतन्निका' के पचास्तों पदों में एक से एक बढकर सामासिक पदावल्ली प्रयुक्त हुईं है। गोस्वामी जी की इस प्रवृति का प्रभाव ब्रज्ममाषा के जगग्नाथदास 'रलाकर' सदृश कविरत्नो पर तो पडा ही है आए दिन खड़ी बोली के अनेकानेक महान्‌ कवियों ने भी सामासिक पदावली का आधिपत्य स्वीकार कर द्िया हे। तुलसीदास ने ब्रजभाषा की झपनी उत्कृष्ट रचानाओ में कुछ पूर्वी प्रयोग भी कर दिये हैं। फलत:ः उनतवे परवर्ती कवियों में भी यह प्रदूत्ति निराइत नहीं हुई। भाषा की सफाई की दृष्टि से घनानंद और 'रज्ाकर' जी ब्जभाषा के अद्वितीय कवि माने जाते दें, पर इन दोनो की रचनाओं में भी पूर्वो प्रयोग का अभाव नहीं यह भी यदि गोस्वामी जी का प्रभाव कहा जाए तो कोई अनुचित नही।

(्‌ रु ) 9१8 वही ४. ४०८

तुलसी का प्रभात प्र

यद्यपि कवि अपनी कवित्व शक्ति लेकर अवतीण होता है, पर इस शक्ति को पूर्णतया आलोकित करने के लिए उसे कई अन्य साधनों के साथ उत्तमोत्तम कवियों की रचनाओं का अनुशीक्षन भी करना पडता है। कहना नहीं होगा कि तुलधीदास के अनुशीलन से जाने कितने कवियों की कार्यित्री प्रतिभा की पुष्टि हुईं। इसी प्रकार उनका प्रभाव हमारे समीक्षकों पर री कम नही पडा। ओरो की तो बात ही छोडिये, रामचह्र शुरू जेसे उत्क।! समालोचक की भावयित्री प्रतिमा तुलसीदास के रग से इतनी रंग उठी है कि उन्‍्हों ने अपना समस्त आछोचना का प्रतिमान मानो तुल्सीदास की रचनाओं से शृह्दीत ठत्त्वों से ही प्राप्त किया है| हि

रामायण की टीकाए

मानस” पर अनेकानेक टीकाओं का निर्माण होता भी तुलसीदास का प्रभाव प्रकट करता है | हिन्दी साहिस्य में ऐपेसा कोई अन्य कृतिकार नही दिखाई पडता जिसके अथ की लोकप्रियता इतनी बढी दो कि उस पर भी सानस की टीकाओ की सॉति पचासों टीकाएँ हो चुकी हो और उत्तरोत्तर होती जा रही हो | मानस! की भिन्न-भिन्न हिन्दी टीकाएं तो है ही साथ ही इतर भषाओ-यथा, संस्कृत, उड़िया, बेंगला, मराठी, गुजराती तथा अग्नेजी आदि में भी उसके अनुवाद हुए हैं इधर रूसी आपा में भी 'मानस' के अनुवाद हुए बहुत दिन नही हुए | अप्नेजी के गद्य और पद्च में 'सानस' का अनुवाद कर आउस साहब ने बडी ख्याति पाई है। गुजराती टीका के कर्ता है--छोटा लाल चंद्रशंकर शास्त्री, इस टीका का प्रकाशन सरतुं साहित्य वधक कार्यालय! अहमदाबाद में हुआ है। मराठी टीका के रचय्रिता थे--श्री मत यादव शंकर जामदार इनकी टीका पुना से सन्‌ १९१३ में प्रकाशित हुई थी! मराठी और गुजराती दोनों की उक्त दीकाएँ गद्य में हैं। बंगला में कई अनुवाद हुए हैं और वे पद्म में हैं। इनमें से तुलसी चरितारूत' नाम से अकाशित प्रसिद्ध अनुवाद तथा कुछ झन्य अनुवादों का परिचय पं० रःसनरेश त्रिपाढी ने दिया है ''। डडिया में भानस' के चार अलुवाद हुए हैं। इन चारो के कर्ता थे थे--गोविन्दसाव, खरिया के राजा बीरविक्रम सिहद, रामप्रसाद्सिह बोहिदारके बडे भाई और पं० स्वप्त श्वर दास# मानस का उत्तम संस्कृत अलुवाद महामहोपाव्याय श्री सुधाकर हिवेदी ने सम्पन्न किया |

'' दे० 'तुलसोदास और उनकी कविता! पहला भाग प्रृ० २६४ हे वही +»9+ #»# 2० २६२-६६ + दे० “कल्याण” मानसाड़॒ भाग १०६०८ ११

नि मिशन किक विश निकीकककककक कक कक का लमनम मारा एा॑ा॑एाणाणाआ रन

धरे संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

अस्तु, इन विविध भाषा-भापियों के बीच तुलसीदास का प्रभाव 'मादस के अनुवादों के द्वारा किसी किसी रूप में अवश्य ही पहुँचा होगा

मानस! की हिन्दी टीकाएँ दो श्रेणी में विभाजित की जा सकती है-- पुराने ढंग की और नपु ढंग की अथम वर्ग की टीकाओं के प्रसिद्ध टीकाकार हु--ज्ञानी सत सिंह जी कर्मी बेजनाथ जी, पाठक शिवलाल जी, स्वामी काष्ठ जिह्ना जी. काशिराज ईश्वरीप्रसाठ नारायण सिट जी, परम हंस हरिहरर प्रसाद मु० शुकदेवल्लाल तथा सहन्ट रामचरणदास जी आदि उक्त टीकाकारों की टीकाओं में उनको विभिन्न व्याख्या शत्ती के स्वरूप पर दृष्टि डालने से कुछ विशेष वाते दिखाई पडती है| इनकी भाषा प्रांतिकता से पुण है यदि संत सिंह की टीका की भाषा पंजाबी मिश्चित है तो बेजनाथ था बाबा राम चरण की पडिताऊपन से ओत-ओत दहै। फलतः इन्हे समझने में उतनी सरलता नही होती इन टीकाओ में भाषा के भाव की पुष्टि के क्षिए आष॑ अंथो पुराणादि के श्लोक भी यत्र-तत्र उद्छ॒व किये गये हैं। इनमें कुछ ऐसी टीकाएँ भी हैं जो सस्कृद के अवतरणों के बाहुल्य के साथ एक सीधे-सादे अर्थ को खीच-तान करदे; स्पष्ट करने की जगह दुरूढ बना बैठी है। कुछ टीकाकारो ने तुलसीदास का भावप्रतिपादित करने के द्विए अपनी रचनाएं पेश कर दी हैं। उन्ही टीकाओ में कुछ ऐसी भी हैं जिनमें 'मानस' के कुछ अकूंकारों और इन्दों का भी सकेत है

दूसरे वर्ग अर्थात्‌ नवीन ढंग के टीकाकारों में विद्यावारिधि पं० ज्वाला प्रसाद मिश्र, पं० रामेश्वर शआट्ट, श्री राममसादशरण, पं० विनायक राव जी, श्री रणबहादुर सिंह, डा० श्यामसुन्द्रदास, पं० महाबीर मालवीय, श्रीजनक सुता- शरण शीतछा सहाय सावंत, पँं० रामनरेश बन्रिपाठी तथा पं० देवनारायण टिवेदी आदि सज्जनों के नाम विशेषोल्लेखनीय हैं नवीन शेल्ली की टीकाओ में से कुछ की विशेषताओ के संबंध में ढो-चार शब्द कह देना अप्रासांगिक होगा 'मानस' की अधिक से अधिक जानकारी कराने में जितनी उपयोगी श्री जनकसुताशरण शीतलासहाय सावत की “मानस पीयूष' है उतनी अन्य टीका नहीं | इस टीका में टीकाकार ने एक-एक शब्द पर विचार किया है। पहले छुन्द का शब्दाथ दिया है, फिर नीचे पूरे छन्दर का सरल और सुबोध भाषा में श्रथ किया है। यही नहीं, इसके फुटनोट ओर टिप्पणियो में बहुत-सी बातें सन्निविष्ट हैँ कहीं किसी प्रसंग विशेष में अन्यान्य टीकाकारों के विचार उल्लिखित हैं तो कहीं तुलसीदास की ही अन्य रचनाओं से भाव का प्रतिपादन करने के लिए आप अंथा की उक्तियाोँ मी नोट में दी गई डे अल्कारों का

तुलसी का प्रभाव ८३

निदेश भी जहाँ तहाँ है पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र की संजीवनी! टीफा जन सामान्य में यथेष्ट स्याति पा चुकी है। टीका सी अच्छी है। छुट़ो के नीचे सोधा-सादा अर्थ दिया गया है। इससे क्षेपक्त भी सम्ाइत हुए हे रामेम्बर भट्ट की 'पीयुप धारा! भी क्षेपक युक्त ह6। ऊपर इंगित अन्य दीकाकारों की टीकाओं में क्षेण्क का अभाव है। रणत्रह्दुर सिह की टीका की सब ले बडी विशेषता यह है कि उससे सानस' की प्रत्येक पके को किसी किसी संरुद्त ग्रथ की उक्ति से मिलाने का पल आग्रह ओर जबरदस्त प्रयास है डा० अ्यामसुद्रदास और प० रामनरेश त्रिपाठी की दीकाओं की बडी विशेषताएं ह- उनकी भूमिकाएँ श्रथ करने का ढग साहित्यिक और सरल है। नवोन शेत्ती के टीकाकारों में प० विनायकराव की टीका अपना एक निरालापन रखती है यह कथा-वाचकों के लिए अधिक उपयोगी कही जा सकती क्यों (के इसमे प्रत्येक प्रसंग पर हिन्दी के अन्य कवियों के छुल्द ओर गाने दिये हुए है प्रत्येक कांड के अन्त में एक पुरानी दी गईं जिसमें कांडभर की शकाओं का समाधान तथा अन्य ज्ञातव्य बाते समाविष्ट कर दी गई है

मानस के कुछ ही अशाो पर टीका करने वाले टीकाकारों का भी एक अच्छा नवीन वर्ग है। इसके झन्तगंत प्रयाग बॉय पर के परस हस नागा बाबा, प॑ शिवरत्रशुक्ूल, श्रीराजवहादुर लमगोडा; पं० विजयानंद त्रिपाठी आदि के नाम आते हैं। प० बन्दन पाठक तथा प० रामकुप्तार जी के टिप्पण, श्रीरामदास ग्राड तथा छाल्ला भगवानूदीन के नोट्स, श्रीवल्लभागरण जी एवं रामबालऊूदास जी सहश महात्माओं की वचनावल्नली आदि भी आशिऊ टीऊाड है। अ्रन्य दीकाओं ओर आंशिफ टीकाओं के नामोब्लेख का अवकाश नही प्राय. हिन्दी के जितने भी अच्छे प्रेस सभी ने अपने यहाँ से 'भानस” की कोई कोई टीका प्रका- शित करने का प्रयास किया ह। टीकाओ और आशिक टीकाओं की चर्चा के उपरात डा० सूयकान्त शास्त्रीका “इन्डेक्स बर्बोरम आव्‌ दी तुलसी रामायन भी उल्लेखनीय है। यह सूची अपने ढंग की पहली चीज है। आधुनिक अध्ययन की परिपादी के लिए ऐसे “इन्डेक्स! की उपयोगिता और उपादण्ता सामान्य नही ।| यह सूची 'मानस” के उस सस्करण पर अवलंबित दे जिसे 'इडियन प्रेस! ने ग्रकाशित किया और जिस पर डा० श्यामसुदर की टीका हैं

झन्त सें इन टीकादि अथो के महत्व के सबध से इतना तो कहा हू: ज्ञा समता है कि ये सब के सब तुलसीदास का प्रभाव तो बताते ही है, इयके अतिरिक्त उनके सिद्धान्तों के अचार से भी किसी किसी रूप में सहायक दें, इनके द्वारा सानस' को भर्ती भांति समरू तेने पर हमारी आकोचनाध्मक श्रज्ञा

संत तुलसीदास और उनके संदेश

विशेष सचेत होकर काय करती है। यद्यपि प्रत्येक तिलक में कुछ ऐसे भाव भी है जो साधारणतः ढीक नहीं जँचते तथापि उनमें उत्तम-उत्तम भावों की भी कमी नहीं हैँ बहुत से ऐसे गूढ भाव भी है जहाँ तक सामान्य बुद्धि का प्रवेश नही इन टीकाकारों ने विद्यार्थी की तरह अ्ंथ का मनन किया, हमारे लिए छान-बीन करने का मार्ग सरल कर दिया। आए दिन यदि ये विविध टीकाएँ होती तो सम्भवतः हमें मानस के सुंदर भावों को समझने से कठिनाइयो का सामना करना पड़ता |

जैसे मानस! की अनेकानेक टीकाओं के प्रचलन से हमें गोस्वामी जी का प्रभाव प्रकट होता है बेसे ही उसके सेकडो संस्करणों से भी यहाँ सभी संस्करणो की सूची देना तो व्यथ है किंतु उनके फलाफल का किंचित संकेत करना आवश्यक है। विधिध सस्करणों के साथ अगणित प्रतियाँ प्रकाशित होती गईं और 'सानस' के पठन पाठन का क्षेत्र बदता गया इस प्रकार प्रचार के लिए संस्करणों की भरमार अवश्य लाभकारी हुईं पर उसका दुष्परिणाम भी हुआ विविध संस्करणों में भिन्न-भिन्न पाठो की गडबढ़ी के कारण शुद्धा-शुद्ध पाठों का निर्णय करना भी दुष्कर हो गया दीका और क्षेपकयुक्त संस्करणों की भूछो की भयावद्वता तो है ही, यहाँ तक कि मूल्न पाठ छापने वाले संस्करणों मे भो बहुत सी बज्रुटियाँ घर किये बैठी दे मूल के हो जितने संस्करण निकल्ले हैं उनमें से दो ही चार संस्करण विशेष महत्वपूर्ण है, उनके पाठ अविकांश में ठीक हे क्‍यों कि उनसे तुलसोदास के लेख-नियमानुसार छापने का प्यास किया गया है। ऐसे प्रयास करने वाले संस्करण ये है- क्रा० ना० अर० सभा का सस्करण, “इ० प्रेस” इलहाबाद का संस्करण | यद्यपि इन दोनो में भी परस्पर प्रभेद्‌ दे तथापि ये दोनो अन्यान्य संस्करणो की अपेत्ता अधिक प्रामाणिक है। इन दोनों से भी बढकर शुद्ध पाठ है उस सस्करण का जिसका सम्पादन रामदास गौड़ ने किया और जो “हिन्दी पुस्तक एजेन्सी से प्रकाशित हुआ है इस संस्करण के पाठ में नाममात्र की झुटियाँ हूं। इधर काशी के श्री विजयानंद त्रिपाठी द्वारा सम्पादित संस्करण प्रकाशित हुआ है जिसमें मूल प्रतियो का आधार ऋद्दण करने की प्रतिज्ञा तो की गईं है पर इसमें भी यत्र-तन्र स्वेच्छा-पाठ दिखाई देता है 'गीता प्रेस” गोरखपुर, का सत्करण भी उल्लेखनीय हे। कइदने को तो इश्तमें प्राचीन प्रतियो का आधार रखा गया है और सम्पादन में मनोयोग दिखाया गया है, पर इसका पाठ सी चिंतनीय है आजकत्न का० बि० वि» के हिन्दी विभाग के प्राध्यापक पं० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के तत्वावधान मे काशिरान्न के संग्रहात्षय में विद्वज्तनो

तुंनसी का प्रभाव॑ ८५

का एक मंडल सानस की प्राचीन प्रतियों के आधार पर 'मानंस का विशुद्ध संस्करण निकालने का तेयारी कर रहा है। संभवत. यह सस्करण त्रुटियों से शून्य ओर संतोषगप्रद निकले

व्यास-पद्धति का प्रचलन

अ्रखित्-भारतीय-मानस-सम्मेलन और रामायण-कथा की व्यास पद्धति आदि का उत्तरोच्त प्रचार और अखार देखकर भी हम गोस्वामी जी के प्रभाव का अनुभव करते हैं। इस समय सामान्यतः रामायण की कथा कहने के आधार पर छोटे-मोटे व्यासों की संख्या इतनी अधिक दो गईं है कि उसका श्रंकन करना कठिन है। फिर भी भ्राज के प्रसिद्ध ब्यासों में काशी के प० विज्यानंद त्रिपाठी, आगरा के बच्च सर, इंदावनी “बिन्दु” आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। 'सानस' के श्रन्यात्य व्यासों का परिचय देकर हम इसके प्राचोन ब्यासों की परंपरा का निदेश करना अधिक समीचीन समझते है। यह परंपरा विशेष रूप में इन पॉच स्थानों से प्रवर्तित हुई---अयोध्या, चित्रकूट, काशी, सरयूतट का वाराह-क्षेत्र एवं गंगातट का सोरों अयोध्या के 'तुलसीचोरा' पर गोस्वामी जी ने स्वय व्यास का स्थान अहणय किया ओर संडीले के स्वामी- नदलालजी तथा मिथिला के स्वामी रूपारुण जो को तुलसीदास के मुख से मानस का पाठ सुनने का प्रथम सोभाग्य प्राप्त हुआ था। इनमें से एक ने दूंदावन के भक्त रसखान को तीन वष तक कथा सुनाई और दूसरे ने संभलसिह भूमिहार को वागमती के तट पर | श्रयोध्या के अतिरिक्त अन्य चारों स्थानों में जो प्रथम व्याल ओर उनके आता हुए उनके नाम आदि का संकेत मात्र मिलता है।' | इन सभी स्थानों से मानस! की जितनी शिष्य परंपरायें चल्लीं उनका पूर्ण परिचय अ्रभी तक नहीं मिलता है हाँ 'सानस' की शिष्य-परंपरा के दो विशेष सम्प्रदायों का कुछ विशेष परिचय उपलब्ध हुआ दे | गोस्वामी जी के पश्चात्‌ इन दोनो के श्रादि व्यास थे-- ( $ ) श्री किशोरीदत्त, ( ) बूढ़े रामदास जी इनमें किशोरी दत्त की चोंथी पीढी में शिवल्लाल पाठक प्रसिद्ध रामायणी हुए, इधर बुढे रामदास की पाँचवी पोी में पं० रामगुलाम द्विवेदी काफी ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। रासगुल्लाम के शिष्यो की दो परपराएं दो गई थी, जिनमें एक में छाला छुक्कन जाल झोर दूसरी में वंदुन पाठक विशेष यशस्वी हुए | उधर शिवल्लाज्न पाठक की परंपरा में श्री शेषद्त तथा शेष- मा

| दे० 'कल्यण' मानसाकू भाग ६० ६०६ ( यद लेख प्रमाण-प्रतिपन्न- नहीं दिखाई पड़ता )

अमाथ जा

संत तुलसीदास और उनके सदेश

हट

दुत के शिष्यों मे कोदोराम प्रसिद्ध ब्यास हुए। इन असिद्ध ब्यासों के अतिरिक्त दोनों परंदरा के अग्तगंत सामान्यत' मानस की शिष्य परंपरा मे आने वालो के नामों की तालिका कल्याण' के मानसाड्ू भाग $ ए० ९५१०-१२ पर दी गई है| आज कत्त के व्यासो के सारे जमघट को किसी विशेष परंपरा से जोइना युक्ति-युक्त होकर दुराग्रह् मात्र होगा |

तुलसी के नाम पर अनेकानेक रचनाएँ

तुलसी के नाम पर अनेकानेक रचताओं की बृद्धि भी उनका विशेष प्रभाव सूचित करती है। रचनाओं का प्रयोग यहाँ व्यापक श्रथ में किया गया है। इसके अ्न्तगत तुलसीदास के नाम से स्वतंत्र ग्रथाकार में प्राप्त रचनाएँ ही नही अपितु तुलसीदास के ही अथों से क्षेपक रूप से झ्रानेवाली तथा उन्ही के नाम से मौखिक रूप से प्रचलित रचनाएँ भी आती हैं। इस दृष्टि से विचार करने पर हमे उनके नास से प्रचलित रचनाओं के पहाड दिखाई पडंगे।

मनुष्य अपनी दमडी की चीज पर भा क्सी दूसरे का अ्रधिकार नहीं देखना चाहता | यह कैसी विल्क्षण बात है कि कोई स्वयं परिश्रम करके रचना करें और उस पर किसी और की सुहर लगाकर अपने अधिकार से अपना हाथ कटा दे विचारणीय हे कि लोग किस मनोवृत्ति कीं प्रेरणा से अपनी कृति दूसरे के नाम से व्यक्त कर परितुष्ट होते है। यह मनुष्यका स्वभाव है कि वह अपना विक्रसित स्वरूप देखने के लिए सदेव लालायित और प्रय्रशील रहता है। छोटे-बडे सभी चाहते हैं कि हम ऐसे समाज में रहे जहाँ हमारी प्रतिष्ठा बढ़े | सामान्य स्थिति का प्राणी एक विशाल विभवशात्रों राजा-बाबू का साइचय प्राप्त कर श्रपने को धन्य मानता है और वस्तुत) धन्य हो भी जाता है। ऐसी मनोबृत्ति की प्रेरणा से सामान्य रचना करने की शमता रखने वादों ने तुलसीदास के विश्यात नाम का सहारा पकड़ा जिससे उन्हे भी महान कवियों में गिने जाने का सोभाग्य आराप्त हो चाहे उन्हे साज्ात्‌ कोई जाने | इस मनोवृत्ति के परिणाम स्वरूप तुलसी दास के नाम पर कुछ कुछ रचनाएँ तो अदश्य हीं हुईं दो गी

अपने व्यक्तिगत भावों, विचारों ओर सिद्धान्तो को औरो पर व्यक्त कर के उन्हें प्रभावित करने की प्रज्नृत्ति सो प्रायः सनुष्य सात्र से होती है। पर सभी इसमें सफल नहीं होते | अतः सफलता ऊे किए मनुष्य छुलन-छुआ का सहारा लेकर भी कार्य सिद्ध करता चाहता है। वह गधा होते हुए भी शेर की खास ओझोटकर अपने मनीराम का संतोष करने पर उतारु हो जाता है। तुलसीदास

तुज्ञतों का प्रभाव पड

के नाम का बाधाम्बर ओढ कर भी बहुतो ने जाल फेलाए और इस ढग से

भो तुलसीदास के नाम पर कुछ रचनाओं की वृद्धि नही रोझी जा सकती थी | किसो व्यक्ति विशेष में अपनी गहरी झा होने ऊे फलस्वरूप भी ऋपनी

सभी वस्तएँ अपनी अद्वा ओर प्रेम के अवन्य अआलमग्बन को समपित कर तय

महानुभाव भी रहे होगे जिन्हों ने अपनी कृति को गोस्वामी जी का ग्रसाद झूम 5 उसे उन्ही के नाम से लिपिबद्ध कर दिया होगा

अनेकों का तुलसी नाम ही रद्दा होगा। उन्हों ने अपने नाम से रचवाएँ की दोगी | कालान्तर मे अ्मवश लोगों ने तुलसी नामवालों की रचनाओं को तुलसीदास को रचनाओं में सन्निविष्ट कर दिया होगा ऐसी भूल के कारण भी तुलसीदास के नाम पर कुछ कुछ रचनाओं का बढना अनिवाय था

स्वतंत्र ग्रंथाकार रूप में तुलसीदास के बारद् प्रामाणिक ग्रथों की चर्चा 'तुलसी की कृतियाँ” परिच्डेद में की जा चुकी है | यहाँ तुलसीदास के नाम से प्रचलित अन्यान्य ग्ंंथो का उल्लेख किया जाता है। ऐसा करने के पूर्व इतना ओर कद देना चाहता हैँ कि आज से करीब अस्सी-पचासीवर्ष पहले जब कि संगर जी का सरोज” निकला, उस समय तक गोध्वामी जी के नाम से डतनी अधिक रचनाएँ नहीं प्रचलित हुईं थी जितनी आज दिन है उस समय दो प्रामाणिक ग्रथों देः अतिरिक्त निम्नाकित आठ ग्रंथ और थे--

“छुल्दावी , 'कुडलिया रामायण, राम सतसई', 'रामशल्लाका', संकट मोचन', रोलाइन्द', कडका छुन्द', भूलना छन्द'। ज्योज्यों समय बीतता गया त्यो-त्यो संख्या भी बढ़ती गईं। तभी तो तुलसीदास के नाम से प्रचल्नित ग्रंथों के संबंध में भिन्न-भिन्न छोगो की भिन्न-भिन्न धारणाएं है। पं० राम नरेश त्रिपाठी ने इनकी संख्या लगभग चालीस तक पहुँचा दी है। बारदो प्रामाणिक कृतियों के अतिरिक्त उन्हों ने जिन अंथो को गिनाया है उनके नाम ये हैं#--

कुडल्षिया रामायण“, 'पदावल्ी रामायण ','छुप्पय रामायण 'रोलारामायण' , “इन्दावल्ली रामायण, 'कूलना रामायण”, “मंगल रामायण”, 'संकट मोचन , “नुमान चाल्तीसा', 'राम शल्वाका', तुलसी सतसई“, 'कल्लिधम निरूपण', वारइमासी”, 'अंकावली', भ्रव भप्रश्नाव्ी', तुलसीदास की बानी”, ज्ञान

'' ठे० सरोज प० रेद८£ # ,, तुलसीदास और उनकी कविता! पहला भाग ४० २,३

ष्८ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

को परिकरण?, “गीता भाषा, 'सूयपुराण', ज्ञान दीपिका, 'स्वयंचर', 'राम गीता, हनुमान शिक्षा मुक्तावली', कृष्ण चरित, सगुनावत्ली!

इन ग्र'थो में से अ्रधिकांश का कोई विशेष महत्त्व नहीं | "हनुमान चालीसा का प्रचार सामान्य ज्ञोगों के बीच अवश्य कुछ विशेष रूप से अवगत होता है। काव्य सोष्टच की दृष्टि से भत्ते ही इसका कोई विशेष महत्व हो, पर इसके प्रचार की उपयोगिता तो माननी ही होगी | दोदे-छोटे लडकों से लेकर बूढ़े तक इसको कंठस्थ किए रहते हें और बहुधा पाठ करते हुए दिखाई पछते ह। ग्रंथ की विशेषता के आधार पर हम अनुमान कर सकते दैं कि इसका रचयिता कोई सीधा-सादा हनुमद्‌ भक्त रहा होगा जिसने जन सामान्य के द्विताथ अपनी टृटी-फूटी भाषा में हनुमान की स्तुति निर्मित कर उस पर तुल- सीदास के नाम की छाप कदाचित्‌ इस लिए लगा दी कि अंथ का प्रचार विशेष रूप से दो |

“हनुमान चालीसा के अनन्तर 'कुंडलिया रामायण” की ओर आइए | इसका स्वरूप हिन्दी संसार के समक्ष पहले पहल सन्‌ १९४१ में इश्गित हुआ | इसके पहले हम उसके स्वरूप से अनमिज्ञ थे, हाँ, उसका नाम तो सेंगर जी ने बहुत पहले सुना दिया था। सनातन धम कालेज कानपुर, के प्रो० सत्यनारयण पांडे ने अपने जिस अनवरत परिश्रम के द्वारा 'कुडलिया रामायण ' का संपादन किया ओर उसे हमारे सामने रखा उसके लिए हिन्दी संसार आप का आभारी रद्देगा आपने ग्रंथ में अपनी सारगभित भूमिका और अथ की टीका जोडकर उसका स्वरूप और भी रुचिकर एवं महत्वपूर्ण बना दिया है। तुलसीदास की प्रामाणिक कृतियों से 'कुंडलिया रामायण” के कतिपय स्थलो का भाव-साम्य दिखा कर इसे तुललसीदास-कृत सिद॒य किया है। प्रामाणिक रच- नाओ की कथावस्तु, उन्तकी भाव व्यंजना आदि से भी 'कुंडलिया रामायण की कथा वस्तु ओर ध्यंजनाओं की तुलना का आम्रह करके इसे तुलसीदास की कृति ठहराया है। इसका रचना कार “गीतावली' और 'मानस' के बीच माना है

मेने 'कंडलिया रामायण” का अध्ययन इस ध्येय से नही किया है कि उसे तक-प्रणाली से गोस्वामी जी की कृति सिद्ध करूं अंथ को मेने गरी- रता से पठा और ग़ुना। ग्रंथ भर में प्राप्त उसकी एक बछी विशेषता देख में यही विचार करता हैँ कि क्‍या गोस्वामी जी की प्रामाणिक रचनाओं में भी कोई ऐसी है जिसमें वे अपनी भावाभिष्यक्ति में उल्लके हों; उनकी प्रारम्भिक रच नाझों में भी यह बात नहीं, प्रोढ़ रचनाओं की तो बात ही ल्यारी है। 'कुड-

तुलसी का प्रभाव ८६

लिया रामायण' के जिस किसी दोहे से कुडलिया आरम्भ होती हो उसी को देखिए--दोहा निष्प्राण-सा दिखाई देगा बिना अ्रध्याहार के अविकांश दोद़ों का अर्थ ही नहीं स्पष्ट होता। क्या गोस्वामी जी के दोहो की यही विशेषता है ? “द्ोहावज्ञी! भी तो बजनाण में है उसके दोहो को 'कुडलिया रामायण!” के दोहो से मिलाने पर ऐसी प्रतीति होती है कि इन दोनों के प्रणेता भिन्न-निन्न अ्नतिभा के दो व्यक्ति रहे है।गे यद्यपि 'कुडक्षिया रामायण” की पदावल्ली प्राचीनना का द्योतन करने के लिए बहुत कुछ काठ-छॉट कर वेयाकरणिक नियमों को ध्यान में रख कर प्रयुक्त हुईं है तथापि ग्रथ की भाषा अवांचीन-सी लगती है

अन्त, में 'कुंडलिया रामायण के विषय में में यही कहना चाहता हू कि यह किसी ऐसे व्यक्ति की रचना है जो तुलसीदास की रचनाओं से अत्यविक प्रभावित था | यदहदी कारण दे कि गोस्वामी जी के प्रामाणिक ग्र'थो. के भाव इस अंथ में प्रचुर परिसाण में सबन्निहित है

'तुलसी सतसई' के सत्रंध में जो कुछ कहना था उसे “तुलसी की कृतियाँ” के प्रकरण में पहले ही कट्ट चुका हूं रही बात तुलसीदास के नाम पर प्रचदस्षित अन्य भ्रथो की, ड़नके संबंध में सुप्ते कुछ नहीं कहना है। मेंने स्वयं उनमें से कईं एक को देखा भी नहीं है।

अब तुलसीदास के नाम पर प्रचत्षित उन रचनाओ को देखिए ज्ञो बरसाती पानी की भाँति किसी समय सानस में आकर छिपी “वंकठेश्वर प्रेस! बबई, अथवा 'बेजनाथ प्रसाद प्रेस” राजा दरवाजा, बनारस से मुद्रित 'मानस' के संस्करणों में लेपको का आज भी स्थान है ।। क्षेपकानुरागियो ने 'मानस' के अष्टम कांड ( लव॒कुश कांड ) की वृद्धि तो की ही इसके अतिरिक्त वे अन्यकांडो में भी ढेर के ढेर छुन्दो और चोपाइयों को मिलाने मे पिछड़े ये सभी क्षेपक रचनाएं 'मानस' का अंग बनना चाहती थो, आज भी सामान्य जान- कारी वालो की दृष्टि में ये तुललीदास की रचनाएँ हैं। इस समय मुझे एक ऐसी ही घटना याद झा रही है। ग्रज्ञुएुट होने के पूत्र मेंने अपने ४क तु गुरुजन के झुख से सुना था--

“हाथ जोरि लकछिमन तब बोले रघुनायक सों बचन अमोत्ते पग भूषन दो सकत चिन्दारी। ऊपर कबहुँन सीय निद्दारी॥' इन्हे सुनते दी मेरे कान खड़े हो गए। मेंने पूछा ये चौपाइयाँ कहाँ की हैं! उत्तर मिल्धा सुलसीकृत रामायण की मेने कांड पूछा और बुद्ध महोदय ने किष्किधा कांड देखते को कहा मेंने धृष्रता की ओर कद्ठा यह वहाँ नही है।. १२

६० संत तुलसीदास झोर उनके सदेश

इस पर वे विगड गए बोले जाकर ध्यान से हंढ़ो। अपनी विस्मृति की झाशंका कर में क्षेपक-रह्ित 'मानस'“के पीछे हाथ धोकर पढ' गया, पत्मा पन्ना हुढने का प्रयास कई बार किया और अन्त में निराश होकर बैठ गया | इधर जब मेंने गोस्वामी जी को अपने अनुसंधान का विषय बनाया तब यह बात समझ में आई कि उक्त बूढ़े दादा की भाँति कितने ही ऐसे आआँत सज्जन होगे जिन्‍्हो ने क्षेप्कों को भी तुलसीकृत मान रखा है। उक्त घटना की ओर संकेत करने का मेरा अभिप्राय यह है कि ऐसी घहुत-सी क्षेपक चौपाइयों या उन्द दें जो धोखे से तुलसी की रचनाओं में प्रविष्ट होने के कारण तुलसी के ही नाम से प्रचल्षित हो चले हैं

यहाँ तक तो उन रचनाओं का संकेत किया गया जो तुलसीदास के नाम पर लिपिबद्ध रूप में प्रचत्षित हैं ।अब उन रचनाओं की और ध्यान दीजिए जो संगते गोसाइयो ( भरथरियों ) के होठों पर नाचती रहती हैं। किसी रमते अभरथरी को बुला लांजिए उसका गान सुनिये सरंगी की रेंव-रेंव पर वह जितनी तानें भरेगा उनमें प्राय: तुल्लसीदास प्रभु आस चरन की टेक रहेगी इन गीतों को सुनकर यदि कोई उन्हें तुलसी की रचनाओं में खोजने लगे तो यह उसका पागलपन नही तो क्‍या!

भरथरियों को छोड़ नापितों की एक विशेष मंडली की ओर दृष्टिपात कीजिए | किसी नाई के यहाँ जब कोई उत्सव पड़ता है तो मंडली के सभी लोग आकर अपने नडआ कूमर ( इसे नठआ झाम या नडआ मूक ) को धूस मचाते हैं खजड़ी की तार देकर मंडली नाना प्रकार के भजनों और पदो को मस्त होकर गातो है इसके इन सभी गीतों पर 'तुलसी' की छाप लगी रहती है। ये गाने दर्मे तुलसी की रचनाओं में स्वप्न में भी नहीं मिल्तें गे | ऐसे जाने ओर भी कितने प्लोग हैं जो अपनी तुकबंदी करते जाते हैं और तुलसी सूर या कबीर इन तीनों मेंसे किसी एक की छाप देकर स्वयं फूले नही समाते |

वस्तुतः ये मल तुकबंद भी भली भाँति समझे हैं कि गोस्वामी जी बहुत ही व्यापक भर महान्‌ हैं, उनकी छाप के संसर्ग से हमारे टूटे-फूंटे शब्दो को भी लोग रुचि से सुनेंगे। तुलसी के नाम पर आए दिन जितनी झधिक रच- नाएं अचलित हैं, उन्हें देखते हुए यही निष्कष निकाला जा सकता दै कि तुलसीदास के अपरिमेय प्रभाव के कारण लोगों ने उन्हें अनेकानेक मार्गों से अहय किया है और उत्तरोत्तर ग्रहण करते जा रहे हैं |

तुलसी का प्रभाव ६२ आधुनिक विदज़नों की सम्मतियाँ

गोस्वासी जी के संबंध में कुछ आधुनिक विद्वज्ननों की सम्मतियों के आधार पर भी हम उनके प्रभाव का अनुमान कर सकते हैं। सम्मतियों को अविकल्न रूप से उद्छत करने के पूव यह इगित कर देना भ्रच्छा होगा कि उनके सक्तिप्त संग्रह में मेंने किस विशेष बात का ध्यान रखा है अधिकांश कृतिकार ऐसे होते हैं जो किसी वर्ग या सम्प्रदाय विशेष के अ्ज्भुयायियों या अपने इृष्ट- मित्रो की मंडली की ओर से अच्छी सम्मति पाकर अपनी सीमित परिवि में द्वितीय बृहस्पति बनने का दावा करने लगते हैं। ऐसे लोगों को प्राप्त सम्म तियाँ प्रायः एक देशीय होती हैं अपवाद रूप से कुछ ऐसे मद्दा-प्रतिभा सम्पन्न कल्नलाकार भी होते हैं जिनके दिव्यात्मा की प्रखर ज्योति इतनी झाकषक होती है कि उसके समक्ष आने पर सबको किसी किसी रूप में नत मस्तक होना पढता है| ऐसे कल्लाकार पर जो सम्मतियाँ प्राप्त होती हैं वे एक देशीयता के छुद्र घेरे में कदापि नही आती। तुलसीदास ऐसे ही कलाकार हैं। उनके 'मानस में जिसे प्रवेश करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ वह किसी किसी कारण से उसकी महत्ता स्वीकार किए बिना रह सका | तभो तो बल हिन्दुओ के विविध सम्प्रदाय वाल्ते ही नही अपितु कुछ मुसल्मानो ओर अ्रजों तक ने अपनी योग्यतानुसार उनकी गुण-गरिसा का गान किया दे

पहले दो-चार पाश्चाध्य विद्वानों की सम्मतियाँ उद्धत को जाती हैं। डा० ग्रियसंन ने तुलसीदास का अच्छा अध्ययन किया था, अतः सर्वप्रथम उनको

सम्मति देखिए---

“सारतवर्ष के इतिहास में तुलसीदास की महत्ता के विषय में इद्मिप्य॑ नहीं कद्दा जा सकता साहित्यिक इंष्टि से रामायण के गुणों को एक ओर रख कर यह बात अवश्य उल्लेखनीय है कि यह अंथ यहाँ की सबजातियो द्वारा अगीकृत दे | पंजाब से भागज़पुर तक और हिमालय से नमंदा पय उसका प्रभाव हैं। राज महत्व से लेकर भोपडी तक प्रत्येक मलुण्य के हाथो में वह देखी जाती है | और हिन्दू जाति के प्रत्येक वर्ण द्वारा चाह्दे वह उच्च हो चाहे नीच, धनी हो या निध न, युवा दो अथवा बृदू एक रूप से पढी-सुनी जाती अथ सर आइत होती है। वह हिन्दू जाति के जीवन, भाषा एवं चरित्र में प्रायः तोन सौ वष से ओत प्रोत है ओर केवल अपनी कवितागत सुन्दरता के लिए आदर तथा प्रेम वही लाभ करती, वरन्‌ यह उनसे पवित्र पुस्तक की भांति सम्मा-

६२ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

नित होती है। जिस धर्म का उसने प्रचार किया है वह सादा और उच्च है तथा ईश्वर के नाम के पू्ण विश्वास पर निभर है ॥””

महोदय रूट्स डडल्ले कहते ह--“तुलसीदास ने अपने स्वामी के नाम का जो हृदय-स्पर्शी गान गाया वह युग-युगान्तर में सुनाई पडेगा; इससे प्राच्य जनो की भाँति पाश्चात्य नर-नारी के हृदय से परनात्मानुभूति की क्षुधा बढेगी ओर जिनके हृदय में प्राणिमात्र के प्रति श्रेस है वही लोग अनन्य प्रेम को जानेंगे ।”

२० एडबिन ग्रीब्ज गोस्वामी जी की ओर क्यो खिंचते हैं---

“उनकी अमर कृतियों द्वारा हम उनकी ओर खिचते द्वी हैं, परंतु इससे भी अधिक उनके जीवन की सादगी ओर पविन्नता, उनका प्रावन व्यक्तित्व हमारे हृदय को, हमारे मन को दृठात मोह द्ेता है ,.»»»-« «हिन्दी काव्य गगन में गोस्वामी जी सूय के समान देदीप्यमान है और दूसरे कवि नक्षत्रों के समान दे | गोस्वामी जी के सरल, सबल ओर निमत्न जीवन के साथ डनकी कविता की अपूव मिठास तथा अद्भुत शक्ति उन्हें सर्वोत्कृष्ट स्थान का अधिकारी बना देती है

डा० जे० एस० मेक्‍फी की सम्मति देखिए---

“सर-सामान्य हिन्दू-जाति के सर्वोच्च प्रतिनिधि विश्वासों को अभिव्यत्त करने वाला तुलसी के रामायण के अतिरिक्त कदाचित्‌ कोई दूसरा ग्र'थ नहीं ,०००००- » “पुलसीदास की रचनाओं में मनुष्यरूप भगवान्‌ का परमोच्च और सच्चा आध्यात्मिक स्वरूप पाया जाता ह। भारतीय साहित्य में उनका नायक अपना सानी नही रखता “* |

इ।० हाफिज सईद की सम्मति से--रामायण ने हिन्दू संस्कृति कौ रक्षा ही नहीं की वर॑इसने हिंदी भाषा को भी बचा लिया है।...... ...-.इस बात को कोई कैसे अस्वीकार कर सकता है कि संसार का कोई 'धर्म-अंथ इतना

छोकप्रिय नही हो सका है जितना रामायण |. ........ ...अद्यावधि हिन्दू जाति

दे० ' वनाक्युलर लिचरेचर आद हिन्दुस्तान” पृ० ४२ २,, बुक आग राम-बाइवरिल आव इंडिया ' भूमिका प० २२ है) केल्याण' मानसाइ्ठु खड १० १११८

है ). 9 93$9 9) 9१) $१$ १९१२०

५, दे० 'रामायन आव तुलसीदास” भूमिका प्रू०

६५ वही धु०२५४२

तुलसी का प्रभाव॑ ६३

की आध्यात्मिक संस्कृति तथा पवित्र और सदाचार पूर्ण जीवन का अधिकांश श्रेय रामायण के दिव्य सनातन संदेशों को है

इसी प्रकार अनेकानेक हिन्दू विदृग्ननों की सम्मतियों को उद्धृत करना में इसलिए अनाज्यक समझता हु कि वे अपनी वस्नु के संबंध में होने के कारण आत्म-स्तुति की कोटि में दही जाएँगी गोस्वामी जी हमारे हैं, टनकी कृतियाँ इसारे रत्नकोश के अमल्य रत्न हैं

अपनी श्रद्धाद्नलि कुछ प्रतिष्टित एवं प्रामाणिक सम्मतियों की ओर संकेत करने के पश्चात्‌, में अपनी कोई सम्मति देने का दुस्साहस तो नहीं कर सकता, पर आय शिरो- मणि बाबा तुलसीदास के चरणों की वदना करने की अपनी ल्ाल्सा में भी हूटे फूटे शब्दों में व्यक्त किए बिना नही रह सकता छोक इसे मेरी सम्मति ही क्या समझे पर है यह मेरी श्रद्धा अलि विधाता ! तेरी लीला धन्य है | दूने तुलसीदास को अकिंचन कुल में उत्पन्न दी नहीं किया अपितु वाल्य-काल में ही सनाथ भी बना दिया पर ऐसा करके भी अन्त में उनको इतना मद्दान्‌ भी कर दिया कि उनकी तुलना के लिए कोई उपमान नही मिल्लता | किसी बडे सन्नाद से उनकी समता करना व्यथ दे क्यों कि सम्राट तो स्थूल शक्ति से बाह्य शासन करता है, परंतु तुलसीदास लोगो के हृदय के शासक हैं; किसी जगद्धिस्‍्यात कवि से उनकी तुलना इसलिए नही फवती कि उनकी साधुतां मदहान्‌ से महान्‌ कवि सें नहीं; कोई बढा साधक भी उनकी बराबरी इसलिए नहीं कर सकता कि उसमें तुलसीदास की अलोकिक कवित्त्व शक्ति एवं भव्य काव्य-निर्माण के अन्य श्रील उपादान नहीं ऐसे अनुपमेय तुलसीदास के प्रति जो श्रद्धा जो भक्ति, जो पूज्य घुद्धि हमारे भीतर वह शब्दो के द्वारा इस लघु भ्रद्धाअलि में भल्ले ही हम व्यक्त कर सके, पर वह उनसे छिपी होगी। हे हिन्दूजाति के उद्धारक तुलसी ! तुम्हारी पैनी दृष्टि ने अपने सामायिक हिन्दूसमाज के पतन का अ्रग-प्रत्यंग देखा--तुम्दें स्पष्टतः ज्ञात हो गया कि कराल काल के प्रवाह में पड़ कर दीघ संस्कृति--परंपरा से द्ू८ कर विच्छित्न होती हुईं, अपने प्रकृत स्वरूप और प्राचीन गौरव का क्रमशः विस्मरण करती

१५ पल्याण मानसांड खड है ३० १०४६

प्रस्तुत भ्रद्धाज्षलि मैं सेंजोए, विचार कुसुमों के कुछ य॒त्रों का विशेष मर्म समभने के लिए. “ठुलसी ओर उनका युग” का परिशीलन कीमिए |

६७ संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

हुईं--ठ॒म्हारी दिन्दूजाति क्षिप्र गति से विनाशोन्मुख है। यह इश्य देख तुम कल्ेजा थाम कर बैठ नहीं गये प्रध्युत तुम्दारा विश्व-दितैषी हृदय जग पडा, तुमने समाज के दम और पाखंइयुक्त व्यवहारों एवं अनाचारों का भंडाफोड करते हुए उसकी कडी आलोचना दी नही की अपितु उसे सनन्‍्माग बताने के लिप अद्वितोय सामाजिक सत भी रमणीय ढंग से स्वर्णाक्रो में अंकित किया |

है समाज-विधायक तुलसी ! तुमने समाजोन्नति के लिए आदर्श सामाजिक मत का निरूपण ही नहीं किया, अपितु परम पुरुषार्थ के उच्चतम साधन भक्ति को भी सव-जन-सुलभ कराने के हेतु प्राचीन आचार्यों के ढ्वारा निर्दिष्ट भक्ति के विविध स्वरूपों एवं उसके सिद्धाती का सजीब मनोरम चित्र भी उपस्थित किया साथ द्वी ज्ञान, वेराग्य, योगादि का अपेक्षित महत्व भी हस्तामलक कराया। भक्ति, ज्ञान, वैराग्य आदि के अछ्ुण्ण भंडार का द्वारोन्मुक्त करने के लिये अपना कल्लेज़ा निकाल कर रखने वाले तुम धन्य हो

रामोपासना के प्रतीक ! तुम भक्ति के सिद्धान्तो को व्यक्त करके ही चुप साधने वाले नद्दी थे; तुम्हारी निराल्ली उपासना पद्धति भी थी; तुम्दारे उपास्य का सानी अन्यत्र कहाँ, तुम्हारी विचारानुमोदित आचार-प्राण उपासना पद्धति की समता में कोन-सी दूसरी पद्धति टिक सकती है? तुम किसी नवीन उपासना पद्धति के प्रवतक होते हुए भी रामोपासना के अद्वितीय अभ्रचारक ओर पैगम्बर हो; तुम्दारे चरणों में कोन-सा रामभक्त नतमस्तक नही द्ोगा

अपने इृष्टदेव की उपासना के निरन्तर खात्तिक सहयोग से अपनी तत्त्व- खितन-शक्ति को समत्व के दिव्यासन पर अधिष्टित करने वाक्ले तुलसी ! तुम्हारा तात्त्तिक देष्टिकोश धन्य है तुमने वेदान्त की सभी डदात्त पद्धतियो का ऐसा समन्वय दिखाया दे कि उसका वर्णन करना सरत्न नहीं। तुम्दारे दाशनिक विचारों का अद्वितीय समन्वय देखते हुए तुम्हे किसी सम्मदाय विशेष का कद्दना, तुम्दारी ध्यापकता को संकुचित करना दै। पर, तुम्दारी 'सेद सक्ति! की मार्मिक मधुरिसा का श्रतुभव करने पर हूंदय को तुम्दारी ह्वेत-प्रणाद्धी ही जँचती है

प्रत्येक सम्प्रदाय के सात््विक भार आचारयुक्त स्वरूप के प्रति आदर (व सत्कार की उच्च भावना रखने वाले, विकृत और संकीण साम्प्रदायिकता के छुद्द पाश में आबद्ध होनेवाले तुलसी ! तुम्दारे व्यापक इष्टिकोश की परिधि असीम है, तभी तो हिन्दू धर्म के सभी प्रधान सम्प्रदायो की अन्तरात्मा तुम में विथमान्‌ है तुम सभी सम्परदायो के आदर और पत्कार के भाजन हो

जो प्राचीन आर्य घम काह्षचक्र से पढ़कर कमकांड की दुष्करता के कारण

तुलसी का प्रभाव ६५

अपने अनुयायियों को भारभूत प्रतीत होकर अस्त होने लगा था, उसमें राम- नाम की एक नवीन ज्योति फेला कर उसे फिर से नव प्रकाशयुक्त करने वाले तुलसी | तुमने धर्म को अन्धकाराबृत रहस्यवाद, निष्माण वाह्याइस्वर और अज्ञानमूछक भूत-प्रेत-पूजा आदि के पंक से निकाल कर शुद्ध नेतिक, भाविक एवं बौद्धिक आधार पर प्रतिष्टिन कर उस पर स्वंसामान्य का अधिकार जताया; तुम्हारे रोम रोम में परम सात्तिक वेष्णव की विश्व-जनीन करुणा संचरित होती थी, इसी से तुमने श्रद्दिता को हो अपने धम का परमोच्च लक्ष्य माना

है अप्रतिम सन्त | तुम स्वयं उच्चकोटि के साधक, साधु होने के कारण सच्चे संतो की ल्ोकोत्त भावनाओं और उनके अपरिमित ध्याग के उत्तराधि- कारी थे; तुम्दारी संत-भावना की कसौटी पर ठदरने वाले सब्त विरत्न ही होगे | जो होगे वे तुम्दारी दी भांति विश्व-हितेषी ढोगे। तुस्हारे संत-मत का अनुयागी अपने साधु-मत का कोकमत से कद्दी विरोध होने पर लोकहित के लिए लोकमत को दी श्रेय देता

प्राची राम साहित्य के अयाध रत्ाकर से अनन्त रामकथा के मणि-साणिक्य निकालने वाले तुलसी ! तुम्हारी मननशीलता अपार थी; तुमने रामकथा संबंधी प्रायः सभी झआाष॑ अंथों का पूर्ण मन्थन किया तभी तो तुम्दारे राम साहित्य में बाल्मीकीय, अध्यात्म, महारामायण प्रभ्ृति रामाययों, संस्कृत के

महाकाव्यो और नाठकों के प्रभाव आदि स्पष्टतया अवगत होते है |

संदर्भण कत्ना में परम प्रवीण तुलसी ! तुम्हारी संदर्भश कल्मा की जो पटहुता 'मानस' में दीप होती है उस पर कौन नहीं तृण तोढ़ता; तुम्दारे 'मानस' के उपक्रम और उपसंदार, उसकी षडविध संगति-योजना, उसके श्रुति-स्मृति, पुराणादि युष्पो से संगरह्दीत मघुकोश, उसको भावानुरू शेज्ञी, उसकी प्रबंधानुरूप छुंदु-गोजना आदि तुम्हें कत्नाकारों का मुधोमिषिक्त सम्राद्‌ खहराते हैं

हे काव्य-गगन के सूथ तुलसीदास ! तुमने अपने अमर आलोक से हिन्दी साहित्य लोक को सर्वभावेन देदीप्यमान्‌ किया, काव्य के विविध स्वरूपो तथा शैलियों को विशेष प्रोत्साइन देकर भाषा को खूब सेंथधारा ओर शब्द-शक्तियो, ध्वनिरयों एुवं अल्धंकारों के यथोचित प्रयोगो के हारा अथ-द्षेत्र का अपूव विस्तार भी किया; तुम्हारा बाह्य दइश्यो का सूदंम निरीक्षण और चित्रण, तुम्हारी झआा+यन्तरिक वृत्तियो की अद्वितीय अनुभूति अवणता आदि सभी आदुश हैं; तुम्दारी रृतियों में लोक-ब्यवहार-निपुणता एवं सद्ग्राहिता का सखि-कांचन- योग भी देखते ही बनता है; तुम्दारे सौन्‍्दय-बोध, मात्रा-बोध और प्रातिस

६६ संत तुलतीदास ओर उनके संदेश

ज्ञान की संसृष्टि भी अनुपम हैं; तुम्हारी रचनाओं में श्री्षता का पूर्ण परिपाक है और तुम्दारा काव्य मयादा का अतिक्रमण नही करता; तुम्हारी साहित्यिक देन भव्य कोटि का काव्य होते हुए भी उच्चकोटि का शास्त्र है; नुम्हारी विशाल कविश्व शक्ति एवं तुम्हारी उच्चतम साधुता का अपूर्व संयोग सब प्रकार से

पूज्य है।

है अमित प्रभाव वाले तुलसी ! तुम्हारे प्रभाव की दिशाएं श्रनेक हैं। सभी दिशाओं में प्रधान रूप से तुम्दारा प्रभाव प्रतिष्ठित करने वाला है-- धानस' का पविश्न आभास और उसका उदात्त स्वरूप | तुम अपने जीवन काल में ही महासुनि' ( बाद्मीकि ) के अवतार माने गए यह तुम्हारा प्रभाव नहीं तो क्या आज तुम्हारा परवर्ती समाज भी तुम्हारे निर्दिष्ट माय को लहज झौर भर यस्कर मानता है। सनातन धम में आस्था रखने वात्मों की दृष्टि में वो तुम सब प्रकारेण वंदनीय ही हो, इसके अतिरिक्त मानस को “गपोड कहने वाले समाजी भी यह कहने के लिए विवश हैं--“तुल्लसीदास की रसीली कविता से देश में देवनागरी अक्षरों का प्रचार स्वसाधारण के मध्य प्रशंसा योग्य हुआ है ।'' रामायण के निर्माण का मुख्य प्रयोजन पितृ-मक्ति, आ्ातृ-स्नेह, दाम्पत्य-घर्म, प्रजा-ममस्व, देशासिमान ओर पुरुषाथ था ।”

हिन्दी साहित्य में आज भी 'साकेत' 'बेदेही बनवास' आदि का प्रणयन होते देख हम अनुभव करते है कि इन अथो के मूछ में तुलसीदास की हो प्रेरया है यह तुलसीदास का ही प्रभाव है कि आये दिन भी रामलीलाओ के मनोरम अभिनय बढ़े उत्साह के साथ होते हैं; रामायण की ब्यास-पद्धति का श्राज भो महस्वपूर्ण स्थान है; रामायण की विविध टीकाओ की चृद्धि आज भी हो रही है; तुलसीदास के प्रभावशालौ नाम पर भी रचनाओं का विकास जारी है

झालोचको को भी आलोक प्रदान करने वाले तुलसीदास का यह भी विशेष प्रभाव नहीं तो क्या कि आज उनके जितने आऊकहोचक हैं डतने किलो अन्य हिन्दी महाकवि के नहीं ऐसे प्रभुविष्णु संत ओर मद्दाकवि के प्रभाव की छतन्नच्छाया में विश्राम पाकर श्रद्धा ओर सत्कार, स्नेह और सौसनस्य, सम्श्नरम और सम्मान के दो चार कुसुम लेकर उनकी अचना के लिए उपस्थित हुआ हैं। वे हमारी आँखेंमें समाये हैं उनकी प्रशंसा, आशंसा झथवा अभिनदन में जो कुछ कहा जाय थोडा है

तुलसी के प्रमुख संदेश आदश की स्थापना

हमारा समस्त वाग्विसग सामान्यतया हमारे किसी किसी मन्तव्य विशेष का द्योतक होता है। यदि ऐसा होता तो हमारे अमिलाप ओर उन्समत्त के प्रलाप दोनो ही भेद-बून्य माने जाते। कहने का तात्पय यह है कि हमारे सामान्य दुनिक जीवन की बातचीत भी किश्वित उद्देश्य से हुआ करती है | इसके अतिरिक्त, यदि हम विशेष अवसरो पर किये गए अलंकृत सम्भाषणों को देखते हैं तो उनमें भी किसी मन्तव्य विशेष का प्रतिपादन रहता है भारती के असाद से वाग्ग्सी प्रवक्ता अपनी वक्तता का मधुर लोत भत्ते दी व्यापकता से प्रवाद्दित करता रहे और श्रोतागण उसके प्रत्येक शब्द पर मुग्ध होते रहें पर वक्ता के विस्तृत कथन का सार या संदेश इतना सूक्म होता है कि वह उसे कुछ दी शब्दों में समाप्त कर सकता है चस्तुतः वह वैसा करता नहीं | क्‍यों कि उसे श्रोताओं पर अपना स्थायी प्रभाव जमाने के लिए उत्तमोत्तम उतक्तियों और तकों का आश्रय लेकर चलना पडता है, ऐसा करते हुए. भी वह अपनी वक्तता को अपने उच्द श्य की दीप्ति से इस प्रकार अनुप्राणित रखता है कि श्रातागण सहज में ही उसे हृदयगम कर कल वक्ता की मनोहर वक्तता की भाँति कल्नाकार की मनोज्ञ कृतियाँ सी उसके डढ श्य से अलुप्राणित रहती हैं कोई महान कृतिकार ऐसा नही होगा जिसकी कृति निरुद्द श्य कद्दी जा सके यह दूसरी बात है कि कल्लाकारो के व्यक्तित्व-वेभिन्य के कारण उनके उह श्य में अन्तर हो, पर इतना तो निर्विवाद हैं कि अत्येक कल्लाकार किसी प्रधान उद्द श्य की सिद्धि के छिए नाना प्रकार की सरस योजनाएं करता हैं। फलत; डह श्य की पूर्ति के साफल्‍्य या वेफल्य के आधार पर भी वह सफल अथवा विफल्न कहा जा सकता दहै। अस्तु, कृतिकार के यथाथ मुल्याइ्षन में उसके संदेश का विश्लेषण और उसका प्रभाव-निदुशन भी नवीन आलोचना- प्रणाढ्षी का मुख्य अंग है। अतएवं उसका उद्धाटन भी भावक का प्रधान कतच्य है।

कृतिकार का सदेश जितना ही व्यापक एवं उदात्त हो उसकी सावभौमिकता उतनी ही अधिक होती है। जिस संदेश में मानवीय विभृतियों की भव्य

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ध्द संत तुलसीदास ओर उनके संदेश

ज्योति प्रस्फुटित होती है और जिसका सहज प्रकाश हृदय के अम्तराल में स्वयमेव प्रवेश करता है, निस्संदेह, वह संदेश कृतिकार को उच्चासन पर प्रतिष्ठित करेगा इस संबंध में तुलसीदास की यह उक्ति सवंधा स्मरणीय है- “कीरति भनिति भूति भल्नी सोई। सुरसरि सम सब कर हित होई ॥” जब हमारी दृष्टि तुलसीदास की आदुशे-प्रतिष्ठा की ओर जाती है तो सब- प्रथम हमें डके की चोट कहना पडता है कि उनके आदश का पाश्चात्य झादशवाद से कोई संबध नहीं | यूनानी पंडित छुंटो तथा जमनी के कांत, शीलर, हेगतल् प्रभ्डति विद्वानों का 'आदुश' केवल भावना-लोक की वस्तु है। इसके विपरीत संसार में जिसकी वास्तविक सत्ता है उसे “यथाथ' कहते है उनकी दृष्टि में राम का आदश चरित वह चरित समझा जायगा जो व्यावहारिक रूप में कभी राम में विद्यमान था पर राम के भक्तों और उपासको ने राम में उसकी सत्ता की अआंशंसा मांत्र की है। आचार प्रधान भारतीय जीवन पेसा कुछ जगद्विलक्षण रहा है कि उसकी व्यावहारिकता से संदेह हो ज्ञाना स्वाभाविक है | गोस्वामी जी ने अपने चरित-नायक का जो चित्रण किया है उसे भारतीय इृष्टि से यथा्थ ही मानना चाहिए। तभी हम उसका अनुकरण करके उद्धार पाते हैं। अतः राम का जीवन हम सामान्य जीवो के लिए भले ही आदश हो, पर है वह यथाथ ही | तुलसीदास ने जो निद्शन, नमूना या आदश दिखाया है वह प्रत्यक्ष रूप में कार्यान्वित होने वाल्ला पदार्थ है कि कल्पना लोक में टिकी हुईं अचरित्ताथ वस्तु वदकाज् की गति-विधि के साथ परिवर्तित होने वाला नहीं प्रत्युत सर्वकाल के द्विए सत्य, शाश्वत और पूर्ण है। अचुकरण और अलुवतन का झनन्य लक्ष्य है। श्री कृष्ण ने कहा हैं-- ध्यद्यदा च्रति श्रेष्ठ स्तत्तदेवेतरो जनः। यत्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवततते ।।” 'गीता! ३२१ उद्धरण प्रमाणित करता है कि आदुश कोई खयाली पोलाव नहीं है वह सर्वदेश और सर्वकाल के लिए. अनुवतंन की वस्तु है। आादश-पथा-ख्ढ़ अम्युदयोन्मुख होता है और आदश-पथ-अ्रष्ट का पतनोन्मुख होना अनिवाय है। तुलसीदास ने अपने सासयिक समाज को विश्वंखलताशो, उच्च खत्बताओ और गदित आचार-विचारो की खर बाहिनी बरसाती नदी की गति पत्चढ देने, पतनोन्मुख भारतीय मर्यादा की पुनर्स्थापना करने तथा पु्ण मानवता का शाश्वत स्वरूप दृष्टिगत कराने के देतु राम को ही सर्वोत्कृष्ट आदश समरूा।

तुलसी के प्रमुंख संदेश ६६

डनकी दूरदर्शिता ने उन्हें सम्यक्‌ अकार से सुका दिया था कि अन्यान्य सुधारकों की भाँति समाजञ के छिद्वान्वेषण करने मात्र से सुधार नहीं होगा प्रत्युत समाज के सभी अड्ोपाड़ों को रमणीय से रमणीय नमूना प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर कराने की नितान्त आवश्यकता थी। फल्नतः उन्हो ने सामाजिक पतन देख अपने हृदयोद्गारो की अभिव्यक्ति करते हुए लोगों के समच अपनी अनोखी काव्य-प्रणाली के द्वारा सवंसामान्य की भापा में कृतिसाध्य आदुश उपस्थित किये

राज-राज-मोलि रामचन्द्र के चरित्र से जिन राजकीय चारित्रिक विभूतियों की प्रतिष्ठा हुई, वे आदश हैं। वे किसी विशेष देश, काल था जाति के राजाओं के अनुकरण की वस्तु होकर सवदेश, सर्वकात्न और सबंजाति के भूपाल-सणियों की कार्यरूप में परिणत होने वाली विशेषताएं है। यह दूसरी बात है कि कतंब्य विमुख राजकीय सत्ताएँ उन्हें कार्यान्वित करें वह प्रजा- वस्सस्र राजा जो प्रजा की स्वाड्रीण उन्नति के उपायो की योजना में अहनिश दत्तचित्त रहता दे, उसे अपने आणों से बदकर मानता दे ओर उसकी सुख- शांति के लिए अपने भारी से भारी सुखो का उत्सगे करता है--धन्य है। न॒पति रूप में राम ऐसे ही ह्पति हैं। राम का अनुकरण करने वाले सभी राजाओं का राज्य राम-गज्य है

राम राजा हैं फलत: उनका अनुकरण केवल राजाओं के लिए श्रेयस्कर हो ऐसी बात नद्दी। वस्तुतः तुलसीदास ने राम तथा अ्रन्य सभी उच्चायक पात्रों के जो आदुश उपस्थित किए हैं वे राजा, रंक, फकीर सब के लिए. अनुवतंनीय हैं। वे आदश ऐसे नहीं हैं जिन्हे उन्‍्हों ने सामान्य जीवन भर सामान्य जन के स्तर से पृथक दिखाया हो। सानव जीवन सुख-दुख, लास-हानि, यश अपयश, सुअ्रवसर-कुअवसर, मिलन-वियोग ञ्रादि से घिरा हुआ है। ऐसे दृहमय जीवन में भी महुष्य की जीवन-घारा केली हो, उसका लचय कैसा हो, उसका जागतिक संबंध-निर्वाद क्यों कर चले, वह किन चारिश्रिक विशेषताओं के द्वारा उत्तरोत्तर अभ्युदयोन्मुख द्ोता रहे और किस प्रकार संकुचित स्वार्थ- परता का पाश तोइ कर जीवन के संघर्षों से ऊपर उठकर अन्त में विश्राम पाए--इन सभी के आदश तुलसीदास ने उपस्थित किए है|

भक्ति की सावभौमिकता

तुलसीदास ने जेसे सवंदेशीय और व्यापक आदुश का संदेश सुनाया है बेले